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Saturday, July 21, 2018

नयी यादें




जानते हो
तुम्हारी याद
बेतरह आती है
और मेरे ख्यालों में
हर मुलाकात
महकती रहती है

आँखों की बरसात
मिलवाती है उस
सूखी छतरी से
जिसके होते हुए
भीगना बहुत भाया था
हम दोनों को

कैफ़े का वो टेबल और
मेरी पसंदीदा कॉफ़ी
तेरे बिना
मुझे मुंह चिड़ाते हैं
पर तब  अनायास ही
कॉफ़ी से और इश्क हो जाता है

हाथों में कभी कभी
लगता है तेरे हाथ
रह गए हैं
बस ऐसे ही तुझसे जुड़ी
हर चीज़ को  महसूसते
मुस्कुरा कर चल पड़ती हूँ
नयी यादें बनाने ........


#रेवा








Friday, July 20, 2018

सुंदरता के मापदंड


सुंदरता के मापदंड
क्या हैं ? ???
ये मुझे कभी
समझ नहीं आया
पर जितना समझा 
उससे लगा
सूरत तो है ही
पर सीरत सबसे अहम है


ये दोनों का मेल इंसा को
इंसा बनाता है
अगर सूरत में कमी है
तो चल भी जाता है
पर सीरत का दर्जा
सबसे ऊपर....
लेकिन हँसी
आती है
ये बताते हुए की
आज सीरत  से
ज्यादा सूरत
को महत्व दिया जाता है

सुंदर सूरत हो बस
उसके बाद का सब
मैनेज हो जाता है
लगता है
आर्टिफीसियल दुनिया में
जीते जीते हमे
सब वैसी ही चीज़ें
पसंद आने लगी हैं......


रेवा


Thursday, July 19, 2018

कौन हूँ मैं ??



कौन हूँ मैं ??
एक नारी
बहुत आम सी
साँवले रंग वाली
गढ़ी गयी थी मैं
जिस गढ़त में
कई सालों तक
उसी के साथ चली
सीखी थीं जो बातें
उन्हें ही सच मानती रही
पर दुनिया कुछ और ही है
ये बात धीरे धीरे पता चली.....

तो मैंने दुबारा से ख़ुद को गढ़ा
एक नया चेहरा बनाया
जो मुझे बहुत पसंद आया
अक्षरों से दोस्ती की
और अपनी एक
नई दुनिया बनायी
जो इन किताबों से शुरू
होकर लफ़्ज़ों के रास्ते
तय करते हुए
कलम तक जाती है
और सुकून से भर
देती है मन ....


#रेवा

Wednesday, July 18, 2018

मेरा साया



दिन में वो साया
जो हल्की
धूप में
साथ नज़र आता है
वो अंधेरी रातों को
अकेला कर
कहाँ चला जाता है ??

उसके साथ रहते हुए भी
इतनी तन्हाई 
क्यों महसूस होती है ?
अपनी लकीरों में तो उसे
पाया है न
फिर भी क्यों दूर मुझसे
मेरा साया है ??

जब चाहती हूं
उसमे सिमटना
अपना दर्द बांटना
उसके बाजुओं को
अपने आंसुओं से भिगोना
तो वो क्यों नहीं मिलता ?

कहाँ चला जाता है
हर बार
मुझे यूँ अकेला कर
मेरा ही साया ??


#रेवा

Tuesday, July 17, 2018

उम्मीद




मत करो अब 
मुझसे वो पहली सी 
उम्मीद की 
नहीं दे पाऊँगी 
अब कुछ भी तुम्हें ...

जानते हो जब दर्द हदें  
तोड़ देता है 
तो बदले में 
बहुत कुछ ले भी लेता है 

मुस्कान तो आज भी 
खेलती है होठों पर 
लेकिन सुकून -ए- दिल 
नहीं है 

आंसुओं का इन आँखों में 
काम नहीं अब कोई 
पर आंखें अब शरारत से 
मुस्काती नहीं है 

गाती मैं आज भी हूँ 
पर मस्ती में 
गुनगुनाना भूल गयी हूँ 

आईना देख संवरती 
अब भी हूँ 
पर उसमे तुम्हारा अक्स देख 
शर्मा कर नज़रें नहीं झुकाती 

लटें अब भी उलझती हैं मेरी 
पर उन्हें सुलझाने के 
बहाने तुम्हें पास 
नहीं बुलाती 

बरसात मुझे अब भी 
उतनी ही पसंद है 
पर तुम्हारा हाथ पकडे 
बूंदों को महसूस करने की 
इच्छा नहीं होती 

रिश्ता तो आज भी है 
पर परवाह और प्यार की जगह 
जिम्मेदारी ने ले ली है....... 

रेवा 

Monday, July 16, 2018

पता





स्त्री हैं हम
हमारा कोई
स्थायी पता नहीं होता
जहाँ हम पैदा
होतीं हैं वहां
ताउम्र रहतीं नहीं
जहाँ उम्र गुजारती हैं
वहां कुछ इस तरह
रहती हैं
जैसे पांव के नीचे
खाई हो जिसमें
हम धस नहीं सकती
और सर पर जो
नीला आसमान है
उस पर पंछी बन
उड़ भी नहीं सकती
ज़िन्दगी इनके
बीच तारतम्य बैठाते
गुज़र जाती है ....

#रेवा 
#स्त्री 

#अमृता की "खामोशी के आंचल में"
पढ़ते हुए

Saturday, July 14, 2018

पुल




औरतें अकसर
पुल होती हैं
घर के तमाम
सदस्यों के बीच ...

बुजुर्ग बाप और
अधेड़ उम्र के बेटे के बीच
एक तरफ़ बहु
एक तरफ बीवी
बातों को बिगड़ने से
बचाने की कोशिश में
कभी एक तरफ़ होती है
कभी दूसरी तरफ
फिर पुल बना
सुधारने की कोशिश
करती हैं घर का माहौल......

