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Wednesday, August 28, 2019

जरुरत



मुझे जब तुम्हारी जरूरत थी
जब मैं टूटने लगी थी
जगह जगह दरारें पड़ने लगी थी
तुम देख कर समझ न पाए

मैंने तुम्हें आवाज़ लगाई
एक बार दो बार नहीं
कई कई बार
पर हर बार अपनी
उलझनों में उलझे तुम्हें
मैं, मेरे एहसास जरूरी न लगे

पर मैं टूटी नहीं बिखरी नहीं
ख़ुद को समेटा अपनी दरारों को
भर तो न पाई पर उन्हें इस तरह
से ढका की वो खूबसूरत दिखने लगी
और मैं उनके साथ जीने लगी

आज अचानक तुम्हें मेरा ख्याल आया
तुम आये मेरे पास
पर अब मैं तुम्हें फिर से इज़ाज़त
नहीं दे पाऊँगी की तुम
उन दरारों को फिर से बदसूरत
दर्द भरा कर दो और फिर
डूब जाओ अपनी उलझनों में

मैं खुश हूँ उनके साथ अपने साथ
मुझे वैसे ही रहने दो..

Saturday, July 27, 2019

क्या कोई सुन सकता है




क्या कोई सुन सकता है
देख सकता है
खामोशी के अंदर का शोर

मन के अंदर छुपी बैठी वो
अलिखित कविता
वो मन के कोने में बैठा
एक छोटा सा बच्चा

महीने भर का हिसाब किताब
और उसमे छिपा बचत
उस बचत से जाने
क्या कुछ न ख़रीद लेने की
योजनाएं

घर के सारे दिन के काम काज
के बीच आसमान के टुकड़े के साथ
कुछ सुकून के पल

घर के लोगों के बीच तारतम्य बैठाती
औरत की खुद की टूटन
खुशी के पलों के लिए अपनी ही
टूटन जोड़ती वो स्त्री

सारे दिन मन के अंदर चलते
सवाल और जवाब
और उनमें खुद को दिए जाने
वाले दिलासे के
सब....ठीक हो जाएगा

मन की सोच के साथ
ढुलकते वो दो आँसू
क्या कोई सुन सकता है
देख सकता है

#रेवा




Tuesday, July 23, 2019

इश्क़





जब कविता शायरी से
मिलती है तो होता है इश्क़

जब साहिर अमृता से
मिलते हैं तो होता है इश्क़

जब भक्त भगवान से
मिलते हैं तो होता है इश्क़

जब राधा कृष्ण मिलते हैं
तो होता है इश्क़

जब तेरे शहर से होकर हवा
मुझे छू जाती है
तो होता है इश्क़

#रेवा
#इश्क़

Tuesday, July 2, 2019

बस्ती


आओ न
इन गूंगों की बस्ती में
तुम्हारा भी स्वागत है
यहां पर सिर्फ रंग चलता है
सफेद, हरा, लाल, भगवा
ब्लू, काला,पीला
यह फतओं और
फरमानों की बस्ती है
यहाँ चुप्पी का रिवाज़ है

लुटती है बीच सड़क इज़्ज़त
पर सभी चुप होकर
रंग मिला कर
बैठ जाते हैं शांत
कोई इंकलाब पैदा नहीं होता
नित नई लाशें
अपने रंग के कंधों पर
ढोई जाती हैं
आम आदमियों का
कोई रंग नहीं होता
इसलिए हर एक रंग की लाशों को
ढोते-ढोते इनके काँधे
बदरंग हो चुके हैं

ये सफेद रंग के लोग हैं
दंगों, और दहशतों के आका
इन्हीं के साये में
जीते हैं ये आम लोग
डर-डर कर और सहमे से
यह जिसका अन्न खाते हैं
उसे ही सूली पर चढ़ाते हैं
फिर भी चुप रहते हैं आम लोग

आओ न तुम भी
कोई नया रंग लेकर
इन गूँगों की बस्ती में
हम आम लोग
तुम्हारा भी स्वागत करते हैं
हथियार ज़रुर लाना
यहाँ डर का बोलबाला है।


रेवा 

Tuesday, June 18, 2019

घर




उस मकान को देख रहे हैं न 
उसको घर बनाने का सच
क्या पता है आपको ??
कितनी बहस
कितने आँसू
कितने तकरार
कितने अरमान
कितने रत जगे लगे हैं

