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Saturday, March 30, 2013

जाने क्यूं

मेरे पास तेरी खुशबू तो नहीं
फिर भी जाने कैसे महक उठती हूँ मैं ,

आँसू तूने दिए नहीं
फिर भी जाने क्यूं आँखें छलक उठती हैं ,

प्यार तूने भुरपुर दिया
फिर भी जाने क्यूं तड़प उठती हूँ मैं ,

सारी बातें साँझा की तुमसे
फिर भी जाने क्यूं बातें अधुरी रह जाती है ,

हर वक़्त तू साथ है मेरे
फिर भी जाने क्यूं तन्हाई सताती  है ,

हर लम्हा ज़िन्दगी को भरपूर जीने की कोशिश करती हूँ
फिर भी जाने क्यूं मौत आसां लगती है /


रेवा


Monday, March 25, 2013

लड़कियों का अपना घर

क्या लड़कियों का कोई
अपना घर नहीं होता ?
बचपन से माँ यही सिखाती है
ये काम ऐसे कर
वो कम वैसे कर
वर्ना अपने घर जाएगी तो तुझे
ही दिक्कत होगी ,
भाई भी यही कह कर चिढाते हैं
"मैं तो हमेशा यही रहूँगा जाएगी तो तू" ,
जब ब्याह कर चली जाती है
तो उस घर को समझने मे
वहां के
लोगो को जानने मे
सालों लग जातें हैं ,
फिर भी सबको अपना नहीं
बना पाती ,
कहीं न कहीं उसे चीजों
से समझौता करना ही पड़ता है ,
कभी ज्यादा
कभी कम
क्युकी वो जानती है
उसके हाँथ मे और कुछ नहीं ,
कोई जगह है नहीं
जहाँ वो जा सके ,
बाबुल के आंगन मे भी तो यही सीख मिलती है
"उस घर मे डोली जा रही है
 अर्थी भी वहीँ से निकलनी चाहिये  "
ये बात शायद बरसों पुरानी लगे
पर आज का सच भी यही है ,
ब्याह के बाद  मुसीबत आने पर भी
माँ बाप समझा बुझा कर भेज ही देते है ,
ज़माने के साथ बहुत कुछ बदला है
फिर भी ,
क्या लड़कियों का कोई अपना घर होता है  ??


रेवा













Friday, March 22, 2013

जीवन और प्रकृति

कल रात अचानक ही
बिन मौसम बरसात होने लगी ,
लैंपपोस्ट की रौशनी मे
बारिश की बूंदे
मोती की तरह प्रतीत हो रही थी  ,
और टप - टप झर रही थी
मानो असमान धरती पर
अपना प्यार बरसा रहा हो ,
पेड़ भी झूम झूम कर
ख़ुशी माना रहे थे ,
बिजली भी चमक - चमक कर मानो
रात के अंधियारे को रौशन कर रही थी ,
मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू
मन को महका रही थी ,
और मैं बाल्कोनी मे खड़ी
इस प्रकृति के सुन्दर मंजर
को निहार कर
मंत्रमुग्ध हो रही थी ,
और सोच रही थी की
ये प्रकृति का मंजर
जीवन के कितने नज़दीक है ,
जीवन मे भी ऐसे ही अचानक
बहार आती है
और हम बस मंत्रमुग्ध से
उसमे खो जाते हैं /

रेवा



Wednesday, March 20, 2013

शायरी जैसी लड़की

कितनी ही बार
तूने मुझसे एक अदद
साथी ढूढने की इल्तेज़ा
कि है ,
ऐसी जो तेरी शायरी
मे छुपे एहसासों जैसी हो ,
जो तेरे अनकहे
अल्फाजों को पढ़ सके ,
जो शायरी के
हर शेर की खुशबु है ,
जो उसमे मे बयां
लड़की की तरह
बेंतेहा प्यार करे तुझसे ,
पर क्या तुझे पता है की
ऐसी लड़की कहीं नहीं है
कहीं नहीं ,
क्यूंकि वो तो तेरी धड़कन
मे बसी ,
तेरे कलम से शब्द बन कर
पन्नो पर बिखरी रहती है /

रेवा




Monday, March 18, 2013

कैसे महसूस करे ?