किशोर होते बच्चे
जब नहीं समझते
अपने पापा की बात
और उनका गर्म खून
ज़ोर मरने लगता है.........
दूसरी तरफ उनके पापा
देने लगते हैं
अपने समय की दुहाई तो
फिर बन जाती हूँ पुल
बाप और बच्चों के बीच.......

हमारे अपने सपने
हमारी अपनी इच्छायें
जब जोर मारने लगती है तो
हम फिर एक पुल का
निर्माण करतीं है
घर का बजट
घर की ज़िम्मेदारी
और अपने सपनों के बीच.........

ऐसे है न जाने
कितने अनगिनत पुलों
का निर्माण करती हैं हम
हमारी बनायी पुलों की
ख़ासियत ये है की
ये बहुत मजबूत होती है
उन पुलों की तरह नहीं
जो भ्रष्टाचार की वजह से
भर भरा कर गिर जाते हैं .....


#रेवा 

Friday, July 13, 2018

मेरी जमा पूंजी


पापा आपके लिए

बचपन की यादें, कितनी प्यारी होती हैं न ..और जब  जनवरी का महीना आता है तो शिद्दत से बचपन और पापा याद आने लगते हैं ।
जबसे होश संभाला तब से शादी के बाद तक, माँ से ज्यादा पापा से जुड़ी रही उनकी सीख उनकी हिदायत उनकी रेसिपी।

एक इच्छा जाहिर करने की देर थी पापा मेरी हर ख़्वाहिश पूरी करने की कोशिश करते। चाहे वो साइंस पढ़ना हो या भूख हड़ताल कर कंप्यूटर क्लासेज करना । या फिर साईकल सिखना , या फिर वेस्टर्न ड्रेस पहनने की चाह जो उन्हें बिल्कुल पसंद न थी , दीदी ने इनमे से कुछ भी नहीं किया था।
धर्म युग नाम की एक मैगज़ीन आती थी तब, पापा हमेशा वो पढ़ कर रोचक बातें साझा करते थे मुझसे । मुझे गाने सुनना बहुत पसंद था , उस समय चित्रहार बुधवार और रंगोली रविवार सुबह आता था । रविवार को मैं और पापा नाश्ता बनाते थे, जैसे ही रंगोली शुरू होता एक आवाज़ आती " बेटा आजा तेरा प्रोग्राम शुरू हो गया है। हम दोनों फिर गाने सुनते और देखते थे ।

एक सफ़ेद मखमल का छोटा बैग लाये थे पापा , जब ठंड शुरू होती तो काजु किशमिश अखरोट आता था घर में , सब मिला कर हम तीनों भाई बहन में बराबर में बांट दिया जाता था, हमारे लिए वो अमृत था, मैं उसे पापा के दिये बैग में रखती और ठंड भर खाती थी , कभी कभी दीदी भईया के हिस्से से भी थोड़ा मार लेती थी ।

जब मैं बीमार पड़ती तो सारा घर सुबह सोता रहता पर पापा हॉर्लिक्स बना कर दे जाते थे मुझे, मजाल है भूखी रह जाऊं, एक बार उन्हें पता चला कि मैं कॉलेज भूखी गयी हूँ तो उन्होंने पूरा घर सर पर उठा लिया था।
पढ़ाई पूरी होने के बाद जब शादी की बारी आई तो उन्होंने बस एक सीख दी थी "बेटा नए माहौल में एडजस्ट होने में कम से कम 1 साल लग जाता है, कोशिश करोगी तो एडजस्ट कर लोगी । बस वही सीख पल्ले में बांध ली थी मैंने।
अब वो इस दुनिया में नही हैं, लगता है वो गए तो पीहर साथ ले गए ....पर उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है और पापा मेरी यादों में हमेशा रहेंगे ।


#रेवा 

Thursday, July 12, 2018

प्यार का एक और रूप




होता है ऐसा भी
के कोई प्यार
जता जता के
हार जाता है

पर हम उससे
प्यार करते हुए भी
उसकी
कद्र नहीं कर पाते
और अपने प्यार की
गहराई
समझ नहीं पाते

शायद मन के
कोने में ये बात
रहती है की
वो कहाँ जाने वाला है
प्यार करता है न
जब चाहूँ मिल जायेगा
मुझे

पर जब हालात
बदलते  हैं
और वो प्यार वो साथ
छूट जाता है
तब
आंसुओं के सैलाब के
अलावा कुछ नहीं बचता

#रेवा 

Wednesday, July 11, 2018

विरह वेदना



आज मैं अपनी एक पुरानी रचना साझा कर रही हूँ .....


मैं खिड़की के कोने खड़े हो कर तेरा इंतज़ार करती
तेरे एक स्पर्श के लिए महीनों तड़पती 
तुझे याद कर के अपनी साड़ी का पल्लू भिगोती
इतना बेकरार हो जाती की तमाम कोशिशों के
बावजूद तेरी आवाज़ सुन कर गला भर आता

याद की इन्तहा होने पर
तेरे कपड़ों में पागलो की तरह तेरी खुशबू ढूंढती
और बिना बात ही हर बात पर रो पड़ती  ........

महीनों बाद जब तेरे आने की ख़बर मिलती
एक खुशी की लहर बन कर हर जगह फ़ैल जाती
मुझे लगता की मेरी खुशी, मेरी हँसी, मेरा चैन
मेरा सुकून,मेरी ज़िन्दगी आ रही है ....

पर आने के बाद तेरी वो बेरुखी, उफ्फ्फ !
तेरा मेरे एहसासों को मेरे जज्बातों को
मेरी तड़प को, नज़र अंदाज़ करना
मैं जैसी हूँ  वैसा ही छोड़ कर चले जाना .....

