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Wednesday, November 14, 2018

बादल


हर रोज़ की तरह 
आज भी
छत पर टहलने आयी
मेरे दोस्त
चाँद के समय पर

हम दोनों का यही
तो समय होता है
बेफिक्री का
जब बतियाते हैं
एक दूजे से
दिन भर की तमाम
बातें उलझने
बांटते हैं ,

पर आज वो दिखा ही नहीं
मैं बैचैन आस लगाए
करती रही इंतज़ार
तभी देखा चुपके से
मेरा दोस्त आया
पर आज वो बिल्कुल
लाल था अपने रंग के विपरीत
समझ नहीं आया क्या बात है?

कुछ न बोला चुप से
मेरे पास बैठ गया
पर उसकी लाल
आंखों ने बिन बोले
उसकी चुगली कर दी 

कुछ तो बात थी
जो आज चांदनी साथ न थी
उसे उदास देख मैं भी
दुखी हो गयी
पर जब मेरी आँखों में
अपने लिए दर्द देखा
चुप चाप फिर छिप
गया बादलों में
और बादलों ने भी
समेट लिया
उसे अपने में ,

दुखी थी पर लगा की
काश हमारे जीवन में भी
ऐसा बादल हो जो
समेट लें हमारे सारे दुखों को !!

#रेवा
#चाँद

Monday, November 12, 2018

चालाक बुनकर



मकड़ी एक चालाक बुनकर है
बुनती रहती है जाल
फंसाती रहती है उस जाले में
कीड़े मकोडों को
जो फंसकर गँवा बैठते हैं
अपनी जान 
वे बेचारे कीडे़ मकोडे़

जो मकड़ी बुनती है जाला
बनाती है फंदा
इतराती है
अपनी बुनकारी पर
जीवन भर,
वो भी एक दिन
इसी जाले के साथ
ख़त्म हो जाती है

मकड़ी की लाश
उसी के जाले में
जगह-जगह विराने में
झूलती रह जाती है
अफ़सोस का एक शब्द भी
किसी ज़बान पर नहीं ठहरता
गुमनामी की हवेली में
मकड़ियों के जाले पर
कोई मातम नहीं करता।


#रेवा 
#जाल 

Saturday, November 10, 2018

दीपावली


दीये की रौशनी से
जगमगाता रहे हमारे
देश का हर कोना

सब के दिलों में
जलती रहे
प्यार की लौ

इंसानियत की
खुशबू से  महकता रहे
हर इंसान

ग़रीब की झोपड़ी
में भी सुनाई दे
खुशियों की झंकार

दीपोत्सव लाए ऐसी बहार
मुबारक को आप सबको
दीवाली का त्योहार

#रेवा
#दीवाली

Monday, November 5, 2018

कछुआ

कछुए के नाम से 
एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है
वो सही भी है

पर सही ये भी है कि
कछुआ धीरे चलता है
पर बुद्धू नहीं होता है
खरगोश की चपलता को
भली भांति समझता है
जब उसका मन होता है
अपने खोल में जा कर
चिंतन मनन करता है
और फिर
दुगने जोश के साथ
चल पड़ता है
और पहुंच जाता है
खरगोश से पहले
उस ठिकाने पर
जहां जाने की होड़ मची हो

कछुआ चलता रहता है
उसे पता होता है
क़दम क़दम की दूरी
अपने चलने की ताकत
खरगोश की छलांग में
उसके घमंड की उछाल को
भाँप लेता है कछुआ
सुस्ताने की आदत
खरगोश को है
यह हर एक कछुआ जानता है
कछुआ अपने और
खरगोश के बीच की रेस
बिना हार जाने की सोचे
स्वीकार करता है
क्योंकि
कछुआ चिंतन मनन करता है।


#रेवा
#कछुआ 

Wednesday, October 31, 2018

अमृता


अमृता 
जानती हो तुम्हारे नाम के
साथ अमर जुड़ा हुआ है
फिर कैसे जा सकती हो कहीं

तुम कहीं गयीं नहीं हो
यहीं तो हो
हम सब के बीच
अपनी कहानियों
और नज़्मों में 
हर इश्क करने वाले
के दिल में
और हर पल धड़कती रहती हो
इमरोज़ की धड़कन में 

मैं जानती हूँ और मानती भी हूँ की
तुम्हें बस प्यार से आवाज़
देने की जरूरत होती है
तुम आ जाती हो पास
बातें करती हो
और हमेशा मेरे हाथ
दे जाती हो एक
अदद नज़्म की सौगात

तुम्हें पढ़ना, सुनना
रुलाता है गुदगुदाता है
और दिल प्यार और
सम्मान से भर जाता है

अमृता तुम कहीं
नहीं गयी हो यहीं हो
हम सबके बीच
हमारे दिल में


#रेवा
#अमृता

Monday, October 29, 2018

दोहरी मानसिकता


ऐ पुरुष तुम कितनी 
दोहरी मानसिकता लिए
जीते हो

तुम जब छोटे बॉक्सर पहन
कर घूमते हो तो क्या वो छोटे
नहीं होते ?
कभी ये सोचा है
तुम्हें इतने छोटे कपड़ों में
देख कर लड़कियाँ भी कुछ
बोल सकती हैं
उनका भी तो मन है
डोल सकता है न
आखिर वो भी तो इन्सान
है तुम्हारी तरह

जब तुम कोई बड़े गले का
Tशर्ट पहनते हो
तो वो तो उसके अंदर
ज़ेरॉक्स नज़रों से
झांकने की कोशिश नहीं
करती

तुम जब खुले बदन
बाहर आते हो
अपनी सिक्स पैक
ऐब दिखा इतराते हो
तो क्या तुम पर
फब्तियां कसती हैं लड़कियाँ ??

पर अगर लड़कियाँ
कम कपड़ों में घूमे, निकले
तो तुम उसका जीना
मुहाल कर देते हो
क्यों वो इंसान नहीं क्या ??

