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Monday, July 16, 2018

पता





स्त्री हैं हम
हमारा कोई
स्थायी पता नहीं होता
जहाँ हम पैदा
होतीं हैं वहां
ताउम्र रहतीं नहीं
जहाँ उम्र गुजारती हैं
वहां कुछ इस तरह
रहती हैं
जैसे पांव के नीचे
खाई हो जिसमें
हम धस नहीं सकती
और सर पर जो
नीला आसमान है
उस पर पंछी बन
उड़ भी नहीं सकती
ज़िन्दगी इनके
बीच तारतम्य बैठाते
गुज़र जाती है ....

#रेवा 
#स्त्री 

#अमृता की "खामोशी के आंचल में"
पढ़ते हुए

8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 17 जुलाई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. शुक्रिया यशोदा बहन

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-07-2018) को "समय के आगोश में" (चर्चा अंक-3036) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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