मुझे और भी आंसुओं मैं डुबो देता
लगता जैसे चारों तरफ़ एक शुन्य
एक सूनापन बिखर गया
जैसे जीवन सूना, आधारहीन हो गया

विरह में  वेदना सहना आसान है
पर मिलन में कैसे सहा जाए विरह वेदना ??

रेवा 




Tuesday, July 10, 2018

अपनी अदालत




मैं रोज़ ख़ुद से 
अनेकों युद्ध लड़ती हूँ
खुद को फिर अदालत में
खड़ा कर सवाल करती हूं
सवालों का सही जवाब
न मिलने पर
सजा सुना देती हूं
और ये क्रम
अनवरत चलता रहता है
जाने कब मैं अपने सवालों के
सही जवाब दूँगी और
खुद को अपनी
अदालत में बा इज़्ज़त बरी
कर पाऊंगी !!!

रेवा

Monday, July 9, 2018

दरदी बंधु



एक शख्स है ऐसा
जो सब रिश्ते नातों से परे
सबसे ऊपर है

मेरी खुशी में 
अपनी खुशी मिलाकर 
उसे दोगुना करने वाला
दुख में उसे बांट
व्यथा को कम करने वाला 

मेरी आंखें पढ़ कर
दिल का हाल
जानने वाला 

वो शख्स जो
मेरी आँखों में
आंखें डाल
मेरे गलत को
गलत बोलने की हिम्मत
रखने वाला

मेरे साथ हमेशा 
मज़बूत स्तम्भ की तरह 
खड़ा रहने वाला
मेरा हाथ थाम
मुझे आगे ले जाने वाला
लाख रूठ जाऊं
मुझे मना लेने वाला

ये शख्स और कोई नहीं
ये है मेरा दरदी बंधु
मेरा कान्हा .....


रेवा

Sunday, July 8, 2018

बूढ़ा पीपल






बहुत खुश था
वो गांव के
चौराहे पर खड़ा
बूढ़ा पीपल,

बरसों से खड़ा था अटल
सबके दुःख सुख का साथी
लाखों मन्नत के
धागे खुद पर ओढ़े हुए ,
कभी पति की लम्बी उम्र
कभी धन की लालसा
कभी क़र्ज़ वापसी
तो कभी अच्छी फ़सल
बेटी का ब्याह
बेटे की चाह
और न जाने क्या क्या

पर पहली बार
किसी ने अपने लिए
एक नन्ही कली की
मन्नत मांगी ,
तो पीपल को लगा
उसका जन्म सफल
हो गया इस धरती पर ....

लेकिन आज वो ज़ार ज़ार रोया
जब उस नन्ही कली को
चिथड़ों और
वह्शाना निशानों के साथ
अपने पास बैठ बिलखते
हुए देखा ......


रेवा 

Saturday, July 7, 2018

गिरगिट



बचपन में 
देखा था बड़े
गौर से गिरगिट को
रंग बदलते हुए
अचरज तो हुआ था
पर बहुत खुश भी हुई थी
ऐसा कुछ देखते हुए 

अब बड़े गौर से
देखती हूँ
मनुष्यों को रंग
बदलते हुए
कितानी जल्दी
इतने तरह के
रंग बदल लेते हैं 
माशाल्लाह 

पर खुशी बिल्कुल
नहीं होती
एक बात बताओ ज़रा
इतने गिरगिटिया कैसे
हो लेते हो !!!


रेवा

Friday, July 6, 2018

काश पापा आज आप होते

काश मैंने आपके सामने
लिखना शुरू किया होता
काश मैं अपनी
पहली किताब
आपको भेंट कर पाती
काश आप अख़बार में  
अचानक  मेरी लिखी 
कविता पढ़ते और
सबको पकड़ पकड़
कर बताते
मेरी हर उपलब्धि पर 
मुझे फ़ोन कर बधाई देते
जानते हैं पापा 
वैसी ख़ुशी 
दुनिया में  किसी को
नहीं होती है
काश आपके चेहरे पर
मेरे लिए वो गर्व की
रेखाएं मैं देख पाती .....
काश पापा आज आप होते !!


रेवा

Thursday, July 5, 2018

ग़रीब जो ठहरी


रोज़ सुबह उठकर
आंखों की रौशनी से
भगवान के आगे 
दीप जलाती है वो
ताकी ज़िन्दा रहे 
उसका इकलौता बच्चा
ग़रीब जो ठहरी

केवल पानी से करती है
पेट भर नाश्ता
और निकल पड़ती है
किसमत के पत्थर को
मजबूरी के हथौड़े से 
तोड़ने  
ग़रीब जो ठहरी 

बरसात में टपकती है 
जब उसकी झोपड़ी
हाथों के खुरदुरे बिस्तर पर  
मैली आँचल के छत्ते तले
सुलाती है बचाकर बूंदों से 
अपने मासूम बच्चे को
वो एक माँ भी है 
पर ग़रीब जो ठहरी 

न रगों में अब लहू है
न जिस्म में कुछ पानी
न आंखों में आंसू हैं 
न पुतलियों पर नमदारी 
वो तो बस 
गरीबी पहनती है 
गरीबी खाती है
गरीबी ओढ़ती है 
गरीबी बिछाती है 
और एक दिन
ग़रीब संग गरीबी मर जाती है 

रेवा 

Wednesday, July 4, 2018

झील के इस पार



याद है तुम्हें 
वो झील के
किनारे की पहली
मुलाकात
कितना हसीं था न
वो इत्तेफ़ाक

तुम किसी और शहर के
मैं कहीं और की
अपने अपने शहरों से दूर
मिले थे किसी और जगह पर
देखा नहीं कभी एक
दूजे को
पर बातों ही बातों में की थी
अनगिनत मुलाकात
एक ख़्वाहिश
जरूर थी दिल में
एक बार
तुम्हें इन नज़रों से
निहारूँ तो सही

उस दिन लगा
ऊपर वाले ने
सुन ली मेरे दिल की पुकार
तुम और मैं मिले थे फिर
झील के इस पार

भरी भीड़ में पहचान लिया था
तुमने मुझे
और फिर पी थी हमने
कॉफी बातों के साथ
कुछ देर में चले गए तुम
और मैं भी
पर वो शाम
वैसी की वैसी टंगी है
आज तक मेरे दिल की
दीवार पर
जब मन होता है
उतार कर जी लेती हूं
और एहसासों का इत्र लगा
टांग देती हूं फिर उसी जगह !!