एक बात बताओ
क्या तुम किसी और
ग्रह से आये हो और
वो किसी और ग्रह से है ??
तुम्हारा मन, मन है जो
बार बार संभल नहीं पाता
और उसका तो कुछ भी नहीं

और ये तुम्हारा मन आखिर
है कैसा
आठ महीने की बच्ची से लेकर
साठ साल की उम्रदराज़ पर
भी आ जाता है और तुम
बलात्कार जैसे घृणित कार्य
करने से भी नहीं चूकते
सोचो गर तुम्हारे साथ ऐसा
कुछ हो तो
उस दर्द से गुजरना पड़े तो

ऐ पुरुष तुम सच में कितनी
दोहरी मानसिकता लिए
जीते हो

#रेवा
#लड़कियां

Friday, October 26, 2018

कोरा कागज़




एक से रिश्ता कोरे कागज़ सा
एक से कोरे कागज़
में खींचती लकीरों सा

एक के कोरे कागज़ पर वो जो चाहे
लिख तो सकती थी
पर वो पढ़ कर भी
पढ़ा नहीं जाता था
यानि सदा कोरा रह जाता

दूजे कोरे कागज़ पर
लकीरों में रंग भरा था
जिसने मुलाकात करवाई
जीवन के अनछुए पहलुओं से
ज़ज्बातों से
ऐसे जज़्बात जिसमे बस
वो ही थी और कहीं कोई नहीं

एक उनका आसमान था
जिसे पाना चाहती थी
सब कुछ छोड़ कर
पर पाना नामुमकिन

दूजा उनके घर की छत
जिसे पाने का जुनून नहीं था
क्योंकि वो सदा ही उनके पास था

इन दो कागज़ों के अलग अलग
पहलुओं से सजी थी
इश्क की दुनिया
जो अमर है अमर रहेगी

#रेवा
#अमृता के बाद की नज़्म

Thursday, October 25, 2018

तू लाजवाब है ऐ ज़िन्दगी



तू समझने की चीज़ थोड़े है
तू तो जीने की चीज़ है
तू सवाल नहीं बदलती
बस रोज़ नए जवाब थमा
देती है
तू निष्ठुर बिल्कुल भी नहीं
हर बार नया दिन देती है जीने
के लिए
एक दिन गर आंसुओं के सैलाब से
तर करती है तो दूजे दिन
मुस्कुराहट का लिबास भी पहनाती है
कभी विरहन की तरह मिलती है
तो कभी प्रेयसी की तरह
तू जैसी है जो भी देती है
तू लाजवाब है ऐ ज़िन्दगी !!

#रेवा
#ज़िन्दगी 

Thursday, October 18, 2018

मुझे तुमसे मोहब्बत है


कभी कोई 
खुश्बू सांसों
में समा जाए
तो उसे हम नहीं कहते
मुझे तुमसे मोहब्बत है

कभी ठंडी पुरवाई
बदन को छू जाए तो
उसे भी हम नहीं कहते
मुझे तुमसे मोहब्बत है

वो रंग जो मन को
भा जाते हैं
उनसे भी नहीं कहते हम
सुनो मुझे तुमसे मोहब्बत है

प्रकृति की मनोहारी छटा
जो दिल पर छप जाए
उसे भी हम नहीं कहते
मुझे तुमसे मोहब्बत है

वैसे ही हो तुम 
मेरी दुनिया
ये सब तुममे ही समाहित है
तुम्हें भी मैं नहीं कहता
मुझे तुमसे मोहब्बत है

#रेवा
#इमरोज़

Tuesday, October 16, 2018

बीज गाथा

मैं बीज गाथा लिखना चाहती हूँ 
उस नन्ही सी बीज का जो
बढ़ना चाहती है
अपनी कोख़ में फल फूल
को पालना चाहती है
पर बेदर्दी से कुचल दिया
जाता है उसे

मैं अन्न की गाथा लिखना चाहती हूँ
जो सींची जाती थी 
किसान के पसीने से 
पर अब उस किसान
को कुचल दिया जाता है
और खूनी अन्न को लाश बना
बेचा जाता है

मैं उन पौध की गाथा लिखना चाहती हूँ
जो उगते हैं हर जगह कुछ जंगली
होते हैं और कुछ सामान्य
पर उन सब को ज़हर से 
भर आतंकवादी बना दिया जाता है

इसलिए मैं प्रेम लिखती हूँ
क्योंकि नफ़रत से भरी इस
दुनिया में प्रेम ही है जो 
हम सबको बचा सकता है


#रेवा 

Monday, October 15, 2018

हमसफ़र



गर तुम चाहो
मेरे करीब आना
मुझे समझना
मुझे पढ़ना
तो ज़रिये
मिल ही जायेंगे
पर तब
जब तुम चाहो 

तुम गर खुद में
ही सिमटे रहे
तो पढ़ना तो दूर
मुझे समझना
भी मुमकिन नहीं है

कभी देखा है
मेरे चेहरे को गौर से
मेरी आँखों की
भाषा क्या समझ
आती है तुम्हें
नहीं न

असल में
जीवन की आपा धापी में
हम जीवन साथी का साथ
उसके प्यार, उसकी कद्र
इन सब बातों को
नज़रंदाज़ कर देते हैं

ये सारी चीज़ें
टेकन फ़ॉर ग्रांटेड की
सूची में जो आते हैं
और जब दोनों में से एक
नहीं रहता / रहती
तो हाथ मलने के अलावा
कुछ बचता नहीं....

#रेवा 
#हमसफ़र 

Friday, October 12, 2018

जाने क्यों


जाने क्यों 
इतनी बड़ी हूँ मैं
पर जब बात तुम्हारी
आती है तो बच्चों सी
हो जाती हूँ

जाने क्यों
तुम अगर मेरी बात
ठीक से न सुनो तो
चिढ़ जाती हूँ
फ़ोन न लो तो गुस्सा 
हो जाती हूँ
और अगर दो बार ऐसा
करो तब तो भयंकर गुस्सा
तुम्हें फोन पर
तीन बार
ब्लॉक ब्लॉक ब्लॉक
लिख कर जाने कैसी
संतुष्टि मिलती है मुझे

जाने क्यों
कभी कभी तुमसे
अपनी हर बात साझा
करना चाहती हूँ
क्या कर रही हूँ  ?
कौन सा गीत ज्यादा
सुन रहीं हूँ ?
कौन सी कविता पर
काम कर रही हूँ  ?
क्या पढ़ना चाहती हूँ ?
यहां तक की कौन से
रंग का कुर्ता पहन रखा है

जाने क्यों
फिर अगले ही पल
ख़ुद को चपत लगा कर
कहती हूँ पागल..
पर मन तो फिर भी
मन है न
ऐसा चाहता है
तो क्या करूँ बोलो ??

Thursday, October 11, 2018

अंतर का दीया (२)



ये जो मेरी काया है न 
यही तो मेरी कहानी है
जब इस काया के पन्ने
पलटती हूँ और
पढ़ती हूँ अपने एहसास
अपने ख़याल
और अपने सवाल
सारे
समझ नहीं आती हैं
कई बातें
ये दुख सुख की सौगातें 
तब मेरे अंतर का दीया
करता है रोशन मेरी राहें

कभी करती हूं सवाल इससे
कैसे दिप दिप करते हो
तुम सदा ?
तो जवाब मिलता है
मैं तो कुछ भी नहीं हूँ
वो तुम ही तो हो
जलाती रहती हो जो
अपने विश्वास से इस
दीये की लौ
मेरे अंतर का दीया
करता है रोशन मेरी राहें

#रेवा 
#अंतर का दीया
#अमृता जी की कविता से प्रेरित 

Wednesday, October 10, 2018

अधूरापन


एक अधूरापन सा 
सदा रहता है दरम्यान.....
चुभती हैं वो सारी बातें 
जो मैंने चाहा पर 
तुम समझ नहीं पाए .....

