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Tuesday, April 10, 2018

स्त्री हूँ मैं






स्त्री हूँ मैं
पर अबला नहीं हूँ
बंद कर दो मुझे
इस नाम से पुकारना
मुझे कमज़ोर लिखना,
मैं अपना मुकद्दर
ख़ुद लिखना जानती हूं
किसी से बराबरी की
कोई जद्दोजहद नहीं
साबित करने की कोई होड़ नहीं
मर्दों की अपनी जगह है
और मेरी अपनी
धरती पर ये दोनो
एक दूसरे के पूरक हैं
बार बार बराबरी की बातें कर
हम ये साबित करने पर तुले हैं की
हम कमतर है
न हम कमतर हैं न सर्वोच्च
हम तो ख़ुद में पूर्ण
ईश्वर के सुंदर सृजन में से एक हैं !!


रेवा 

Thursday, April 5, 2018

ज़िन्दगी जीना चाहती हूं



मैं ज़िन्दगी जीना 
चाहती हूं
नशे के घूंट की तरह
पीना चाहती हूं ...
बूँद बूँद कर हर रोज़
कम हो रही है न
इसकी मियाद
और मैं उस बूँद के
वजूद को क्यों
समझ नहीं
पा रही हूँ ??
वो जो खो गया
मिल गया मिट्टी में
अब लौट के आयेगा ??
नहीं न
बस ...बस..तो फिर
अब बहुत हो गया
हर बूँद को अपनी
आंखें बंद कर
अपने चेहरे पर
महसूस करुँगी,
कभी अपने होठों की
प्यास बुझाऊंगी
और कभी उस बूँद
को बौछार बना
तुम्हे भिगो दूँगी
तो तय रहा
आज से
न न बल्कि अभी से
बूँद बूँद जियूंगी मैं !!


रेवा