रेवा

Tuesday, July 3, 2018

बाँसुरी



वो जो कन्हैया है न
जो बंसी बजाता है
उसे उसकी बाँसुरी
कितनी पसंद है
प्राणो से प्यारी है
यहाँ तक की राधा और
उनके बीच भी वो रहती है

पर वो बाँसुरी जब बनती है
उसे कितनी मुश्किलों
से गुजरना पड़ता है
उसे काटा जाता है
आकार दिया जाता है
फिर उसके तन पर छेद
किये जाते हैं
उसे चमकाया
जाता है
तब कहीं वो जा कर
कन्हैया के होठों
से लगती है

मेरे भी इम्तिहान का
समय चल रहा है
पर मैं भी चमक कर
एक दिन उस बाँसुरी वाले की
प्रिय बन ही जाउंगी ......

रेवा


Monday, July 2, 2018

मेरे हिस्से


मेरे हिस्से आता है 
सिर्फ़ देना
अपनी मीठी बोली
अपना प्यार
अपना समर्पण
अपना परिश्रम
अपना सारा समय
अपनी हंसी
पर मेरी भी कुछ
कमजोरियां हैं
मन के कुछ निग्रह हैं
क्या तुम उसे
नज़रंदाज़ नहीं कर सकते
जब इतना कुछ लेते हो
बदले में कुछ न दो
पर सम्मान तो
दे ही सकते हो न  !!!


रेवा 

Sunday, July 1, 2018

महीने का हिसाब



चाहती हूँ मैं भी
नज़्म लिखना
प्रेम में पगी
जीवन से भरपूर
एहसासों में डूबी
भावनाओं से परिपूर्ण
जो पढ़ते ही ले जाए
किसी और दुनिया में

पर जब जब लिखने
बैठती  हूँ
बेख़याली में
लिखने लगती हूँ
महीने का हिसाब

कितना किसको दिया
कितना बाकी है
बजट के अन्दर
सब सँभाल पा रही हूँ
या फिर इस महीने भी
महँगाई के डंडे
और ज़रूरतों से
ओवर बजट की मार
झेलनी पड़ेगी

डूब जाती हूँ फिर
इस सोच में
क्या इस बार भी
कहा सुनी हो जाएगी
खर्च को लेकर ?
या शांति से निपट जायेगा
इस महीने का हिसाब किताब
पर हर महीने
इसी सवाल में अटकी रहती हूँ

चाहती हूँ मैं भी
नज़्म लिखना
पर बेख़याली में
लिखने लगती हूँ
महीने का हिसाब !!!

रेवा



Saturday, June 30, 2018

नज़रें



नज़रें  कितना कुछ बयां करती हैं
कितने एहसास भरे रहते हैं उनमें
कुछ  एहसासों को शब्दों में
लिखने की एक कोशिश


विरहन 
जब अपने प्रियतम
के आने की खबर पा कर
उसके पास जाती है
और उसे नज़र भर देखती है

प्यार 
जब पति पत्नी के
कंधे पर प्यार से हाथ
रखता है और पत्नी
उसे निहारती है

व्यथा 
जब एक विधवा
दूसरी को देखती है
अपने जैसे दुःख से
गुजरते हुए

ममता
माँ रोती भी है
हंसती भी है
जब बेटी दुल्हन
बनती है

संतुष्टि 
जब अपने भूखे बच्चे को
खाना खाते हुए
माँ देखती है

बचपना 
बरसात को देख
भीगते उछलते
बड़ी उम्र के लोगों की
शरारती नज़रें

तृप्ति 
भूखे की थाली में
भोजन और प्यासे
को पानी
वो तृप्ति भरी नज़र

कुटिल
ये सबसे पहले
नज़रें बता देती हैं
शब्द और कार्य
देखने की जरूरत
ही नहीं पड़ती .......


रेवा

Friday, June 29, 2018

गुड़िया


छोटी सी गुड़िया थी तू
जब भगवान ने तूझे मेरी
झोली में डाला था..

पूरे घर में
उछलते कुदते
मिठी मिठी बातें करते
नखरे दिखाते
कब बड़ी हो
मेरी प्यारी सखी बन गयी
पता ही नहीं चला

मेरे हर फैसले में
मेरा साथ देने लगी
बिलकुल मेरी छाया
बन कर
पर तब सोचा नहीं
एक दिन तूझे
ये घर छोड़
पीया के घर जाना होगा
या सोचना चाहती नहीं थी

पर अब जब ये घड़ी
सामने है
तो दिल का कोना
रोज थोड़ा थोड़ा
खाली हो जाता है
आंखे रोज़ बरसती हैं
लेकिन मन बार बार
यही कहता है
जा रही है तू करने नयी ज़िन्दगी की शुरुआत
मिले तूझे प्यारे लम्हों की सौगात
पीया का सदा रहे तेरे हाथों में हाथ
होती रहे हमेशा ख़ुशियों की बरसात

रेवा

Thursday, June 28, 2018

त्याग की देवी





हम आम औरतें हैं
त्याग की देवी नहीं....
बंद कर दो हमे
इस नाम से पुकारना

हमारे भी सपने हैं
साधारण ही सही
पर.....
सपने तो कभी
साधारण नहीं होते
कभी छोटे या बड़े नहीं होते.....
सपने सपने होते हैं
जो हमेशा ही ख़ास होते हैं  ....