बस जरुरत की
हर चीज़ देते गए
ये न सोचा की
दिल जरुरत से नहीं
प्यार से भरता है ....


मकां तो दिया
रहने को
पर दिल खाली कर दिया ......


ऐसा नहीं की इन बातों से
मुझे अब फर्क नहीं पड़ता
पर कब तक सिसकती
सुलगती रहूँ
इसलिए
दफ़न कर दिया है इनको
मन की चारदीवारी में
और ऊपर से मुस्कान
बिछा दी है
ताकि कोई
झांक कर पता न कर पाए की
मैं अधूरी हूँ या पूरी.....


रेवा 

Monday, October 8, 2018

ये धरती


ये धरती 
चीख चीख कर
कहती है
मत काटो गला
पेड़ पौधों का
उनको बढ़ने दो
उनके हरे पत्तों को
धूप में चमकने और
बरसात में नहाने दो

अपने कंक्रीट में
थोड़ी सी जगह
इन्हें भी दो
ताकि ये अपनी
जवानी और बुढ़ापा
जी सके
ये ही तुम्हें
साँस लेने लायक
रखते हैं
तुम्हारा पेट भरते हैं

अपने दिमाग का
इस तरह इस्तेमाल
न करो की एक दिन
प्यास हो पर पानी नहीं
भूख हो पर अनाज नहीं
फेफड़े हों पर ऑक्सिजन नहीं
अपने बच्चों के लिए
कुछ छोड़ कर जाना हो तो
प्रकृति का उपहार दे कर जाओ

#रेवा
#प्रकृति

Friday, October 5, 2018

सदियों की रिहाई


हम भी मिले थे अचानक 
दूसरे प्रेमियों की तरह ही
प्यार तो नहीं था तब
दोस्ती भी नहीं थी
पर कुछ तो था... 

धीरे-धीरे समय के साथ 
एहसास हुआ की
ये पक्का दोस्ती तो नहीं
पर जो है उसे अपने
पास फटकने देने 
से भी गुरेज़ है ...

लेकिन अगर अपने ही बस में
हो हर एहसास तो फिर
ग़म ही न हो ....

तुम भी वहीं महसूस
कर रहे थे जो मैं कर रही थी
ये जानती थी
पर हम आँख मिचौली
खेलने लगे एक दुजे के साथ 

लेकिन आखिर धप्पा 
हो ही गया और तब
तुमने मुझे सदा प्यार करने की
पर दूर चले जाने की कसम
ले ली 

जैसे कह रहे हो
"सदियों का वादा तो किया है
और सदियों की रिहाई भी दे रहा हूँ  "


#रेवा 
#वादा 

Wednesday, October 3, 2018

अजीब सपना


आज एक अजीब
सपना देखा ,
देखा की मैं एक
बहुत छोटी जगह
बंद हो गयी हूँ

सब मुझे ढूंढ
रहे हैं
जबकि
मैं उन्ही के बीच हूँ
उन्हें बार बार
आवाज़ दे रही हूँ
दरवाज़ा खट खटा
रही हूँ

पर कोई सुन ही
नहीं रहा ,
इतने में वहां
एक अजनबी आया
उसने देखा और
दरवाज़ा खोल दिया

जानते हो इस सपने
का संकेत ,
दरवाज़े के पीछे बन्द
मेरा दिल था और
दरवाज़ा खोलने वाले
अजनबी थे "तुम "


#रेवा
#तुम 

Monday, October 1, 2018

वो घर कभी मेरा भी था

जहाँ मैं घर घर खेली
गुड्डे गुड़ियों की बनी सहेली
वो घर  मेरा भी था

जहाँ मैं रूठी ,इठलाई
और ज़िद्द में हर बात
मनवाई
वो घर मेरा भी था

जहां मेरे बचपन के थे संगी साथी
भईया बनता था घोड़ा हाँथी
खिलखिलाहटों की तब होती थी भरमार
वो घर मेरा भी था

लगा के बिंदिया पहन के माँ की साड़ी
करती थी खूब उधमबाज़ी
वो घर मेरा भी था

जब होती थी बीमार दुआओं की
होती थी भरमार
माँ की गोद और उनका स्पर्श रहता था
दिन भर मेरे साथ
वो घर मेरा भी था

गुस्से में अगर रहती थी भूखी
पापा की डांट से तब सबकी
सबकी जान थी सूखती
वो घर मेरा भी था

कागज़ की नाव , कीचड़ भरे पाँव
मिट्टी के घरौंदे ,खेल खिलौने
वो भईया के शिकायतों के दाँव
सब छूटे
वो घर मेरा भी था

अब वहाँ हर चीज़ है अजनबी
चुपपी ही लगती है भली
महमान कहलाते हैं जहाँ हम
मायके कह कर उसे बुलाते हैं
अब हम

#रेवा
#घर

Friday, September 28, 2018

उर्मिला


बार बार 
लिखना चाहा
पर वो शब्द ही
नहीं मिलते जो
उर्मिला के दर्द
उसकी व्यथा
उसके विरह को
बयां कर सके

कितनी आसानी से
नव ब्याहता ने
पति के भ्राता प्रेम को
मान देकर
चौदह वर्ष की दूरी
और विरह को
बर्दाश्त करना स्वीकारा
उसपर से ये वादा कि
उसके आंखों से
आँसू भी न बहे
उफ्फ ऐसी व्यथा ...

तकलीफ़ की बात तो
ये भी है कि
इस स्त्री के सहज
त्याग को
इतिहास ने कहीं
जगह न दी
कोई उल्लेख नहीं

राम मर्यादा पुरूषोत्तम
सीता की
अग्नि परीक्षा
लक्ष्मण का भ्रात प्रेम
पर उर्मिला कुछ नहीं ....

जानती हूँ  सीता बनना
आसान नहीं
पर उर्मिला बनना
नामुमकिन है ....

पर ए स्त्री
तुम न सीता बनना
न उर्मिला
बस औरत ही रहना....

