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Thursday, July 5, 2018

ग़रीब जो ठहरी


रोज़ सुबह उठकर
आंखों की रौशनी से
भगवान के आगे 
दीप जलाती है वो
ताकी ज़िन्दा रहे 
उसका इकलौता बच्चा
ग़रीब जो ठहरी

केवल पानी से करती है
पेट भर नाश्ता
और निकल पड़ती है
किसमत के पत्थर को
मजबूरी के हथौड़े से 
तोड़ने  
ग़रीब जो ठहरी 

बरसात में टपकती है 
जब उसकी झोपड़ी
हाथों के खुरदुरे बिस्तर पर  
मैली आँचल के छत्ते तले
सुलाती है बचाकर बूंदों से 
अपने मासूम बच्चे को
वो एक माँ भी है 
पर ग़रीब जो ठहरी 

न रगों में अब लहू है
न जिस्म में कुछ पानी
न आंखों में आंसू हैं 
न पुतलियों पर नमदारी 
वो तो बस 
गरीबी पहनती है 
गरीबी खाती है
गरीबी ओढ़ती है 
गरीबी बिछाती है 
और एक दिन
ग़रीब संग गरीबी मर जाती है 

रेवा 

9 comments:

  1. लाजबाव रचना गरीबी का मार्मिक और यथार्थ चित्र

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  2. दिल को छू गई आपकी रचना रेवा जी बहुत बढ़िया

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  3. Replies
    1. शुक्रिया लोकेश जी

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  4. गरीबी पर बहुत ही सजीव चित्रण किया हैं आपने

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