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Monday, December 16, 2013

पर गलती तो हमारी है



आज पुरे एक साल हो गए
उस भयानक रात को गुजरे 
पर क्या कुछ बदला है ?
कैसे बदलेगा ?
क्युकी 
गलती तो हमारी है ,

हम घर से बहार 
रात हो या दिन अकेले 
नहीं निकल सकते ,
क्युकी आज़ाद देश मे
हम आज़ाद नहीं  
पर गलती तो हमारी है ,

हम कपड़े पहनते है 
पर फिर भी लोग 
कपड़ो के निचे का 
तन देखते हैं 
पर गलती तो हमारी है ,

मोबाइल फ़ोन पर एप्प्स 
हाँथ मे चिल्ली स्प्रे लेकर 
हम चलते हैं 
फिर भी हम सुरक्षित नहीं 
पर गलती तो हमारी है ,

इस धरती पर हम जन्मे 
घर मे लाड़ प्यार से पले 
देवी बन कर पूजे गए ,
जिन हाँथो ने पूजा 
उन्हींने फिर अस्मत लुटा 
हम लुटे गए उसमे भी 
गलती हमारी है ,

ऐ भगवन 
नारी रूप मे इस धरती पर 
बार बार जन्म देना 
ताकि बार बार हम ये 
साबित करते रहे की 
नारी का जन्म 
गलती नहीं है 
वो लूट और भोग कि 
वस्तु नहीं है,
वो एक शक्ति का स्वरुप है। 


रेवा 



Sunday, December 8, 2013

जुदाई के पल




आज जब मैंने तुमसे बात की
तो मैं रो पड़ी
क्युकी कुछ महीनों के लिए
तुम दूर जो हो मुझसे ,
पर तुम हँस पड़े
और कहा ,
"दूर कहाँ
हमेशा तो मैं तुम्हारे साथ हूँ
तुम्हारे दिल मे ,
बस उस साथ को
महसूस करो ,
जुदाई के
एक एक पल को
हमारे प्यार से
इस कदर भर दो की
जब हम पीछे मुड़
कर देखें
तो हमारा मन
हमारे प्यार और संयम
को देखकर
दुगुने प्यार से भर उठे "
क्या बताऊँ तुम्हे की
तुम्हारी इन बातों को सुन कर
सारा गम
आँसू  बन कर बह गया
और रेह गया बस प्यार।


रेवा 

Friday, December 6, 2013

माँ बाप और बच्चे





ज़िन्दगी का हर पड़ाव हमे कुछ न कुछ सिखाता है। 


आज खड़े हैं हम वहाँ जहाँ कभी हमारे माँ बाप थे 
हम भी सुनते है वो जवाब बच्चों से 
जो कभी वो हमसे सुना करते थे ,
आज टूटता है हमारा भी दिल 
जब बच्चे कुछ "पूछने" को "टोकने "
का नाम देते हैं ,
आज हम भी रोते हैं जब 
अपने दिल के टुकड़ों कि चिंता को 
"टेन्शन" और "ओवर रियेक्ट" का नाम 
दिया जाता हैं। 
आज हम भी सोच मे पड़ जातें हैं जब 
उन्हें हर छोटी बड़ी बात सिखाने के बाद  
सुनते है "आप नहीं समझोगे ",
आपका जमाना कुछ और था 
हमारा कुछ और ,
तब हम अपने माँ बाप 
का नजरिया नहीं समझते थे 
और आज हमारे बच्चे हमारा,
शायद ये प्रक्रिया चलती रहेगी हमेशा 
अंत मे ये कहूँगी 

"नमन हर माँ बाप को 
उनके संयम और प्यार को 
उनके रूप में 
धरती पर बसे
भगवान् को "

रेवा 

Monday, December 2, 2013

सृजन से दूर



इन दिनों काफी मसरूफ रही
ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ ,
पर मैं सृजन कि दुनिया
से दूर हो गयी ,
ऐसा लगा मानो
अपनी रूह से जुदा हो गयी ,
बिना अपने एहसासों को
व्यक्त किये
जीना कितना दुश्वार है
ये पता चला ,
लगा जैसे
बहते पानी को
रोक दिया है किसी ने ,
आज मैं तहे दिल से
उस लम्हे का शुक्रिया
करना चाहती हूँ
जिस लम्हे मैंने
अपने एहसासों को
व्यक्त करना शुरू किया
और आप सब का भी
आपने मेरा  भरपूर साथ दिया।

"कविता जगत को कोटि कोटि धन्यवाद "


 रेवा