#रेवा 
#उर्मिला 

Thursday, September 27, 2018

गणित


हर रोज़ टूटती हूँ 
पर हर रात ख़ुद को
फिर जोड़ लेती हूँ

ये टूटने और जोड़ने 
के गणित से
कभी ऊबती या
घबराती नहीं हूँ

क्योंकि जब जब
जोड़ती हूँ ख़ुद को
उन तमाम एहसासों को
बातों को
जिन्होंने मुझे टूटने
पर मजबूर किया
उन्हें फिर ख़ुद में
जुड़ने नहीं देती

और इस तरह
हर बार
मैं और बेहतर
बनती जाती हूँ

Monday, September 24, 2018

मैं एक औरत हूँ



मैं एक औरत हूँ 
पर हां तुम्हारी 
ज़िम्मेदारी नहीं हूँ
मैं अपनी ज़िम्मेदारी
ख़ुद हूँ

मैं औरत हूँ
प्यार बेशुमार
है दिल में
पर उसके लिए तुमसे
भीख नहीं मांगती
वो मेरे अंदर है
मेरा इश्क़ है

मैं औरत हूँ
सहनशक्ति
बहुत है मुझमे
पर तुम्हारी ग़लत
बातों को सिर्फ परिवार
चलाने के लिए नहीं
मान सकती
परिवार तुम्हारा भी है

मैं औरत हूँ
तुम्हें जो पसंद है
वोही करूँ वैसे ही रहूं
ज़रूरी तो नहीं
मेरी पसंद नापसंद
मेरी अपनी है

मैं औरत हूँ
मुझे सिर्फ गहनों और
कपड़ों से ही प्यार है
ये तुम्हारी सबसे
बड़ी भूल है
हमे प्यार से प्यार है

मैं औरत हूँ
ये कहने की
ज़रूरत है क्योंकि
तुम बहुत सारी
ग़लतफ़हमी पाले बैठे हो

#रेवा 
#औरत 

Saturday, September 22, 2018

औरत


मैं पतंग नहीं
बनना चाहती
जिसकी डोर
किसी और के
हाथ में हो 

हवा का रुख 
जिधर हो 
उधर उसे
डोर से बंधे ही
उड़ना पड़ता हो 

कभी कभी इसी
प्रयास में गिर भी
जाती है अंधेरी
गुफ़ा में 

मैं चिड़िया बनना
चाहती हूँ
जो अपनी उड़ान
अपने हिसाब से
तय करे
और उड़ सके इस
उन्मुक्त आकाश में  ......

#रेवा
#औरत 



Thursday, September 20, 2018

कान्हा



वो जो मेरा कान्हा है न
वो बादलों के बीच
कहीं जा बैठा है
कोई सीढ़ी उस तक
अगर जाती तो मैं रोज़
पहुँच जाती

लेकिन आज एक पगडंडी
नज़र आयी है
जब आँखें बंद कर
उसके सामने बैठती हूँ न
तो वो आता है मुझसे मिलने
मुस्कुराता है अपने
अंदाज़ में और फिर
झट जा कर छिप
जाता है बादलों की
ओट में

उसकी इसी मनोहारी
रूप को देखने मैं हर
सुबह शाम उसके
सामने जा बैठती हूँ
अपनी श्रद्धा का
अलख जगाये
और तृप्त हो जाती हूँ
उसका दर्शन पा कर.....

#रेवा 
#कान्हा 



Monday, September 17, 2018

एहसासों का ख़त


भेजा था मैंने
यादों के डाकिये
के साथ तुझे
अपने एहसासों का ख़त
पर वो बैरंग
वापस आ गया ,

यादों ने बहुत ढूंढा
हर गली हर
शहर तलाश किया
पर वो पता जो
उस ख़त पर लिखा था
वो नहीं मिला ,

लगता है तुमने अपना
घर बदल लिया है ..
पर मैं तो वहीं हूँ उसी
पुराने घर, पुराने पते पर
बदलना मेरी फितरत नहीं 
ये तो जानते ही हो न तुम 

पर लगता है 
याद रखना तुम्हारी भी
आदत नहीं
ये भी अब जान गई हूँ मैं

लेकिन कोई बात नहीं 
मेरे एहसास जो तुमसे जुड़े हैं 
उन्हें सहेज कर रख लिया है 
जो मुझे सुकून देते रहेंगे 
पर तुम अब ताउम्र 
इस सुकून से महरूम रहोगे !!!!






Sunday, September 16, 2018

हरे जिल्द वाली किताब



आज पुरानी संदूक खोली
तो हाथ आया
तुम्हारा दिया हुआ
पहला और आखरी
उपहार .....
वो हरे जिल्द वाली किताब
तुम्हें पता था न
मुझे किताबें बहुत पसंद है
तभी मुझे हैरान करने
डाक से भेजा था,

लिफाफा खोलते वक्त
ये नहीं लगा था
इसमे मेरी ज़िन्दगी
कैद है  ....
मैं बार-बार किताब
खोलती थी पढ़ने
पर हर बार
अटक जाती थी
अपने नाम पर,

वो नाम
जो तुमने रखा था
उसे छूती
उसे देख मुस्कुरा कर
सुर्ख हो जाती
और फिर किताब
बंद कर रख देती ,

घंटों ख्यालों में
खोयी रहती
जाने ऐसा क्या था
उस नाम में ??
वो नाम जो तुमने
अपने हाथों से लिखा था
और उसे छु कर
तुम्हारा प्यार
तुम्हारे हाथों का स्पर्श
तुम्हारे उँगलियों की नमी
पहुँच जाती थी
मुझ तक
जो मेरा न होकर भी
मेरा है  !!!

#रेवा
#किताब





Friday, September 14, 2018

मत जाया करो न




जानते हो
जब मैं
मायके जाती थी
तो लौटते समय
अक्सर ट्रेन में
गुलज़ार का लिखा ये गीत
गुनगुनाती थी
"दिल ढूँढता है फिर वही
फुर्सत के रात दिन  ......

उस समय ऐसा
लगता था
जैसे समय
बहुत धीरे
चल रहा है ?
ट्रेन की रफ़्तार
मद्धिम हो गयी है

तुम्हें देखने की तड़प
बढ़ने लगती
मन होता था दौड़ कर
तुम्हारे पास आ जाऊं
तुम्हारे सीने में सर छूपा कर
विरह में बिताये सारे दिन
एक ही पल में जी लूं

ये सोच कर मैं
हौले हौले मुस्कुराने
लगती
और मन ही मन
तुम्हें प्यार भरा पत्र
लिख डालती

जब घर आती तो
लगता की तुमने
हर्फ़ दर हर्फ़
मेरी सूरत में
वो सब पढ़ लिया
जो मैंने लिखा था
और तुम मुझे
अपने आगोश में
भर कर कहते
"मत जाया करो न "

मज़े की बात है
यही सुनने और
इस दूरी से
मिले प्यार को
बढ़ाने
मैं हर बार
चली जाती थी....