सारी जिंदगी नौकरी
करने वाले की
पसीने से जमा की हुई
पूंजी लगी है
बूढ़े बाप का सपना
बीवी का अरमान
बच्चों का ख़्वाब
बहनों का आशीर्वाद
लगा है
उस एक मकान को
घर बनाने में
सालों भगवान के आगे
प्रार्थना के दीप लगे हैं
इस एक सपने को
पूरा करने में अनगिनत
ख़्वाहिशों को यूँही
हँसते हुए क़ुर्बान किया है

उस घर का हर कोना
इबादत है दुआ है
भावनाओं का सागर है
इसलिए वो सिर्फ
ईट सीमेंट का घर नहीं
वो एहसासों का मन्दिर है

#रेवा

Friday, June 14, 2019

पालनहार




तू ही तो पालनहार है
तू ही तो खेवनहार है
पर तू है कहाँ

सुना है
तू कण कण में है
बच्चों के मन में है
तो फिर उनकी रक्षा
क्यों नहीं करता ??

ईमानदार निश्छल
इंसान की तू सुनता है
ऐसा सुना था
पर वो खून के आँसू
रोते हैं
तू उनकी सुनता क्यों नहीं ??

सुना है तुझे सिर्फ दिल से
याद करो, आडम्बरोँ से तू
खुश नहीं होता
फिर अमीर को और अमीर
और ग़रीब को और ग़रीब
क्यों बना रहा है ?

सुना है तू उनकी मदद
करता है जो अपनी
मदद ख़ुद करते हैं
तो आज बता क्या
लड़कियाँ कभी कुछ
नहीं करती
अपनी मदद नहीं करतीं
फिर क्यों अत्याचार
बढ़ रहें हैं उन पर

अगर तू है कहीं तो आ
आज मेरे सारे सवालों
के जवाब दे कर जा
वर्ना मैं नहीं मानती
की तू कहीं है

#रेवा

Wednesday, June 12, 2019

आँखें



आँखें बहुत कुछ 
देखती है कहती हैं
जो देखती है समझती हैं 
उससे चहरे के भाव
बदलते हैं
आँखों की भाषा
बहुत मुश्किल है
पर गर मन से पढ़ा जाए तो
पढ़ना बहुत आसान है


यहाँ मेरे जीवन से जुड़ी
तीन परिस्थितियों का
वर्णन करना चाहूँगी
जो मुझे कभी भूलती नहीं
देखी थी मैंने माँ की आँखें
बेटी को दुल्हन
रूप में हौले हौले चलते
जब निहार रही थी
एक पल आँसू
बिटिया के जाने का दुख
पर दूजे पल आँसू मिश्रित हंसी
जैसे ख़ुद से कह रही हो
रो मत बिटिया की खुशी के दिन है

देखी थी मैंने वो दो
आँखें जो पति
के प्यार करने पर
उन्हें जीवन से
भरपूर हो निहार
रही थी
ये उन आँखों को भी
पता नहीं था कुछ पल
बाद ही जिसे वो निहार
रही है वो रहेगा ही नहीं

देखी थी वो आँखें
जो पति के जाने
के बाद ख़ामोश
सूनी, मृत समान
हो गयी थीं
वक्त के साथ
अब समझदारी ओढ़े
जीवंत हो गयी है

आज फिर देखी दो जोड़ी
आँखें पति को
अंतिम विदाई देते
आँखों से मनुहार करते
प्यार जताते और फिर
आँसुओं को जज़्ब करते
जैसे कह रही हो
तुम अब आँखों में बस गए हो
आँसू गिरा कर तुम्हें
आँखों से बहाना नहीं चाहती

Saturday, June 8, 2019

साहिर और अमृता


अमृता का प्यार
सदाबहार
उसके गले का हार
साहिर बस  साहिर

उसका चैन उसका गुरूर
उसकी आदत उसकी चाहत
उसका सुकून उसकी मंज़िल
साहिर बस साहिर

उसकी ताकत उसकी हिम्मत
उसकी लेखनी उसकी कहानी
साहिर बस साहिर

उसका दिल उसकी सांसें
उसकी जिंदगी उसकी बंदगी
उसकी आशिकी उसकी ख़लबली
साहिर बस साहिर

