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Thursday, May 9, 2019

अपना घर



अपने घर का एहसास 
कुछ अलग ही होता है 
ऐसी शांति मन को 
मिलती है
जिसे शब्दों में बयां करना
नामुमकिन है

एक अजीब सा रूहानी
सुकून महसूस होता है
हर एक ज़र्रे हर एक
कोने से प्यार हो जाता है
घर का ईट ईट
लगता है हमारे एहसासों
से जुड़ा है

अपना एक कोना मिल
जाता है
जो कोई नहीं छीन सकता
ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत
लगने लगती है
हर गुज़रता लम्हा
संजो लेने का
मन होता है

अपना आशियाना
बड़ा हो या छोटा
सजा हो या फिर
बेतरतीब
कैसा भी हो
अपना होता है

#रेवा

Friday, March 29, 2019

अक्षर


कभी कभी बस
चुप चाप बैठ कर
सोचने का मन होता है
पर दिमाग उलझनों में
उलझा रहता है
और कुछ समझ नहीं आता

तब ये अक्षर मेरे पास
आते हैं और
चुप चाप मेरे कंधे पर हाथ
रख कर मेरे पास बैठ जातें हैं
मैं अपने सारे सवाल
सारे ख़याल सारी उलझनें
इन अक्षरों के हवाले कर देती हूँ
जो स्वतः ही सब ले लेते हैं
और मेरा मन और दिमाग
शांत हो जाता है

ये अक्षर नहीं
मेरे सबसे प्यारे
दोस्त हैं

#रेवा
#अक्षर

Monday, March 11, 2019

बंद करो


बंद करो रक्त पात
बंद करो युद्ध की बात
बंद करो अहंकार का ये खेल
कहीं कोई भी मरे सब इंसान है
कम से कम ये तो देख 
माँ का भाल न लाल के खून से
लाल करो
इंसान हो जानवरों सी बात न करो
बंद करो रक्त पात
बंद करो युद्ध की बात

Tuesday, March 5, 2019

हूँ इन्सान


हाँ मैं हूँ एक माँ
खड़ी ढाल की तरह
अपने बच्चों के साथ 
उनके हर तकलीफ़ में
डट कर सामना करने को
उन्हें बचाने को तैयार
चाहे हालात कैसे भी हो
चाहे मुसीबत कैसी भी हो
पर फिर भी हूँ इन्सान
उस दिन उस शाम
कुछ मिनट पहले ही
देखा था अपनी दस साल की
बच्ची को खेलते हुए
और बाद के कुछ मिनटों ने
दुनिया बदल दी मेरी
नहीं बन पाई मैं अंतर्यामी
जो देख लेती होनी को
नहीं बचा पाई मैं अपनी
बच्ची को उस वहशी से
जिसने गंदे इरादे से
बच्ची को बंद कर लिया
अपने साथ
पर कामयाब न हो सका
लेकिन इस हादसे ने
डर दुख तकलीफ
भर दिया उस बच्ची
और माँ के अंदर
रोती रही ज़ार ज़ार
बच्ची को छाती से
लगाए यही सोचती रही
गलती मेरी है
नहीं रक्षा कर पाई
अपनी बच्ची की
नहीं बन पाई अंतर्यामी,
दुर्गा काली नहीं नहीं नहीं
बन पाई
नहीं बन पाई माँ
माँ का दर्जा बहुत ऊँचा है
सदा रहेगा पर
है वो इन्सान
है वो इन्सान

Tuesday, February 26, 2019

सिंदूरी रोशनी




उलझे रहे हम 
ज़िन्दगी के सफर में
इस कदर
न दिन की रही खबर
न ही शाम का रहा ख्याल
थक कर हर रात बस
ख़्वाबों की गोद में
पनाह ले ली

कभी देखा ही नहीं
सुबह की सिंदूरी रोशनी
कभी सुना ही नहीं
पंछियों का कलरव
कभी महसूस नहीं किया
सुहाना मौसम

भागते रहे बस हर रोज़
चिन्ता लिए कैसे होगा सब ??
सीमित आमदनी
तो सीमित साधन
कैसे चलेगा संसार ??

पति, बच्चे और घर
का ख़याल बस यही
बन गया जीने का आधार

अब जब कभी आती है
बारी इन सब से थोड़ा सा
निकलने की तो पैर
डगमगाते हैं 

सोच, मन साथ नहीं देता
घर में एक कोना
भला सा लगता है

चाहत का चाहतों ने ही
कब का अंतिम संस्कार
कर दिया
प्यार की मद्धम रोशनी
अब बुझ गयी है
उसे बस किताबों में
पढ़ना भला लगता है

लेकिन विवेक ये
कहता है अब बस
कुछ साल
अब ख़ुद के लिए जी
और देख
जीवन की सुबह
और शाम दोनों
सिंदूरी होते हैं

#रेवा

Friday, February 8, 2019

भिखारी


कभी ध्यान से
देखा है
उन भिखारियों को
जो कटोरा लेकर
पीछे पीछे आते हैं
गिड़गिड़ाते रहते हैं
किसी भी तरह
पीछा नहीं छोड़ते
चाहे उनका अपमान करो
या डांट लगाओ
तरह तरह से कोशिश
करते रहते हैं