#रेवा






Wednesday, September 12, 2018

अंतर का दीया (१)




मेरे अंतर में 
एक दीया सदा
प्रजवलित रहता है
जो मुझे हर ग़लती
में आगाह करता है

जो मेरी नकारत्मकता को
सकारात्मक ऊर्जा में
बदलता है

जो मेरे अंदर
मानवता की लौ को
किसी हाल में बुझने
नहीं देता

उस दीये की लौ की
ऊष्मा से मेरे सारे
दर्द वाश्प बन
उड़ जाते है

ये मुझे मेरी काया को
पढ़ने में मदद करता है 
और  मुझे प्यार की
खुश्बू से ओत प्रोत
रखता है

ये मेरे अंतर का दीया
मेरी काया का प्राण स्रोत है
जिस दिन ये काया मिट्टी
हो जाएगी 
उस दिन ये दीया
साईं तेरे दर पर जलेगा

#रेवा 
#अंतर का दिया 




Monday, September 10, 2018

मक़बरा


वो जीता है सालों से 
उसकी तस्वीरों
उसके ख्यालों और
अपने रंगों के साथ 

उसके लिए 
वो अभी भी इस 
दुनिया का हिस्सा है 

उसकी अलमारी 
उसकी किताबें 
उसकी तस्वीर 
सब जिंदा है 

वो दीवारों से भी 
उसकी बातें 
कर लिया करता है 

कमरे में अब भी 
उसकी खुश्बू 
मौज़ूद है
जो उसे रूहे सुखन
देती है 

वो घर उसकी यादों
का मक़बरा नहीं है 
जैसा की लोग 
कहते हैं
बल्कि उन दोनों
के प्यार का घोंसला है ....

#रेवा 
#इमरोज़ 
##अमृता के बाद की नज़्म 

Friday, September 7, 2018

देह की नौका



मैं अपनी देह को
बना कर नौका
जीवन रूपी
इस समुद्र को पार
करती हूँ
रास्ते में
आये तूफान को
झेलते हुए
लहरों के थपेड़ों से जूझती
और मजबूत बन जाती हूँ
कई बार
लपलपाती जीभ लिए
मगरमच्छों से भी
सामना हो जाता है मेरा
पर मैं टूटती नहीं हूँ
हारती नहीं हूँ
लड़ती हूं
लहूलहान करती हूँ
मारती हूं
और आगे बढ़ जाती हूँ
बीच में कई घाट भी आते हैं
जिनपर मैं ठहरती हूँ
विश्राम करती हूँ
और फिर निकल पड़ती हूँ
अपने लक्ष्य की ओर
लक्ष्य है
इस जीवन को जीना
और फिर
माटी में मिल जाना
जिस दिन उस माटी का
दीपक बन जलूँगी मैं
अपने उस कान्हा के सामने
समझ लूंगी मैं
मेरा जीवन सार्थक हुआ
सार्थक हुआ।
#रेवा
#देह

Wednesday, September 5, 2018

दोस्ती


जाने कैसे 
जाने कब
जाने क्यों
उसने मेरा मन
पढ़ लिया 

एक एक कर
मेरे मन की
सारी गिरहें
खोल कर रख दी
मेरे सामने 

आश्चर्य तो हुआ
खुशी भी हुई की
मेरे दोस्त
कितना समझते
हैं मुझे
पर एक बारगी 
दोस्त के प्यार से 
आँखें नम हो गयी...

#रेवा
#दोस्ती 

Monday, September 3, 2018

गंगा के किनारे


गंगा किनारे मैं बैठी थी 
चुप चाप
संवेदना शून्य सी
जब ठंडी हवाएं
मेरे बालों को हौले
से सहला रही थी तो
मुझे सिहरन नही
हो रही थी,

न ही जब
एक पत्ता मेरे
गालों को चूम कर
गिरा तो मेरे गाल
सुर्ख़ हुए ....

न ही जब
खुद के ही कांधे
पर खुद सर टिकाए
चुप चाप बैठी रही
तो कुछ महसूस हुआ ,

जब सिमटने का मन
हुआ तो अपने ही
हाथों के बीच
अपने चेहरे को ढक लिया ...


ये सब मैं इसलिए 
कह रही हूँ 
क्योंकि 
बदनसीब मैं नहीं
तुम हो जिसकी
मुझे ऐसे जगह
इतने सुहाने समय में भी
याद न आई ।

#रेवा

Sunday, September 2, 2018

पूर्ण और अपूर्ण


इस दुनिया में
ढूंढ़ने .. निकली तो 
पाया हर चीज़ अपूर्ण है
पूर्ण कुछ भी नहीं...

प्रेम कभी तृप्त नहीं होता
अतृप्त ही रहता है
ज्यादा कि मांग
कभी खत्म नहीं होती ,
न ही विरह
उसमें सदा
मिलन की आस होती है ,

साधक की साधना भी
अपूर्ण है
वो जीवन से दूर भागता है ,
प्रकृति भी पूर्ण नहीं तभी तो
कृत्रिम चीजों का
सहारा लेते हैं हम,

फूल उनकी
कोमलता और सुगंध
क्षणिक है ,
कोयल का संगीत
कलरव है
भाषा न होने के कारण
भावहीन संगीत जैसा,

कपोत कितने
अच्छे लगते हैं न
पर ये और अन्य पक्षी
भोजन के लिए
झगड़ते हैं
यहां तक कि
एक दूजे को खा
लेते हैं और
बड़े पक्षियों से
सदा डरे हुए से रहते हैं,
पूर्णता की तलाश
कभी पूरी नहीं होती 

अपनी परिस्थितियों के
अनुसार जीवन निर्वाह
करना ही ज़िन्दगी है
तो बस जीवन जीयो
पूर्ण होने की लालसा के बिना ....

चित्रलेखा पढ़ते हुए मिले ज्ञान के आधार पर

#रेवा
#चित्रलेखा

Saturday, September 1, 2018

इमरोज़


इमरोज़ की 
तरह होना
नामुमकिन है

लफ़्ज़ों को
रंगों में घोल
यूँ इश्क की
चित्रकारी करना
नामुमकिन है

अपने इश्क को
किसी और के इश्क
में खोए देखकर भी
उससे इश्क करना
नामुमकिन है

अपनी पीठ पर हर रोज़
किसी और का नाम
लिखा जाना
फिर भी हंसते हंसते
रास्ता तय करना
नामुमकिन है

यूँ सालों किसी की
यादों के सहारे
उसके एक एक
सामान को
सहेज कर रखना
नामुमकिन है

इमरोज़ बनना
नामुमकिन है
पर इश्क करना
मुमकिन है 

#रेवा
#अमृता के बाद की नज़्म

Wednesday, August 29, 2018

बारिश की बूँदें (2)



बारिश की बूँदें
प्रकृति का सौन्दर्य
दोगुना कर देती है
सबका मन हर्षो उल्लास से
भर देती है ,
प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए
तो ये बूँदें  मानो
वरदान हो ,
पर यही बूँदें
मेरे मन को शीतल
करने की बजाय
अग्न क्यों पैदा
कर रही है ??
हर एक गिरती
बूंद के साथ
मन और भारी क्यों हो रहा है ??
क्यों पंछियों की तरह
मैं भी खुश हो कर
दूर गगन में
नहीं उड़ पा रही ,
वो भी तो अकेले
ही होते हैं हमेशा 
फिर मैं क्यों नहीं ?
क्यों बरसात मुझे
किसी के साथ और
प्यार की जरूरत महसूस
कराता है ?