फिर क्या हो गयी बात
क्यों छोड़ दिया था साथ
यह दरार यह दूरी
यह तन्हाई यह रुस्वाई
यह बेबसी यह मजबूरी
यह खटास यह अलगाव

क्या यही था किस्मत का लिखा
क्या यही था अंत दोनों का
क्या यही थी जुस्तजू उनकी
क्या यही थी आरजू़ उनकी
या ग़लतफहमी
या शक
या आत्म सम्मान का 
पड़ा कोई रोड़ा
या हालात की मार 

जो भी थी बात
वो कभी पन्नों ने दर्ज नहीं किया
दुनिया ने महसूस नहीं किया
लोगों के बीच आया नहीं
किसी ने सोचा नहीं
किसी ने बताया भी नहीं

वो दो होते हुए भी एक थे
एक रहे जीवन भर
जीते रहे एहसासों में 
एक दूजे के लिए
संगसंग आखिरी दम तक
अमृता का प्यार साहिर तक
जीना साहिर तक
मरना साहिर तक
होना साहिर तक
मोहब्बत और साहिर के बीच
केवल अमृता।

Tuesday, June 4, 2019

कैसे लिखूं कविता





कैसे लिखूं कविता
क्या लिखूं की
गरीब माएं मजबूरी में
बेटियों को धन्धे पर
लगा देती हैं 
ताकि पेट भरता रहे

क्या लिखूं की
कूड़े के ढेर से चुन कर
सड़ी गली चीज़ें खाते हैं
बच्चे ताकि उनकी
भूख मिट सके

क्या लिखूं की
फेक दी जाती है बेटियाँ
पैदा होते ही
या कभी कभी पैदाइशी
से पहले गिरा दी जाती हैं

क्या लिखूं की
होते हैं बलात्कार रोज़
अटे पड़े हैं अखबार
इन खबरों से
शाम को जब तक बेटियाँ
घर न आ जाएं
हर पल कई मौत
मरते हैं घर वाले

क्या लिखूं की
आरक्षण , बेरोज़गारी
मार रही है
युवाओं को

या ये लिखूं की
पैसा पैसा और बस पैसा
कमाने की होड़ में
जीना भूल रहें है लोग

पर इन सब के बावजूद
आज भी इंसानियत कायम है
प्यार कायम है
और इसी वजह से चल रही है
ये दुनिया
तो बस मैं यही लिखना चाहती हूं

Thursday, May 9, 2019

अपना घर



अपने घर का एहसास 
कुछ अलग ही होता है 
ऐसी शांति मन को 
मिलती है
जिसे शब्दों में बयां करना
नामुमकिन है

एक अजीब सा रूहानी
सुकून महसूस होता है
हर एक ज़र्रे हर एक
कोने से प्यार हो जाता है
घर का ईट ईट
लगता है हमारे एहसासों
से जुड़ा है

अपना एक कोना मिल
जाता है
जो कोई नहीं छीन सकता
ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत
लगने लगती है
हर गुज़रता लम्हा
संजो लेने का
मन होता है

अपना आशियाना
बड़ा हो या छोटा
सजा हो या फिर
बेतरतीब
कैसा भी हो
अपना होता है

#रेवा

Friday, March 29, 2019

अक्षर


कभी कभी बस
चुप चाप बैठ कर
सोचने का मन होता है
पर दिमाग उलझनों में
उलझा रहता है
और कुछ समझ नहीं आता

तब ये अक्षर मेरे पास
आते हैं और
चुप चाप मेरे कंधे पर हाथ
रख कर मेरे पास बैठ जातें हैं
मैं अपने सारे सवाल
सारे ख़याल सारी उलझनें
इन अक्षरों के हवाले कर देती हूँ
जो स्वतः ही सब ले लेते हैं
और मेरा मन और दिमाग
शांत हो जाता है

ये अक्षर नहीं
मेरे सबसे प्यारे
दोस्त हैं

#रेवा
#अक्षर

Monday, March 11, 2019

बंद करो


बंद करो रक्त पात
बंद करो युद्ध की बात
बंद करो अहंकार का ये खेल
कहीं कोई भी मरे सब इंसान है
कम से कम ये तो देख 
माँ का भाल न लाल के खून से
लाल करो
इंसान हो जानवरों सी बात न करो
बंद करो रक्त पात
बंद करो युद्ध की बात

