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Thursday, February 7, 2013

मैं ही क्यों ?

ये आंसू भी कमबख्त
अनचाहे मेहमान की तरह
बरस ही जाते हैं ,
जैसे जैसे दिल
अपनी तकलीफों के
बारे मे सोचता है
ये अपना काम करते रहते हैं ,
सोच भी पता नहीं क्यों
आ ही जाती है ,
अरे तकलीफ तो ज़िन्दगी
का हिस्सा है ,
पर नहीं
हमें लगता है की
हमारी तकलीफ सबसे बड़ी है ,
और हम कभी खुद को
कभी भगवान को कोसते हैं
की मैं ही क्यों ?
पर जब अच्छा होता है तो
कभी नहीं बोलते "मैं ही क्यों "?
पर हम इन सबसे
उपर उठ नहीं पाते ,
शायद इसलिए इन्सान
कहलाते हैं/


रेवा



9 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  2. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 09/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  3. Man is man God is God.

    इनायत जब खुदा की हो तो बंजर भी चमन होता
    खुशियाँ रहती दामन में और जीवन में अमन होता

    मर्जी बिन खुदा यारों तो जर्रा भी नहीं हिलता
    अगर बो रूठ जाए तो मुयस्सर न कफ़न होता

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  4. rewa ji ...aisa hi kuch hai hum sabke saath...ye rachna ..zindagi ka aaina hai!

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  5. vah kya khoob andaz hai ,behatareen

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  6. बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

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  7. Parulji, madhu ji , sushmaji shukriya

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