"ये आकाश से गिरते बूँदें हैं
 या मेरी आँखों के अश्क़
 ये आकाश प्यार बरसा रहा है
 या मेरा मन अपनी व्यथा "

रेवा

Tuesday, August 28, 2018

पक्की सखी (अमृता)


जब कभी
मन बेचैन हो उठता है
और दिल बोझिल
सा हो जाता है
तब मैं अपने दोस्त
कलम और कागज़
के पास आती हूँ
पर जाने क्यों
कभी कभी लफ्ज़
मुझसे दुश्मनों सा
व्यवहार करते हैं

तब कुछ सूझता नहीं
पर ऐसे समय
हर बार मेरी पक्की
सखी अमृता
आ जाती हैं मेरे पास ,
मैं पढ़ने लगती हूँ
उनकी नज़्म
जाने क्यों उनका लिखा
पढ़ते पढ़ते
मेरा रोम रोम सिहर
उठता है
आँखों से बरसात
होने लगती है

ऐसा प्रतीत होता है जैसे
मैं उन्हे सुन पा रही हूँ
उनकी आँखों में वो
प्यार देख पा रही हूँ
लगता है जैसे
उनका इश्क
शब्दों में ढल कर
मेरी रूह तक पहुँच
रहा है .....

मैं ख़ुद को सकारात्मक
ऊर्जा से भरा हुआ
महसूस करती हूँ
और पता है
जब जब मेरी
उनसे ऐसी मुलाकात
होती है न
तब तब मैं
ख़ुद को उनके और
करीब पाती हूँ......

#रेवा
#अमृता के बाद की नज़्म



Monday, August 27, 2018

राखी (लघु कथा )


आज राखी है मुन्नी ने बोला  " भइया इस बार गुड़िया लूँगी ......पिछली बार भी आपने बहला फुसला कर कुछ न दिया था मुझे " गणेश बोला इस बार पक्का और मुस्कुरा दिया , उसने फूल बेच कर रुपये जो जोड़ रखे थे।

लेकिन सुबह मुन्नी को अचानक बुखार आ गया, डॉक्टर और दवा के चक्कर मे सारे पैसे चले गए.......  फिर भी उसने हार न मानी फिर से फूल बेचने निकल पड़ा, उसे विश्वास था की शाम होते तक उसके सारे फूल बिक जाएंगे। और वो मुन्नी को प्यारी सी गुड़िया देगा।

पर अचानक उनके कसबे में अफरा तफरी मच गयी ....सरकार के किसी बात का विरोध करने कुछ पार्टी के लोगो निकल पड़े थे सड़कों पर … अब फूल बिकेंगे नहीं तो  वो मुन्नी की इच्छा कैसे पूरी कर पाएगा वो सोचने लगा .... हताशा से आँखें भींग गयी …पर वादा किया था बहन से .....कुछ तो करना ही था, आखिर उसने एक जुगत लगायी .....गीली मिट्टी से गुड़िया बना कर उसे सुखाया और सजा धजा कर रख लिया ......राखी बंधने के बाद जब उसने गुड़िया मुन्नी को दी तो उसकी आँखों की चमक देख कर गणेश को लगा आज उसकी राखी सार्थक हो गयी।

#रेवा


Saturday, August 25, 2018

इंसान


उदासी ओढ़ कर
आँसू बिछा कर
बैठ जाना तो बहुत
आसान काम है
हर कोई कर सकता है

पर जब हमने 
इंसान बन कर 
जन्म लिया है तो फिर
सोचना, समझना
हर परिस्थिति का
सामना करना
इन सब से तो हमारी
पक्की यारी होनी ही है 

खुशी देने के लिए ही तो 
बनाया है न ईश्वर ने
चाँद तारे
फूल ओस
तितली पंछी
बरसात हवा
इन्हें महसूस करो
और मस्ती से भर जाओ

तो चलो
उदासी को समेट कर
रख दो ऐसी जगह
जहां से वो दिखे ही न
और आंसुओं को
खुशी से वाश्प
बना उड़ा दो
और लग जाओ
जीवन को जीने में


#रेवा 
#जीवन 

Friday, August 24, 2018

ओस की बूंद


आज पढ़िए मेरी एक पसंदीदा पुरानी रचना

ओस की बूंद सी है
मेरी ज़िन्दगी
सिमटी सकुची
खुद में 
अकेले तन्हा
पत्ते की गोद
पर बैठी ,
सूर्य की
किरणों के साथ 
चमकती, दमकती,
इठलाती 
मन में कई
आशाएं जगाती,
हवा के थपेड़ो को
झेलती, सहती 
फिर उसी मिट्टी में
विलीन हो जाने को
आतुर रहती ....
ओस की बूंद सी है
मेरी ज़िन्दगी.......

रेवा

Thursday, August 23, 2018

I hate you


हर बार
बार बार
यही तो कहना
चाहा की
मुझे तुमसे
कितना प्यार है......

पर जब कहने की
बारी आती है
तो हर बार
यही कहती हूँ
"I hate you "
बहुत गंदे हो तुम !!!

जाने क्यों ये कह
कर लगता है
मैंने सब कह दिया
और तुम सब समझ गए  !!

समझ जाते हो न ???
इसलिए तो लगता है
बोलो कुछ भी
और कैसे भी
प्यार की जुबां को
समझना इतना भी
मुश्किल नहीं है
है न !!!

#रेवा
#प्यार 

Wednesday, August 22, 2018

एकाकार का आभास



जानती हूँ मैं
मेरे दिल 
तुमने जीया है
असीम प्यार
एकाकार का आभास

हर पल में पाया है
सदियों सा एहसास
दिल की धड़कन से लेकर
सांसों की तड़पन
तक को महसूसने वाला प्यार

बिन छुए
हृदय को स्पंदित करने वाला
एहसास
साँसों के उतार चढ़ाव से
मन का हाल जानने वाला
दुनिया से मिलाने वाला
ख़ुद की पहचान करवाने वाला
कड़वी यादों को
मीठी यादों से भरने वाला 

कभी बच्चों सा ज़िद्दी
कभी शिक्षक सा कड़क
होकर समझाने वाला

मैं जानती हूं मेरे दिल .....
फ़रिश्ते जैसे इस इंसान
को न पा कर भी
पाने जैसा है
और बिन साथ जीये भी
ताउम्र साथ रहने जैसा है !!!!