Tuesday, March 5, 2019

हूँ इन्सान


हाँ मैं हूँ एक माँ
खड़ी ढाल की तरह
अपने बच्चों के साथ 
उनके हर तकलीफ़ में
डट कर सामना करने को
उन्हें बचाने को तैयार
चाहे हालात कैसे भी हो
चाहे मुसीबत कैसी भी हो
पर फिर भी हूँ इन्सान
उस दिन उस शाम
कुछ मिनट पहले ही
देखा था अपनी दस साल की
बच्ची को खेलते हुए
और बाद के कुछ मिनटों ने
दुनिया बदल दी मेरी
नहीं बन पाई मैं अंतर्यामी
जो देख लेती होनी को
नहीं बचा पाई मैं अपनी
बच्ची को उस वहशी से
जिसने गंदे इरादे से
बच्ची को बंद कर लिया
अपने साथ
पर कामयाब न हो सका
लेकिन इस हादसे ने
डर दुख तकलीफ
भर दिया उस बच्ची
और माँ के अंदर
रोती रही ज़ार ज़ार
बच्ची को छाती से
लगाए यही सोचती रही
गलती मेरी है
नहीं रक्षा कर पाई
अपनी बच्ची की
नहीं बन पाई अंतर्यामी,
दुर्गा काली नहीं नहीं नहीं
बन पाई
नहीं बन पाई माँ
माँ का दर्जा बहुत ऊँचा है
सदा रहेगा पर
है वो इन्सान
है वो इन्सान

Tuesday, February 26, 2019

सिंदूरी रोशनी




उलझे रहे हम 
ज़िन्दगी के सफर में
इस कदर
न दिन की रही खबर
न ही शाम का रहा ख्याल
थक कर हर रात बस
ख़्वाबों की गोद में
पनाह ले ली

कभी देखा ही नहीं
सुबह की सिंदूरी रोशनी
कभी सुना ही नहीं
पंछियों का कलरव
कभी महसूस नहीं किया
सुहाना मौसम

भागते रहे बस हर रोज़
चिन्ता लिए कैसे होगा सब ??
सीमित आमदनी
तो सीमित साधन
कैसे चलेगा संसार ??

पति, बच्चे और घर
का ख़याल बस यही
बन गया जीने का आधार

अब जब कभी आती है
बारी इन सब से थोड़ा सा
निकलने की तो पैर
डगमगाते हैं 

सोच, मन साथ नहीं देता
घर में एक कोना
भला सा लगता है

चाहत का चाहतों ने ही
कब का अंतिम संस्कार
कर दिया
प्यार की मद्धम रोशनी
अब बुझ गयी है
उसे बस किताबों में
पढ़ना भला लगता है

लेकिन विवेक ये
कहता है अब बस
कुछ साल
अब ख़ुद के लिए जी
और देख
जीवन की सुबह
और शाम दोनों
सिंदूरी होते हैं

#रेवा

Friday, February 8, 2019

भिखारी


कभी ध्यान से
देखा है
उन भिखारियों को
जो कटोरा लेकर
पीछे पीछे आते हैं
गिड़गिड़ाते रहते हैं
किसी भी तरह
पीछा नहीं छोड़ते
चाहे उनका अपमान करो
या डांट लगाओ
तरह तरह से कोशिश
करते रहते हैं

वैसा ही हाल होता है
उन लोगों का जो वोट मांगते हैं
तरह तरह से प्रलोभन देते हैं
५ साल में काया पलट की
बात करते हैं
गरीबों को लालच दे कर लुभाते हैं
पर पीछा नहीं छोड़ते

जानते हैं दोनो में अंतर क्या है
बस इतना की
भिखारी अपने पेट की आग
शांत करने के लिए मांगता है
और ये कुर्सी और धन की
लालसा लिए मांगते हैं

एक के कपड़े मैले और
हाथ में कटोरा है
दूजे के सफ़ेद झक कपड़े हैं
और दोनों हाथों में कटोरा है
पर भीख दोनो ही मांगते हैं 
पर भीख दोनों ही मांगते हैं