हमेशा चाहा था उस चुलबुली लड़की ने की
कभी कोई उस पर भी कविता लिखे ,
जिसमे इतना प्यार झलकता हो
इतने गहरे एहसास हो
जितना उसकी आँखों मे भरा
रहता है ,
पर जब लिखा किसी ने
तब वो बस पढ़ ही पाई ,
उसमे भरे एहसासों को
महसूस न कर सकी ,
कैसे करती ?
वो दिलो जान से किसी और कि
जो हो चुकी थी /

रेवा

Wednesday, March 13, 2013

खास होने का एहसास

बात तो लगभग
रोज़ ही होती है तुमसे ,
पर कभी कभी ऐसी
कुछ बात हो जाती है की,
मन  मे एक अजीब सी हलचल
दिल मे गुदगुदी सी
होने लगती है ,
और तब लगता है
मैं हूँ
बिन पंख लगाये
मैं भी आकाश मे
उड़ने का अनुभव
कर सकती हूँ ,
खिली खिली धुप मे भी
सावन की पहली फुहार सा
महसूस कर सकती हूँ ,
ये सिर्फ किताबी बातें नहीं
"प्यार " सच मे हमे
खास होने का एहसास दिलाता है !

रेवा



Tuesday, March 12, 2013

मेरे जीने का आधार

हर रात 
जब मन दिन की उलझनों 
को भुला कर शांत होता है ,
और निंद्रा की गोद मे 
सामने को आतुर होता है  ,
तो पता नहीं कहाँ से 
दबे पाँव 
तेरी यादें दस्तक देने लगती है ,
और फिर 
मैं खुली आँखों से  
सपने देखते - देखते 
कब तेरी बाँहों मे समां 
जाती हूँ पता की नहीं चलता ,
तेरे साथ का ये एहसास 
तेरा प्यार 
यहीं तो है मेरे जीने का आधार 

रेवा 



Sunday, March 3, 2013

एक 'थी' छोटी सी मिनी

एक 'थी' छोटी सी मिनी
मस्त ,अल्हड़ ,हर वक़्त 
ठिठोली करती ,
बदमाशी की नयी-नयी 
योजनायें  बनाती ,
दीदी और माँ को पटा कर 
खेलने भाग जाती ,
बात बेबात भाई से झगडती 
दोस्तों को परेशान करती ,
खेल मे नक़ल कर
हमेशा जीत जाती , 
दुनिया की तमाम 
उलझनों से बेखबर ,
अपनी ही सपनो की दुनिया 
मे जीती ,
पर पता नहीं था उसे की 
सपनो मे और हकीकत मे 
कितना फासला है ,
आज उसे देख कर 
कोई नहीं बोलता की  
वो वही है ,
न हंसती न सपने 
देखती है ,
बस चुप चाप अपनी 
दुनिया मे कैद 
अपने फ़र्ज़ को निभाने 
की कोशिश करती है .....

रेवा 



Saturday, March 2, 2013

होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी

होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी 
अनकहे अनजाने से.......
बस बंध जातें है 
कभी जाने कभी अनजाने  
ख़ुशी कम देते है 
गम देतें हैं ज्यादा ,
होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी 
अनकहे अनजाने से .......
जब जब मिलते हैं 
न कर पातें हैं बातें 
आँखों मे बरबस आँसू दे जातें है 
वो मुलाकातें ,
होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी 
अनकहे अनजाने से .......
दुखी होते हैं हर बार 
फिर भी तडपते है ,
एक आवाज़ 
एक मुलाकात को ,
होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी 
अनकहे अनजाने से .......
बस मे होता तो छोड़ देते साथ 
पर जाने क्यों 
मजबूर हैं ,कर बैठते हैं वादें ,
होते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी 
अनकहे अनजाने से .....



रेवा