हम तुम में से किसी से
कुछ नहीं मांगती
जो और जितना हमारे नसीब में है
वो हमे मिल कर ही रहेगा....
गर न मिला तो शिकायत
बस ख़ुद से ही है
ख़ुद में ही कोई कमी
रही होगी ....

इसलिए हम त्याग बिलकुल
नहीं करतीं
जो समय की मांग है
जैसी परिस्थितीयाँ होती है
ख़ुद को उनके अनुरूप
ढालना ही समझदारी है
तो वहीँ करने की
कोशिश रहती है

विपरीत समय सब पर आता है
उस समय
हम औरतें
सहनशक्ति रखते हुए
हँस कर सब झेल जातीं हैं
और सबको हिम्मत भी देती हैं
दुःख हमे भी होता है
जैसे सबको होता है
टूटता भी है मन
पर हिम्मत बरकरार
रखती हैं हम

बस इल्तिज़ा इतनी है
त्याग की देवी की उपाधि
न दी जाए हमें.......


रेवा

#औरत

Wednesday, June 27, 2018

शाम


शाम को जब
दिन के तमाम
उलझनों से
फारिग होकर
छत पर टहलने
जाती हूँ तो ,
प्रकृति की छटा
देखते ही बनती है
सूरज अपने बिस्तर पर
विश्राम करने की तैयारी
में  उलझा रहता है ,
तो उधर चाँद उठने को बेताब ....
कहीं लालिमा बिखरी रहती है
तो कहीं एकदम नीला आकाश

पवन भी दिन भर
सूरज की सेवा से मुक्त हो
उन्मुक्त बहने लगता है
और पंछी घर जाने की
खुशी में कलरव
करते नज़र आते हैं
आह ! ये वातावरण मेरा
मन मोह लेता है.....
पर पता है ऐसे समय मुझे
सबसे ज़्यादा क्या याद
आता है ??
तुम ....सिर्फ तुम और
तुमसे जुड़ी तमाम शाम !!!!


रेवा 

Tuesday, June 26, 2018

हमराही



जब चाहा तुम्हारा साथ
तुम्हारे कंधे से कंधा
मिला कर चलना ,
तुम्हे अपना सबसे
प्यारा हमराही और
दोस्त बनाना
तब तुमने
छिटक दिया मेरा हाथ
साथ तो क्या
प्यार के दो बोल
भी मय्यसर न हुए,
अब जब ठोकरें खा कर
मैंने चलना सीख लिया
तो अचानक तुम्हे
एहसास हुआ की
मुझे तुम्हारी जरूरत है
और तुम्हे मेरी
पर अब आदत रह नहीं गयी
हाथ थाम कर चलने की.....
अब फिर से ख़ुद को
बदलना बस में नही मेरे ,
फिर भी साथ तो
चलना है
आखिर जीवन साथी जो हो
तो चलो
एक समझौता करते हैं
मैं तुमसे तुम्हारी बेरुखी
छीन लेती हूँ
और तुम मुझसे मेरा
प्यार मांग लेना
फिर जीवन मैं और तुम
से इतर  "हमारा" हो जाएगा !!!

रेवा 

Monday, June 25, 2018

स्वार्थी




आज मैंने तुम्हें
तुम से मिलाने की
एक और कोशिश करी
इस कोशिश में लगा ......

जबसे मैंने तुम्हें जाना है
तुम्हें दूसरों के लिए ही
जीते देखा है
माँ , बाप , बीवी , बच्चे
भाई ,बहन
चलो माना ये दूसरे नहीं हैँ
पर इनमे कहीं तो तुम्हारा भी
एक कोना होना चाहिए न
ऐसे जीते जीते तुम एकदम
अलग थलग बिल्कुल अकेले
हो गए
बस काम और घर
बोलना भी कम कर दिया
सबकी जरूरतें पूरी करते रहे
ख़ुद को दरकिनार कर
ये भी अच्छी बात है
पर ये क्यों भूल जाते हो
अपने लिए सिर्फ तुम जवाबदेह हो
सुनो.....
एक बात मानोगे मेरी
थोड़े से स्वार्थी बन जाओ
ख़ुद के लिए जीयो
ख़ुद को गले लगाओ
ख़ुद प्यार करो
अपने मन पसंद काम करो
फिर देखो दुनिया कितनी
सुंदर लगेगी तुम्हें......


रेवा 

Friday, June 22, 2018

दरवाज़े




कई दरवाज़े हैं
मेरे मन के अन्दर
जिन पर ताला तो है
पर उनकी चाबियाँ भी
मेरे ही पास है
हर दरवाज़े को
रोज़ खोल कर
छोड़ देती हूँ
ताकि ताज़ी हवा
जाती रहे

ऐसा करते समय मैं झांक
लेती हूँ उनके अन्दर
हर दरवाज़े के पीछे मेरे
घर के सदस्यों के
दुःख दर्द
उनकी ख्वाहिशें
छिपी होती हैं
जो झांकते ही मेरी
हो जाती है

मैं जागती हूँ तो दिन भर
मेरे साथ चलती हैं
मैं सोती हूँ तो
मेरा अवचेतन मन उसी के
बारे में सोचता रहता है

सुबह उठते ही
मैं अपने आप को
प्रभु का नाम बुदबुदाते
हुए पाती हूँ
ताकि दूर हो जाए
उन सबके दुःख दर्द
और पूरी हो सके उनकी
तमाम ख्वाहिशें !!!