#रेवा



Monday, February 4, 2019

सच


लिखने के लिए बहुत कुछ है
राजनीति, समाज मैं फैली
गंदगी का सच
आँखों में रड़कते धूल के कण का सच
नक़ाब के पीछे चेहरे का सच
मिट्टी का सच
सादा लिबास और रंग
का सच
मंदिर, मस्जिद ,चर्च और गुरुद्वारे
का सच
नाजायज़ शब्द का सच
रिश्तों में पनपते रिश्ते का सच
फ़कीर और भिखारी का सच
इट पत्थर और घर का सच
दोस्ती और दुश्मनी का सच
बातों और हरकतों का सच
आईना दिखाने वाले साहित्य का सच
पर ये सब , सब देख समझ रहें हैं
इसलिए मैं लिखती हूँ
प्यार का सच
और बोती हूँ बीज आत्माओं में
प्यार का
क्योंकि अगर दुनिया को कुछ बचा
सकता है तो वो है प्यार

#रेवा 

Thursday, January 31, 2019

गृहिणी


मैं एक गृहिणी हूँ 
सुबह के आकाश का रंग
देखना चाहती हूँ
पर नहीं पहचानती
नहीं छू पाती सूरज की
किरण
नहीं सुन पाती
मधुर संगीत
नहीं महसूस कर पाती
वो ताज़ी हवा
नहीं जी पाती सुबह

वो उठते ही दौड़ती है
रसोई में वही है
उसका आकाश
सूरज की बजाय वो
आग का रंग देखती है
संगीत की बजाय
सुनती है आवाज़ें
फरमाइशों की
टिफ़िन और नाश्ते में
परोस देती है
ताज़ी हवा

धो देती है सुकून के पल
कपड़ों के साथ
फिर सूखा देती है अपनी
ख्वाहिशें
और तह लगा कर रख
देती है अपने ख़्वाब

बच्चे बड़े हो जातें हैं
वो जवान से बूढ़ी हो
जाती है
पर ये क्रम
अनवरत चलता
रहता है जैसे
सुबह संग सूरज

#रेवा

Tuesday, January 22, 2019

तुम



तुम्हें ये महज़ बातें लगती हैं 
मुझे एहसास
तुम्हें ये बरसात नज़र आती है
मुझे मिट्टी की खुश्बू
तुम्हें सिर्फ़ आँखें नज़र आती हैं
मुझे उनमें घुलते जज़्बात
तुम्हें एक ख़याल छू कर चला जाता है
मुझे रेशमी याद
तुम्हें ज़रूरत समझ आती है
मुझे इश्क़
तुम्हें लॉजिक चाहिए
मुझे प्यार और ख्याल
तुम्हें सपनों में सपने समझ आते हैं
मुझे हक़ीकत
तुम्हें देह समझ आती है
मुझे रूह
तुम्हें सिर्फ तुम समझ आते हो
और मुझे भी बस तुम

#रेवा

Sunday, January 20, 2019

ग़रीब


चलो बादलों की
जेब से
सूरज चुरा लायें
रख दे फिर उसे
उन गरीबों की 
बस्ती में
ताकि कोई भी
ठंड से न हो
उन्ही बादलों के हवाले
रात फिर ठण्डी
हवाओं को
भर दें
बादलों के
जैकेट में
और ओस की बूंदों को
चाँद की टोपी
में छुपा दें
ताकि ठंड में भी
सो सके फुटपाथों पर
सुकून की नींद

Tuesday, January 1, 2019

लम्हा


वो लम्हा वो पल
कुछ उसमें मैं रह गयी हूँ
कुछ वो मुझ में समा गया है

उस पल को जितना
जीती हूँ वो मुझे
उतनी ही ऊर्जा से
भर देता है

चाहे वो पल क्षणिक ही था
पर धीरे धीरे दिल की
तहों में घुल  कर
जीने का बहाना बन
गया है

मैं जानती हूँ
जीवन में अब कभी
वो पल दोबारा नहीं आएगा
मैं चाहती भी नहीं

क्योंकि मैं उस लम्हे से
मिले एहसास को उसके 
संपूर्ण प्रगाड़ता के साथ 
अपने जीवन की
बहुत प्यारी याद
बना कर रखना
चाहती हूँ

और जब जी चाहे 
उस लम्हे को 
यादों के रेशमी धागों 
से निकाल कर जीना 
चाहती हूँ !!!!!


#रेवा
#एहसास