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Wednesday, May 28, 2014

तेरी आवाज़




मैं हर रोज़ नए - नए
मनसूबे बनाती हूँ
तुमसे बात न करने के ,
पर कामयाब हो ही नहीं पाती
कभी दिल कमज़ोर पड़ जाता है
कभी दर्द ज्यादा बढ़ जाता है ,
कभी मौसम मना लेता है
कभी तेरा प्यार याद आ जाता है
कभी तुम्हारी कही गयी बातें ,
कभी वो समझ जिससे हमेशा
मेरी बात मुझसे पहले ही
पहुंच जाती है तुम तक............
शायद
तेरी आवाज़
मेरी आदत
और आदत
ज़िन्दगी बन गयी है अब।


रेवा

Saturday, May 24, 2014

एहसासों कि दुनिया


आज न जाने मन को
क्या हुआ है ?
बस में ही नहीं आ रहा
कमबख्त ,
वो एहसास जिससे
मैं दूर चले जाना चाहती थी ,
आज रह रह कर परेशान
कर रहा है,
ये एहसासों कि दुनिया
कभी - कभी इतनी
जटिल क्यों हो जाती है ?
मैंने तो सोचा था
मेरा खुद पर ज़ोर है
किसी भी छण
कमज़ोर नहीं पडूँगी ,
कुछ भी हो जाये
इन एहसासो को अपने
आस - पास फटकने न दूंगी ,
पर आज
ऐसा महसूस हो रहा है जैसे
हवा के हर झोकें मे
तेरा ही स्पर्श है  ,
साँसों में बस
तेरी ही खुश्बू है,
लगता है
तुझे महसूस
करने ही तो ये
चल रही है ,
कैसे जीयूं तुम बिन ?
यही समझाने आजा.......
मेरी धड़कनों को करार
देने आजा......
मौत तो रोज़ ही आती है
तुम बिन.......
एक बार जीने का भी
एहसास करा जा..............


रेवा 

Monday, May 19, 2014

कठिन डगर


दुःख परेशानी
वैसे तो सबको होती है
पर कभी कभी ये
इतना ज्यादा सर चढ़ कर
बोलती है की
लगता है दुनिया में
मुझसे ज्यादा दुखी
कोई नहीं ,
तब वो सारी
सकारात्मक सोच
रफ़ूचक्कर हो जाती है ,
वो सारी अच्छी बातें
जो हमने कभी पढ़ी थी
और सोचा था  की
मुश्किल घड़ी मे याद
रखेंगे इन्हे
अचानक दिमाग से
गायब हो जातें हैं ,
और हम रह जातें हैं अकेले
खुद से और परेशानियों से
लड़ने के लिए ,

"सफर है कठिन
डगर है कठिन
पर ऐ ज़िन्दगी
मैं भी हूँ कठोर

पार कर ही लुंगी
इन रास्तों को
चाहे तू कितना
भी लगा ले ज़ोर "


रेवा


Monday, May 12, 2014

अस्तित्व

आज क्या लिखूं ?
हर बार यही सोचती हूँ
और फिर
हमेशा तुम्हे हि लिखतीं हुँ
कब तुमने मुझे प्यार किया
कब तिरस्कार ,
कैसे तुमने मेरी कद्र कि
और कैसे मेरी तरफ़ से आँखें हि
मुंद ली ,
तुम्हे हि तो नापती तौलती
रही ,
क्या मेरा अस्तित्व तुम्हारे
बिना कुछ नहीं ?
"मैं" का "हम" मे बदलना
क्या अलग अस्तित्व के
मायने ख़त्म कर देता  है ???

रेवा

Monday, May 5, 2014

दो पाटों के बीच पिसती औरत …


दो पाटों के बीच पिसती औरत.……पति और बच्चे ....... न बच्चों कि उपेछा कर सकती है न पति की
परेशानी तो तब होती है जब एक ऐसा फ़ैसला करना पड़े....... जिसमे एक तरफ़ पति कि सेहत.......
जो अकेले रह कर नहि संभल रहि और दूसरी तरफ़ बच्चों कि खुशियां.......जो जगह नहीं बदलना चाहते....... दोनो को नज़रंदाज़ करना बहुत मुश्किल  , एहमियत तो हमेशा सेहत को हि देनीं पडती है।
पर फिर रोज़ बच्चों के उदास उतरे हुए चेहरे देखकर खुद को कोसे बिन नहि रह पाती है वो माँ ।
चाहे गलती उसकी बिलकुल भि न हो फ़िर भी …………

ये तो एक मन कि अवस्था है , एक स्थिति है ,पर ऐसी कई मानसिक परेशानियों से आये दिन रूबरू
होना पड़ता है.…फिर भी उसे कोइ समझ नहि पाता , न हि वो मान - सम्मान  मिल पाता है
जिसकी वो हक़दार है ,जब अपने हि घर पर उसे वो इज़्जत वो समझ नहि मिलती , तो हम समाज़
से कैसे अपेछा कर सकते हैं।

रेवा



Thursday, May 1, 2014

मेरे सवाल ?


शाम को घोंसलों कि तरफ़ उड़ान
भरने वाले पछियों के जीवन में
नयी सुबह की चहचाहट
जरूर आती है ,
पर घड़ी की टिकटिक
के साथ ,
हर काम करती एक स्त्री के
जीवन में सुबह क्यों नहीं आती ?

घर के हर सामान को
प्यार से सजाने वाली कि
ज़िन्दगी ,
क्यूँ प्यार से खाली रहती है ?

उसके मन के भावों को
क्यों उसके अपने
नहीं पढ़ पाते ?

क्यों जब वो अपने बारे
में सोचती है तो
उसे ऐसा लगता है की
वो मात्र एक यन्त्र है ?

जिसे रुकना तो दूर
बिगड़ने का भी हक़ नहीं ?
और "दिल तो यन्त्र में
होता ही नहीं" !

जब वो सबको खुश रखने की
भरपूर कोशिश करती है तो
क्यों उसे बोला जाता है की ,
"खुद को खुद से खुश रखना सीखो "
फिर घर परिवार पति बच्चों
का क्या मतलब ?
जो उसके सबसे ज्यादा
अपने होते हैं।

"क्या आप दे सकते हैं मेरे इन सवालों के जवाब "?

रेवा