रेवा



Thursday, June 21, 2018

कविता



मैं रोज़
पढ़ती हूँ कविता
कई बार कुछ ऐसा पढ़ती हूँ
जो मन को झकझोर देता है,
द्रवित कर देता है
कई बार आक्रोश से
भर देता है
कभी कभी बेअसर भी
होती हैं कविताएं

लिखती भी हूँ हर रोज़
प्रेम, विरह
धरती, आकाश
समुद्र, नदी
भूख, गरीबी
सहनशक्ति और
न जाने क्या क्या
लेकिन सोचती  हूँ
क्या मेरी कविताएं
कुछ दे पाती है किसी को ???

क्या ये बेरोज़गार को रोज़गार
बेघर को घर
भूखे को रोटी 
प्यासे को पानी
न उम्मीदों को उम्मीद
मज़लूमों को इंसाफ 
विरहन को प्यार
दे पाती हैं ????

इनमें से  कुछ भी तो नहीं
दे पाती मेरी कविताएं
पर फिर भी मैं रोज़ आती हूँ
इनके पास
रोज़ पढ़ती हूँ
रोज़ लिखती  हूँ
क्योंकी प्यार है मुझे
कागज़ और कलम से
विशवास है मुझे
ये कविताएं कहीं किसी को
कुछ सुकून के पल तो दे ही पाती हैं
कहीं किसी का ज़मीर भी
जगा जातीं हैं 
किसी को सोचने पर मजबूर 
कर देती हैं 
और आने वाली नस्लों को
हमारे जीवन से मिलवाती हैं
इसलिए हे कवि/ कवियत्री
तुम ज़रूर लिखो कविताएं।


रेवा 


Wednesday, June 20, 2018

अंतर्यामी




तुम तो अंतर्यामी हो ना
सब जानते समझते हो
रोज़ तुम्हारी पूजा करते हैं सब
तुमसे सलामती की दुआ मांगते हैं
अपने परिवार की सुरक्षा
उनकी सेहत उनकी ख़ुशियाँ मांगते हैं

मैं भी ऐसा ही तो करती हूँ,
बचपन से
जबसे माँ ने सिखाया की
किसी और से कुछ नहीं मांगना
सिवा तुम्हारे
तुम ही हमारे माता पिता हो
तुमसे मांगने में कैसी शर्म

पर अब तो लगता है
तुम भी सुनते नहीं
सब यही बोलते हैं कर्म करो
ऐसा नहीं की कर्म नहीं करती
पर सुनवाई नहीं होती
तुम्हारे दरबार में

तुम्हारे ठेकेदारों के भी
पाँव पड़ती हूँ की
शायद वो मेरी सिफारिश
कर दें तुमसे
तुम मेरी न सही
तो उनकी ही सुन लो

पर लगता है तुम भी घबरा
गए हो इतने मांगने वालों से
किस किस की सुनोगे
तो चलो आज से मैं
नहीं मांगती कुछ भी

जब अंतर्यामी हो ही
तो जानते ही हो सब
तुम ज़िद्दी भी हो
तो तुम्हारी सृजन
यानि मैं भी ज़िद्दी
देखते हैं तुम्हारे दरबार में
इन्साफ़ के क्या पैमाने हैं ??

रेवा











Tuesday, June 19, 2018

किताबें




जब मन दर्द से भरा हो
तब सांस भी कांच के
टुकड़ों से चुभते हैं ......
काजल भी बग़ावत
पर उतर आते हैं
आंसुओं को
रोकने में असमर्थ ....
वैसलीन के बावजूद
होंठ सूख जातें हैं और
मुस्कुराने से इनकार करते हैं
गाने के बोल
कानों में ज़हर घोलते हैं ....
ऐसे मे कभी कभी
संतुष्टि दे जाती है किताबें
जिसे पढ़ कर जब
सीने पर रखो तो
लगता है
ये सारा दुख
खुद मे समा रहीं है
और भर रही हैं
हृदय में शब्द दर शब्द
सुकूं !!!

रेवा 

Monday, June 18, 2018

पहली बरसात


याद है आज भी मुझे 
वो पहली बरसात
जो मेरे जीवन की
पहली बौछार नहीं थी
पर फिर भी खास थी
तुमने पूछा था उस दिन
सुनो, कभी भीगी हो
बारिश में ??
मैंने कहा नहीं
मुझे पसंद नहीं
तुमने कहा,
अरे
बूंदों से किस बात का बैर
आसमान से बरसते प्यार
में भीग कर तो देखो
बूंदों से प्यार न हो जाये
तो कहना
जाने क्यों पर
बात मान ली तुम्हारी
खूब भीगी थी उस दिन
तन तो भीगना ही था
पर उस दिन की
बरसात में मन भी
भीग गया !!!

रेवा

Saturday, June 16, 2018

चट्टान




जब जीवन में 
आता है
मुश्किलों का
भारी चट्टान
तब
मनोबल कमज़ोर
हो जाता है
मन टूट जाता है
दिमाग फटने लगता है
विश्वास
डगमगाने लगता है
उनके टूटने, फटने और
कमज़ोर होने को
महसूसो
तभी तो पता चलेगा
वो हैं तुम्हारे अंदर
मौजूद अभी भी
ऐसा करो 
एक नई चट्टान बनाओ
आत्मविश्वास की 
उसमे मनोबल का लेप लगाओ
फिर देखो
कैसे मुश्किलों का हल
निकलता है !!


