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Sunday, September 6, 2009

धरती की प्यास


दिल रूपी धरती कर रही बार-बार गुहार
कब पड़े इस पर बारिश की फुहार ,
ऐसा न हो की धुप की तपिश सहते-सहते
इसमे पड़ जाए दरार ,
यह इतना सख्त हो जाए की
भूल जाए सुहाना प्यार 
भूल जाए अपनी हरी भरी दुनिया
चिड़ियों के साथ चहकना 
हवा के साथ बलखाना
बारिश की बूंदों के साथ लहलहाना ,


बस रह जाये एक बेजान पहचान !




रेवा