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Sunday, March 2, 2014

क्या कहूँ



क्या कहूँ !!
इन दिनों मन कैसा हो रहा है 
चिड़ियाँ के बच्चे जब उड़ना 
सीख जातें है तो 
घोसला छोड़ कर 
चले जाते हैं न ,
आज मेरे बेटे कि 
हॉस्टल जाने कि बारी आयी 
तो मैं इतना कमज़ोर 
क्यों हो रही हूँ ?
सब के बच्चे जाते हैं ,

पर ये मन को समझाने 
के लिए अच्छी सोच है ,
पर एक माँ को समझाने 
के लिए नहीं ,
उसकी ममता कि व्याकुलता 
को शांत करने के लिए नहीं ,

शायद हम बच्चो को बड़ा 
करने में ,इतने 
मशगूल हो जातें हैं की ,
सबकुछ भूल ही जाते हैं 
ये भी कि एक दिन 
वो दूर भी जाएंगे ,
और छोड़ जाएंगे 
बस एक खालीपन। 


रेवा 

17 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. मेरे भाई जब बाहर जाते थे तो माँ कहती थीं की कलेजा मेन कलछुल चलेला ...... मेरी हंसी छुट जाती थी ..... ज़ोर से हंसने की आदत थी ..... माँ घूर कर देखती थी .....
    जब पहली बार मेरा बेटा बाहर गया तो मुझे अपनी माँ की काही बात याद आई और तब मैं उनको समझ पाई ...... आज तुम्हें भी समझ रही हूँ ......

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  3. i can feel it... anyways nice lines!!

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  4. आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    --
    आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (03-03-2014) को ''एहसास के अनेक रंग'' (चर्चा मंच-1540) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!

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  5. बच्चों के भविष्य के लिए कुछ सहना होता है...बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना....

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  6. hota hai ..main bhi char sall tak dono bachho se dur rah kar dekha...ek to ab bhi bahar hai ..bhvishy ki ujjaval kaamnao ke sath meri shubhkamna ....

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  7. बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए माँ को ये सब सहना ही होता है , ममता ऐसी ही होती है रेवा जी , मेरा बेटा भी तीन सालों से बाहर ही है पर भविषय बनाना है तो भेजना ही पड़ता है । शुभकामनायें आपको ।

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  8. shukriya aap sabka apne apne ehsas mere saath batein

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  9. mann ki bhavnao ko bahut khoobsurati se darshati ho Rewa aap. bahut sunder.

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