रेवा 

Friday, June 15, 2018

योगी




ऐसा क्यों महसूस होता है की
मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है
वो तुम ही थे न
जो रोज़ ख़्वाबों में आकर
मेरे दिल की सफ़ाई कर
प्यार का दीप जला जाते थे
कई बार तुम्हें रोकना चाहा
पर तुम वो योगी थे
जो चाहते थे कि मेरा प्यार में
विशवास बना रहे
इसलिए अलख जागते रहे
लेकिन बदले में कभी कुछ भी न चाहा
पर बिना चाहे ही
तुम्हारे सांसों की खुश्बू
बस गयी है मेरे सांसों में
तेरे दिल की गुफा में अब मैं
आराम करना चाहती हूं
ओ मेरे योगी ख़्वाबों से इतर
हकीक़त बन कर आओगे न !!!!

रेवा

Wednesday, June 13, 2018

तुम में तुम्हें



तुम कभी नहीं
जान सकते
तुम में तुम्हें
कितना ढूंढती हूँ मैं
तुम तो जैसे
खो से गए हो
खुद में

रोज़ तुम्हें
समझाते जीवन के
मायने बताते
तुम्हें तुम से वापस
मिलाने की कोशिश में
मैं, मैं रह नहीं गयी
ये सारी कोशिशें .......
जीवन जीने की जंग
सब अपनी जगह सही है

पर कभी कभी मेरा
मैं तुम्हारे तुम से
मिलना चाहता है
और करना चाहता है
अनगिनत बातें
बातें प्यार की
बातें मेरी और तुम्हारी
आँखों में आँखें डाले
देखना चाहता है
सिर्फ तुम्हें
बांहों में बांहें डाले
महसूस करना चाहता है
सिर्फ तुम्हें

मैं नहीं चाहती यूँ ही
दुनिया से रुखसत होना
जीना चाहती हूँ बार बार
और मरना भी चाहती हूँ
बार बारे
पर तेरे साथ तेरी बांहों में !!!

रेवा



Tuesday, June 12, 2018

तुम्हारी कविता



एक दिन यूँ ही 
अलसायी सी 
दोपहर में 
तुम्हारी कविताओं की 
किताब हाथ में आ गयी 
जिसमे तुमने लिखी थी 
मेरी ये सबसे पसंदीदा 
कविता 

बारिश की सौंधी ख़ुश्बू
तुम्हे  किसी भी 
इत्र से ज्यादा पसंद थी ,
घंटों बैठ मेरे साथ 
बरसात को निहारा करती थी 
पानी का धरती पर 
गिरना और फिर 
उसी मे मिल जाना
तुम्हें  फिलोस्फिकल लगता,

टप टप पत्तों से झरते
मोती से
अपनी अंजुरी भर
मुझ पर लुटाती ,
तो कभी अपने बालों को
गीला कर
मेरे एहसासों को भिगो देती ,

कभी यूँही
मेरे कंधे पर सर रख
अनगिनत बातें करती .....
पर अब न तुम हो
न मेरे शहर में वो बरसात ....
काश ! वो बरसात
लौट आये
काश ! तुम फिर
अपनी कागज़ की
कश्ती में कहीं से आ जाओ
और भिगा दो मेरे
सुप्त एहसासों को !!!

रेवा

Monday, June 11, 2018

प्यारी सी बच्ची



कभी कभी
मैं सोचती हूँ
उस प्यारी सी
बच्ची की बारे में
जिससे मिली थी
कुछ महीनों पहले

जो रहती है
एक कसबे में
जो ज्यादा पिछड़ा
नहीं है ,
जहाँ बात
करने के लिए
मोबाइल उपलब्ध है
और इन्टरनेट भी है
पर लड़कियों को इन्टरनेट जैसी
सुविधाओं से दूर रखा जाता है

अपने समाज को
लेकर सजग
पर समाज की वजह से
न मिलने वाली
सुविधाओं के प्रति
आक्रोशित थी

उसकी आँखों में
जुनून सा तारी था
कुछ कर गुजरने की ललक थी
साथ ही अपने को
औरों के बराबर
खड़ा करने की चाह थी
सपने छोटे
पर बहुत सारे थे
जिनसे वो बिलकुल
समझौता नहीं
करना चाहती थी

उसे मैं
आज तक नहीं भूल पाई
और भूलना चाहती भी नहीं
क्योंकि उसकी आंखें
उसकी बातें
और लड़ने का जुनून
मुझे उम्मीद की किरणों
से मुलाकात करवाती है!!

रेवा


Saturday, June 9, 2018

प्रकृति


जानते हो 
प्रकृति कभी बूढ़ी
नहीं होती
झुर्रियां नहीं आती चेहरे पर
अंग बेकार या शिथिल नहीं
होते इसके
साल दर साल बीतते जाते हैं
पीढ़ियाँ बदलती जातीं हैं
पर वो वैसी ही रहती है
लेकिन हम ठहरे मनुष्य
हमे दिमाग से नवाजा है
ख़ुदा ने
तो हर जगह दखलंदाज़ी
करना भी ज़रूरी है
हमने शुरू कर दी
प्रकृति से छेड़ छाड़
शुरू शुरू में तो एक आध
फोड़े फुंसी ही निकले
पर हमें समझ नहीं आया
जिसका नतीजा ये निकला की
धीरे धीरे
प्रकृति सच में बूढ़ी होने लगी
उसके अंग बीमार हो गए
नदियों का पानी सूख ने लगा
पेड़ो की जगह
कंक्रीट नज़र आने लगे
हवा में कारख़ानों का ज़हर
घुलने लगा
खाद् कीटनाशक और
प्लास्टिक की वजह से
मिट्टी ज़हरीली होने लगी
कहीं नहीं छोड़ा हमने प्रकृति को
अब हाल ये है की
वो दिन दूर नहीं जब
प्रकृति जर्जर होकर सच में
मर जाएगी !!

रेवा 

Friday, June 8, 2018

सुनो...




सुनो...
खड़ी हूँ मैं
बाहें फैलाए
तुम्हे अपने आगोश में 
समाने की ज़िद लिए....

