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Saturday, June 26, 2010

आज फिर

आज फिर किसी ने दिल पर शब्दों के नश्तर चुभोये
आज फिर लहूलुहान हुआ मेरा दिल

आज फिर आंसुओं ने आँखों का साथ छोड़ा
आज फिर तकिये में सर छुपाया मेरा दिल

आज फिर भगवान का द्वार खटखटाया
आज फिर गुहार लगाया मेरा दिल

आज फिर अनगिनत प्रश्नों के अम्बार लगाये
आज फिर निरुत्तर वापस आया मेरा दिल

आज फिर पत्थरो की दी दुहाई
तू क्यों न मेरी जगह आई ... बोला मेरा दिल

रेवा

Wednesday, June 23, 2010

क्या करूँ ?

क्या करूँ के जब कोई प्यार भरा
गीत सुनती हूँ तो तुम याद आते हो ,

क्या करूँ के जब में आइने के सामने
सवरती हूँ तो तुम याद आते हो ,

क्या करूँ के जब ठंडी हवा का झोंका
मुझे छु कर जाता है तो तुम याद आते हो ,

क्या करूँ के जब बारिश की बुँदे मेरे तन
को भिगाती है तो तुम याद आते हो ,

क्या करूँ के जब संध्या की बेला रात के
आगोश में समाती है तो तुम याद आते हो ,

क्या करूँ के दिल की हर धड़कन
के साथ तुम याद आते हो ...........

क्या करूँ ?

रेवा

Saturday, June 19, 2010

उफ्फ्फ वो कॉलेज के दिन

उफ्फ्फ्फ़ वो कॉलेज के दिन भी क्या दिन थे
वो बातें वो मुलाकातें ........
वो कैंटीन की मस्ती ...वो छीना झपटी
बगल की बेंच खाली रखना और तेरा इंतज़ार करना
तेरा हमेशा की तरह पेन भूल जाने के
बहाने मुझे देखना .......
ठण्ड में घंटो धुप में बैठ कर फाइल पूरा करना
तेरा पैसे न लाना और मेरी शाल गिरवी रख
कर किताब लेना ........
घंटो कॉलेज की सीडी पर बैठ कर बातें करना
घर से जूठ बोल बोल कर कॉलेज में मिलना
बरसात में एक छत्री के निचे रहने के लिए अपनी छत्री छुपाना
अनगिनत ऐसी यादें .............
काश वो दिन फिर आ जाये ..........
उफ्फ्फ वो कॉलेज के दिन

रेवा

Monday, June 14, 2010

दोस्त और प्यार

वक्त का आँचल थाम
ज़िन्दगी की राहों को जान
आगे बढ़ गयी मैं अनजान,

प्यार ने कहा पुरे करूँगा 
तेरे प्यार के अरमान ,
दोस्त ने कहा दूंगा तुझे मान
तेरी कमियों को जान
रिश्तों  पर हावी न होने दूंगा ये मान,

पर जब समय पड़ा आन
दोस्त ने कहा तू है अनजान
तेरी कमियां है महान,

प्यार ने दी दुहाई मेरी जान
मैं हुं मामूली इंसान
न पुरे कर सकू तेरे अरमान,

ये कैसी है दुनिया
कैसे हैं  इंसान ?
माँगा था बस प्यार और मान
वो भी न दे सका इंसान l 



रेवा


Thursday, June 10, 2010

वो ढलती शाम

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये 

फिर मैं उस भीढ़ भाड़ मे खड़ी तेरा इंतज़ार करु
फिर तू कहीं नज़र न आये
फिर से मै बेक़रार हो जाऊ 
और इंतज़ार मैं तेरे अपनी रुमाल के कोने घुमाऊ ,

फिर अचानक भीड़ में तेरा नज़र आना
हमारी नज़रों का मिलना
नज़रों ही नज़रों में एक दुसरे को पहचानना 
और शर्म से मेरी नज़रों का झुक जाना ,

फिर वो कॉफ़ी  और चने के साथ अनगिनत बातें करना
बातो के साथ नज़रे चुरा कर एक दुसरे को देखना ,
झील के किनारे होले होले ठंडी हवा के साथ बहना
चाँद का झांक कर हमे देखना
वक़्त का ठहर सा जाना ,

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये l 


रेवा


Tuesday, June 8, 2010

क्या बताऊँ

क्या बताऊँ  कितना प्यार है तुझसे
दुःख में सुख की अनुभूति है तुझसे 

एक खिचाव एक जुड़ाव है तुझसे 
हर पल एक मीठा एहसास है तुझसे,

हवा में खुशबू है तुझसे 
बारिश की बूंदों की फुहार है तुझसे,

चांदनी की शीतलता है तुझसे 
दिल के हर एक तार मे मधुर झंकार है तुझसे

मेरे जज्बातों को पनाह मिली है तुझसे
क्या बताऊँ तुझे की कितना प्यार है तुझसे

बस अब तो मेरी ज़िन्दगी का सार है तुझसे l 


रेवा