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Saturday, October 27, 2012

एहसासों का बांध

हमेशा तुमसे मिलने की
ख्वाइश रहती है ,
पर इस ख्वाइश को लेकर
आज दिल मे
एक कशमकश सी है ,
तुमसे मिली तो शायद
अब खुद को भावनाओं
मे बहने से रोक पाना
मुश्किल होगा ,
वो सारे अधूरे एहसास
जो बस तुम्हारी बातों से
और तुम्हे महसुस करने
से पुरे हो जाते है
कहीं बेकाबू न हो जाये ,
तुम्हे देख कर
एहसासों का बांध
कहीं टूट न जाये ,
पर फिर भी मिलना
तो है तुमसे ,
क्युकी नदी समुद्र से न मिले
तो कहाँ जाये...................


रेवा

Saturday, October 20, 2012

महिसासुरों का नाश कर सके (मासिक उनवान )

हमारी नन्ही कलियाँ 
आज के ज़माने मे 
कितनी सुरक्षित 
ये तो सभी जानते हैं ,
आये दिन हम पढ़ते 
और सुनते रहते ......
हर बार जब मैं एक नन्ही 
बच्ची को देखती हूँ 
तो दिल डरता है की 
कहीं उसके साथ कुछ 
गलत न हो जाये ....... 
हर किसी के 
मन मे इतना डर 
इतना ख़ौफ़ भर गया है 
इस बात का ....... 
पर क्या हम अपनी
बेटियों को इतना 
मजबूत ,इतने इरादे 
के पक्के नहीं बना सकते 
की वो भी माँ दुर्गा 
की तरह इन महिसासुरों 
का नाश कर सके। 

रेवा 

Saturday, October 13, 2012

कविता का सफ़र

रोज़ मन में कई ख्याल उठते हैं

कुछ शब्दों के मोती बन कर

कविता का रूप ले लेते हैं ,

और कुछ बुलबुले बन कर गायब हो जातें हैं ,

पर सुना है भाप भी कभी ख़त्म नही होते ,

कभी न कभी वो फिर मन के द्वार 


पर दुबारा दस्तक दे ही देते हैं 


और फिर जन्म लेती है 


एक अद्धभुत रचना  ........



रेवा 





Tuesday, October 9, 2012

एहसासों को कहाँ ले जाऊं

जब कभी आँखें बरसी तो
तकिये ने सहारा दिया ,

जब किसी से बात करने की इच्छा हुई तो
गानों से दिल बहलाया ,

जब किसी के साथ की जरूरत पड़ी तो
इन कविताओं ने साथ निभाया ,

जब कभी कुछ कर गुजरने की चाहत हुई तो
ख्वाबों ने वो चाहत पुरी की ,

पर अपने प्यार भरे एहसासों को कहाँ ले जाऊं
क्या बेजान वस्तुओं मे इतनी जान है की
ये मेरे एहसासों को महसूस कर सके ???


रेवा


Friday, October 5, 2012

रचनाकार की मनोदशा

जब शब्द न मिले 
एहसास कहीं खो जाये 
हर चीज़ धुँधली हो जाये 
हर ओर निराशा नज़र आये ,
दिल कुछ और बोले 
दिमाग कुछ और राह दिखाए ,
तो रचनाकार रचना कैसे करे ?
और अगर रचना न करे 
तो जीये कैसे ? 
रचनाकार की तो ज़िन्दगी ही होती है न 
उसकी रचना ..........

रेवा 


Tuesday, October 2, 2012

मन की गांठ

कल पुरानी डाईरी के
कुछ पन्ने पलटे तो
मन अवसाद से भर गया
ऑंखें भीग गयी  ,
पुराने ज़ख़्म हरे हो गए
परस्थितियाँ बदली तो नहीं ,
पर शायद हम समय
और अनुभव के साथ
उन्हें संभालना सीख जातें हैं ,
पर मन मे कहीं न कहीं
उन सब की वजह से
एक गांठ जरुर बंध जाती है
जिसे हम लाख कोशिशों
के बाद भी नहीं खोल पाते ,
कुछ लोग ,
उनके द्वारा कही गयी
मन को चुभती कुछ बातें
हम नहीं भूल पाते ,
काश! हमारे पास भी
कोई डिलीट बटन होता /


रेवा