#रेवा 

Monday, August 20, 2018

मैं स्त्री हूँ





हां मैं स्त्री हूँ
लेकिन कमज़ोर
बिल्कुल नहीं ...
और साथ साथ ये भी बता दूं
मैं भी इंसान हूँ

मुझ में संवेदनाएं हैं 
अपनों से जुड़ी 
परिस्थियाँ मुझे
विचलित करती हैं
और तब मैं भावनाओं 
में बह कर कमज़ोर
पड़ जाती हूँ

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब बात आती है
मेरे बच्चों की
जब बात आती है
उनके भविष्य की

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं चाहती हूं हर
कीमत पर अपने घर की
सुख और शांति

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब देखती हूँ
पति का चिंतित लटका
हुआ चेहरा
उनकी बिगड़ती सेहत

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं देखना चाहती हूं
अपने घर के सदस्यों
के चेहरे पर खुशी और सुकून
और ये सब इसलिए की
मैं इन सब से बेइंतहा प्यार
करती हूं 

लेकिन ये भी बता दूं
मुझे कभी 
टेकन फ़ॉर ग्रांटेड मत लेना 
क्योंकि स्त्री तो हूँ पर 
कमज़ोर न बिलकुल नहीं ....... 


#रेवा 
#स्त्री 

Sunday, August 19, 2018

सवाल (लघु कथा )




कमला  दोपहर होते तक, घर का काम करते करते थोड़ा सा थक जाती थी,  ४३ की हो गयी है, यूँ तो उम्र के इस पड़ाव तक आते आते लोग सेटल हो जाते हैं। पर ऐसा कमला के साथ नहीं था......अभी अपना घर भी नहीं ले पायी थी ……अभी तो बुक करवाया है …लोन ले कर उसकी किश्ते चुकाती थी हर महीने  ……महीने के अंत तक हाथ एकदम खाली, पति को क्या बोले जानती वो खुद भी थी की कुछ बचता नहीं।
बेटे का अब १२ पूरा हो गया अब उसके आगे की पढ़ाई के लिए पैसों का जुगाड़ करना था, बेटे को लैपटॉप फ़ोन दोनों चाहिये था, बेटी भी १० में आ गयी अब फ़ोन उसे भी चाहिये।
उधर नन्द की बेटी की शादी होने वाली है, भाई को भात भरने की रस्म करनी होती है, उसके लिए भी मोटी रकम चाहिये।
अपने लिए तो कभी कुछ सोच ही नहीं पाती कमला, उसका भी मन करता कभी अपने लिए कुछ साड़ी ले ले , पर आजकल कपड़े गहने के दाम मे मिलने लगे हैं। बच्चों के साथ बाजार जाती, काफी चीज़ों पर मन चलता पर फिर लगता बच्चों को ज्यादा ज़रुरी है सामान दिलवाना, वो तो कैसे भी चला लेगी, मन मसोस कर रह जाती। सारे महीने बस दूसरे महीने के हिसाब में निकल जाते।
आज यही सब उसके दिमाग मे घूम रहा था की अचानक हँस पड़ी, इस बात पर की "लोग कहते हैं ४० के बाद जिम्मेदारी कम हो जाती है, अपनी ज़िन्दगी एन्जॉय कर सकते हैं, अपने मन की कर सकते हैं, पर क्या आम मिडिल क्लास गृहणी ऐसा कर सकती है  ???

#रेवा


Saturday, August 18, 2018

कामवाली बाई (लघु कथा )





ललिता रोज़ काम पर आती और बड़ बड़ करती रहती.......

"छोड़ देब अपन मरद के, अब न रही ओकरे साथ .... सगरा दिन पी कर पड़ल रहत है "
घर घर काम करके ४ बचवन के बड़ा कईली , पर ओकरा ओही ढंग ढाचा बा ......
बस "बड़का बिटवा कामये खाए लगे, फेर चल जाब इ घर दुआर छोड़ के  "
इस बात को चार महीने हो गए बेटे को नौकरी भी मिल गयी।

पर आज फिर रोते रोते आई "बीबी जी कुछो पेइसा एडवांस दे दो , मरद का सर फट गवा "
मैंने बोला "बेटे से क्यों नहीं लेती ?? " अब तो कमाने लगा है।

बोली "का करे बीबीजी बेटा भी बाप के जेइसन पी कर घर आवत है ...... हम के अउर बिटिया के मारत है "
हमरी किस्मत में कहाँ सुख ??
फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा "आप हे सही बोलत रहे "
हम अपनी बिटिया को अइसन नरक म नाही देब ..... अउर ३ - ४ घर काम पकड़ लेब  ...पर ओकरा  खूब पढ़ा लिखा कर अच्छा घर मा बियाह करब।

उसका चेहरा दुःख में भी इस निश्चय के साथ चमकने लगा ,और मुझे अपार ख़ुशी हुई की कम से कम एक लड़की की ज़िन्दगी में मैं कुछ अंतर ला पाई ।

#रेवा  

Friday, August 17, 2018

धूप और बरसात का मिलन




जानते हो
आज इस बरसात
और धूप के
खेल में
Fm में बजते
पुराने गानों के बीच
तुम्हारी बहुत
याद आ रही है ...

चारों तरफ हर
कुछ बहुत सुहाना है......
मौसम, गानें
और तुम्हारी याद ....

तो ऐसे में मुझे
खुश होना चाहिए.....
फिर भी मन उदास
सा क्यों हो रहा है  ??

तन्हाई नहीं
अकेलापन महसूस
हो रहा है
वो भी शिद्दत से

मैं खुद को समझ
नहीं पा रही की
आखिर क्या चाहिए मुझे ??
और ये आंखें
ये आंखें क्यों भीग
रही हैं बार बार  ???

सुनो
तुम तो सब जानते हो न
क्या तुम मेरी इस दशा को
समझ 
मुझे समझा सकते हो
बोलो, बोलो न .....

जानती हूं
तुम कुछ न बोलोगे
क्योंकी तुम जानते हो
धूप और बरसात
कुछ क्षण साथ रहते हैं
पर मिल कभी नहीं पाते ...

#रेवा

Thursday, August 16, 2018

क्षणिकाएं



बरसात पर कुछ क्षणिकाएं 

१. एहसासों की बरसात तो बहुत हुई 
    पर दिल आजकल कंक्रीट का जंगल 
    हो गया है 
    बिना जज़्ब हुए बह जाते हैं एहसास......

२. बड़ी मुश्किल से तन्हाई में
    खुश रहना सीखा था मैंने
    तेरी यादों की बरसात ने
    मेरी तमाम कोशिशों को
    बूँद बूँद कर बहा दिया.....

३.  गीले बरसात ने
    आज फिर ताज़ा कर दी
    सीली यादों को  
    उन्हें तुम बेरुखी की तपिश
    से बचाये रखना....


४. बादल जब धरती पर बरस जाते हैं तो
    आसमान बिलकुल साफ़ हो जाता है
    बस ऐसे ही मैं तुम्हारे काँधे पर 
    सर टिका कर बरसना चाहती हूँ......

५. इतनी बरसात के बावजूद
   जल की मछली
   जल में है प्यासी.....

#रेवा
#बरसात





Wednesday, August 15, 2018

कोशिश (जय हिन्द )


झगड़े किस घर
में नहीं होते  ?
ग़लतफ़हमी ग़लतियाँ
आम बात है.......
तो क्या हम घर से
मुंह मोड़ लेते हैं ?
घर के मुखिया को
बुरा भला कह कर
उसको उसके हाल पर
छोड़ देते हैं ??