वैसा ही हाल होता है
उन लोगों का जो वोट मांगते हैं
तरह तरह से प्रलोभन देते हैं
५ साल में काया पलट की
बात करते हैं
गरीबों को लालच दे कर लुभाते हैं
पर पीछा नहीं छोड़ते

जानते हैं दोनो में अंतर क्या है
बस इतना की
भिखारी अपने पेट की आग
शांत करने के लिए मांगता है
और ये कुर्सी और धन की
लालसा लिए मांगते हैं

एक के कपड़े मैले और
हाथ में कटोरा है
दूजे के सफ़ेद झक कपड़े हैं
और दोनों हाथों में कटोरा है
पर भीख दोनो ही मांगते हैं 
पर भीख दोनों ही मांगते हैं

#रेवा



Monday, February 4, 2019

सच


लिखने के लिए बहुत कुछ है
राजनीति, समाज मैं फैली
गंदगी का सच
आँखों में रड़कते धूल के कण का सच
नक़ाब के पीछे चेहरे का सच
मिट्टी का सच
सादा लिबास और रंग
का सच
मंदिर, मस्जिद ,चर्च और गुरुद्वारे
का सच
नाजायज़ शब्द का सच
रिश्तों में पनपते रिश्ते का सच
फ़कीर और भिखारी का सच
इट पत्थर और घर का सच
दोस्ती और दुश्मनी का सच
बातों और हरकतों का सच
आईना दिखाने वाले साहित्य का सच
पर ये सब , सब देख समझ रहें हैं
इसलिए मैं लिखती हूँ
प्यार का सच
और बोती हूँ बीज आत्माओं में
प्यार का
क्योंकि अगर दुनिया को कुछ बचा
सकता है तो वो है प्यार

#रेवा 

Thursday, January 31, 2019

गृहिणी


मैं एक गृहिणी हूँ 
सुबह के आकाश का रंग
देखना चाहती हूँ
पर नहीं पहचानती
नहीं छू पाती सूरज की
किरण
नहीं सुन पाती
मधुर संगीत
नहीं महसूस कर पाती
वो ताज़ी हवा
नहीं जी पाती सुबह

वो उठते ही दौड़ती है
रसोई में वही है
उसका आकाश
सूरज की बजाय वो
आग का रंग देखती है
संगीत की बजाय
सुनती है आवाज़ें
फरमाइशों की
टिफ़िन और नाश्ते में
परोस देती है
ताज़ी हवा

धो देती है सुकून के पल
कपड़ों के साथ
फिर सूखा देती है अपनी
ख्वाहिशें
और तह लगा कर रख
देती है अपने ख़्वाब

बच्चे बड़े हो जातें हैं
वो जवान से बूढ़ी हो
जाती है
पर ये क्रम
अनवरत चलता
रहता है जैसे
सुबह संग सूरज

#रेवा

Tuesday, January 22, 2019

तुम



तुम्हें ये महज़ बातें लगती हैं 
मुझे एहसास
तुम्हें ये बरसात नज़र आती है
मुझे मिट्टी की खुश्बू
तुम्हें सिर्फ़ आँखें नज़र आती हैं
मुझे उनमें घुलते जज़्बात
तुम्हें एक ख़याल छू कर चला जाता है
मुझे रेशमी याद
तुम्हें ज़रूरत समझ आती है
मुझे इश्क़
तुम्हें लॉजिक चाहिए
मुझे प्यार और ख्याल
तुम्हें सपनों में सपने समझ आते हैं
मुझे हक़ीकत
तुम्हें देह समझ आती है
मुझे रूह
तुम्हें सिर्फ तुम समझ आते हो
और मुझे भी बस तुम

#रेवा

Sunday, January 20, 2019

ग़रीब


चलो बादलों की
जेब से
सूरज चुरा लायें
रख दे फिर उसे
उन गरीबों की 
बस्ती में
ताकि कोई भी
ठंड से न हो
उन्ही बादलों के हवाले
रात फिर ठण्डी
हवाओं को
भर दें
बादलों के
जैकेट में
और ओस की बूंदों को
चाँद की टोपी
में छुपा दें
ताकि ठंड में भी
सो सके फुटपाथों पर
सुकून की नींद

Tuesday, January 1, 2019

लम्हा


वो लम्हा वो पल
कुछ उसमें मैं रह गयी हूँ
कुछ वो मुझ में समा गया है

उस पल को जितना
जीती हूँ वो मुझे
उतनी ही ऊर्जा से
भर देता है

चाहे वो पल क्षणिक ही था
पर धीरे धीरे दिल की
तहों में घुल  कर
जीने का बहाना बन
गया है

मैं जानती हूँ
जीवन में अब कभी
वो पल दोबारा नहीं आएगा
मैं चाहती भी नहीं

क्योंकि मैं उस लम्हे से
मिले एहसास को उसके 
संपूर्ण प्रगाड़ता के साथ 
अपने जीवन की
बहुत प्यारी याद
बना कर रखना
चाहती हूँ

और जब जी चाहे 
उस लम्हे को 
यादों के रेशमी धागों 
से निकाल कर जीना 
चाहती हूँ !!!!!


#रेवा
#एहसास