जब हम ये अपने घर
के साथ नहीं करते तो
अपने देश के साथ
कैसे कर सकते हैं ??
दोष देना
बुरा भला कहना
बहुत आसान है
पर सुधारने की
कोशिश करना
थोड़ा मुश्किल ज़रुर है
नामुमकिन नहीं
कम से कम हम
अपने अपने स्तर पर
शुरुआत तो कर ही सकते हैं

बहुत कुछ
गलत हो रहा है देश में
मैं मानती हूँ
पर सरहद पर देश की
रक्षा करने वाले
देश के लिए मरने वाले
सैनिक तो गलत नहीं है,
उनके लिए
अपने इस प्यारे घर के लिए
आइये हम सब मिल कर
अपने देश को बेहतर
हिंदुस्तान बनाने की
पुरज़ोर कोशिश करें....


जय हिन्द !!!

#रेवा
#देश



Tuesday, August 14, 2018

यादें




जानते हो 
आज मैंने
हमारे यादों को
जीने की एक
कोशिश की है

उसी पुराने 
बस में बैठी 
सीट भी वही 
मिल गई जहां
हम अक्सर बैठा करते थे
जानती हूँ .....
वो बस बहुत लंबा
रूट लेती है 
पार्क तक
पहुंचाने में
लेकिन आज भी 
वो रास्ता
तय करना
मुश्किल नहीं लगा.....

मैं अपनी कविता 
ख़ुद को ही सुनाती रही
एक पल......
ऐसा लगा मानो तुम
बगल में बैठे
मग्न हो सुन रहे हो,,,,,

बस से उतर कर
पार्क के उसी बेंच
पर बैठी तो ....
अनायास ही एक
हिचकी आयी और
दो बूंद ओस 
छलक आये
पलकों पर...... 

सर टिका लिया बेंच से
लगा जैसे तुम्हारे कांधे
पर सर रखा हो
तभी मोबाइल पर fm
सुनाने लगा
वही पुराना गीत
"जो तुम याद आये बहुत याद आये "

सब वैसे का वैसा ही
तो है
अंतर बस इतना सा है
पहले तुम बगल में
हुआ करते थे
अब मेरे अंदर रहते हो .....


#रेवा
#याद

Monday, August 13, 2018

लिफ़ाफे में भरा एहसास




ऐसी बातें क्यूँ
करते हो मुझसे
किसने कहा था
इतना प्यार जताने को
देखो ...
रुला दिया न मुझे

कभी सोचती हूँ
अगर तुम न मिले होते
तो मैं क्या करती
किताबों में पढ़े
एक लफ्ज़ "इश्क"
को कैसे महसूस करती
सुनो !!
तुम ताउम्र ऐसे ही
रहोगे न ....

बदल तो न जाओगे
अगर इरादा हो तो
बस एक काम करना
एक कागज पर
प्यार लिख देना और
लिफ़ाफ़े में एहसास भर कर
मुझे भेज देना......
जब याद आएगी तुम्हारी
तो लिफ़ाफे को खोल कर
थोड़ा सा एहसास
महसूस कर लूंगी......
और तुम्हारे हाथों से लिखा
प्यार पढ़ लूंगी
बोलो
करोगे न ऐसा !!!!


#रेवा
#इश्क 

Sunday, August 12, 2018

गज़ल







आज पढ़ें मेरे आदरणीय मित्र Anil Kumar जी की गज़ल


तुमको जो खत लिखे थे मैंने तुमसे ही सब पढ़वाने हैं सपने मेरी आंखों के हैं तुमने मुझ को समझाने हैं तेरे मेरे दोनों के ही सारे हिस्से जल जाने हैं तुमने ही जब आग पहन ली हम भी तेरे परवाने हैं तेरे बारे में दोनों ने अलग अलग कुछ सोचा है कब तूने खुद को चांद है माना हम भी तेरे दीवाने हैं आकर बोले ख्वाबों से अब दोनों आँखें खाली कर लो इस अलमारी में हमको अब थोड़े आंसू रखवाने हैं गजलें बेचो ख़्वाब भी बेचो पूरी दौलत लेकर आओ घर तो माना बनवा दोगे ताजमहल भी बनवाने हैं दिल में आने से पहले तुम दिल मेरा क्यों धड़काते हो आप अभी तक बेगाने हैं ? दरवाजे क्यों खटकाने हैं?

Saturday, August 11, 2018

नहीं लिखना चाहती



मैं कवयित्री हूँ !
पर नहीं लिखना चाहती
शोक गीत
नहीं लिखना चाहती
राजनीति के दाँव पेंच
नहीं लिखना चाहती
बच्चियों के साथ अत्याचार
नहीं लिखना चाहती
मिड डे मील से होती मौत
क्योंकि नहीं भर सकती
अपने बच्चों के
फेफड़ों में भय 

नहीं लिख सकती
किसान की भूख और
पेड़ों से लटके शव
नहीं लिखना चाहती
सैनिकों के रोते बच्चे
नहीं लिखना चाहती
त्रस्त आम नागरिक

लिखना चाहती हूं
मेरा खुशहाल भारत
मेरा भारत महान
लिखना चाहती हूं
भाई-भाई
हिन्दू मुसलमान
सारे जहाँ से अच्छा
हमारा हिन्दुस्तान
पर लिख नहीं पाती

समाज के हर कोने से सुनते ही
अजगर निकल आयेगा
मेरी सोच और कलम को मेरे साथ
निगल जायेगा, निगल जायेगा।


#रेवा 
#भारत 

Friday, August 10, 2018

कोई बात नहीं


मैं बड़ी बड़ी बातें 
सोच ही लेती हूँ
मसलन
फर्क नहीं पड़ता मुझे
किसी भी बात से
कोई तारीफ़ करे तो
अच्छा न करे तो
कोई बात नहीं,
कोई दोस्त की तरह
हाथ थाम राह दिखाये
तो ठीक नहीं तो
कोई बात नहीं ,
मैं करती रहूँ कोशिशें
पर वो नज़र अंदाज़ की जाए
तो कोई बात नहीं ,
मैं बेरुखी देखती रहूँ
पर कहती रहूँ की
कमी मुझ में ही है
कोई बात नहीं ,
जिससे करूँ प्यार
वो प्यार होते हुए भी
न जताए
तो भी कोई बात नहीं,

पर असलियत तो ये है
इंसान हूँ मैं भी
चुभती हैं बातें
नजरअंदाजी दुख
दे जाती है
बेरुखी तोड़ देती है
विरह का एहसास
तड़पा देता है
पर ख़ुद को सहनशक्ति की
मिसाल दिखाते हुए
ख़ुद से भी झूठ बोलती रहती हूँ
और कहती रहती हूँ
कोई बात नहीं  ......

#रेवा
#मैं