रेवा

Thursday, June 7, 2018



मुश्किलों से हार नहीं मानती मैं
लड़ने को हमेशा तैयार हूँ
ये नहीं बोलती की आँसू नहीं आएंगे
पर उन्हें राहों को रौशन करने वाले
दीये बना कर हम आगे बढ़ते जाएंगे !!

रेवा

Wednesday, May 30, 2018

मैं इश्क हूँ मैं अमृता हूँ


मैं इश्क हूँ
मैं अमृता हूँ

मैं उस साहिर के
होठों से लगी
उसके उंगलियों के बीच
अधजली सी सिगरेट हूँ....

वो जो धुआं है न
जिसका फैलाव दिख रहा है?
वो इस बावरे दिल
और उस दायरे को भर रहा है

धीरे-धीरे,रफ़्ता-रफ़्ता
मुझ में ही घुलता जा रहा है

उस ऐश ट्रे में जो चंद राख
और एक टुकड़ा सिगरेट का
छूटा पड़ा है न ?

उसी लत के सहारे
ये सफ़र ज़िन्दगी का
मुकम्मल कर रही हूँ मैं

बस तुम भी इसी तरह
मुझमें सुलगते रहना

सिगरेट की टूटन मैं पीती रहूँ
और तुझे ही जीती रहूँ।

रेवा
#अमृता के बाद की  नज़्म

Friday, May 25, 2018

बुद्ध होना आसान है


बुद्ध होना आसान है 

एक रात चुपके से
घर द्वार स्त्री बच्चे को
छोड़ कर
सत्य की खोज में
निकल जाना
आसान है 

क्योंकि कोई  उंगली
उठती नहीं आप पर
न ही ज्यादा सवाल
पूछे जाते हैं
कोई लांछन नहीं लगाता
शब्दों के बाणों  से
तन मन छलनी नहीं किया जाता

लेकिन कभी सोचा है
उनकी जगह एक स्त्री होती तो
वो गर चुपके से निकल जाती
एक रात
घर द्वार पति नवजात शिशु
को छोड़ कर
सत्य की खोज में
क्या कोई विश्वास करता 
उसकी इस बात पर
यातनाएँ तोहमतें लगायी जाती
उसके स्त्रीत्व को 
लाँछित किया जाता 

पूरे का पूरा समाज
खड़ा हो जाता
उसके विरुद्ध 
ये होती उसकी सत्य की खोज

बुद्ध होना आसान है
पर स्त्री होना कठिन !!

रेवा 

Thursday, May 24, 2018

मोहब्बत का सफ़र

आज तुम आये मेरे पास
और कहा की
जो तुमने लिखा है न
"तुझे मेरी आरज़ू तो है
पर मोहब्बत नहीं "

ऐसा नहीं है
मैंने कभी मोहब्बत के
बारे में सोचा ही नहीं
य कह लो समय नहीं मिला
तुम मेरी चाहत को ही
मोहब्बत समझ लो न 

असल में चाहत और
मोहब्बत में मैं अंतर
नहीं कर पाता हूँ
और अगर कर भी लूं
तो मुझे प्यार जताना
या  दिखाना नहीं आता
पर प्यार मैं तुमसे ही करता हूं
बस इतना कह सकता हूँ 

मैंने कहा, जानते हो 
तुमने आज बस इतनी सी
बात कह कर
ता उम्र अपना साथ
मेरे नाम कर दिया
यही तो चाहा था मैंने
कभी कुछ तो बोलो
इस बारे में मुझसे
चलो अब मुझे 
कोई शिकायत नहीं
तुमसे
तुम मैं और मोहब्बत
अब साथ साथ सफ़र करेंगे

रेवा 

#मोहब्बत 

Monday, May 21, 2018

प्रेम अप्रेम




कई बार
प्रेम अप्रेम हो जाता है
और जब ऐसा होता है न
दिल तड़प उठता है
अचानक आये
इस बदलाव से स्तब्ध ,
समझ नहीं पाता की
चूक कहाँ हो गयी

कोशिश बहुत करता है दिल
वापस पाने को
वो तमाम एहसास
पर मन कहता है
अब जाने भी दो
जब एहसास प्रेम स्वतः
ही आते हैं दबे पांव
तो कोशिशें कितनी भी कर लो
वो कड़वाहट कम
कर सकती है
दरारें भर सकती है
पर प्रेम नहीं करवा सकती

चलो आज से तुम्हें
तुम्हारा अप्रेम मुबारक
और मुझे  मेरा प्रेम

रेवा


Monday, May 7, 2018

नापाक रिश्ते

जब ब्याह हो जाता है
अपना दिल जान सब
न्यौछावर कर देती है स्त्री,
पर जब उसे वो मिलता नही
जो वो चाहती है
जो सबसे कीमती है उसकी नज़र में
तो उदास हो जाती है अंदर से ,
दिल में एक खाली कोना
बन जाता है
और उदास हँसी उसकी नीयती,
कभी तो बगावत कर देती है
कभी नसीब मान समझौता भी ,
पर जब कोई उसे ऐसा मिलता है
जो भीड़ में थाम लेता है उसे
बिन कहे सुने ही, सब समझ लेता है
उसकी बातें, उसकी ख्वाहिशें
तो अनायास ही वो
उसकी तरफ झुकने लगती है
उससे अपनी हर बात
साझा करने लगती है,
लेकिन जीवन में आदमी
का अर्थ है
बाप भाई पति या बेटा
फिर इस रिश्ते को
किस आसन पर बैठाये ??
इसलिए हर पल
इस अपराध बोध के साथ जीती है की
वो अपने पति और परिवार
के साथ न्याय नहीं कर रही,
जबकी वो अपने हर रिश्ते की
सारी सीमाओं से वाकिफ़ है ,
जरूरी है क्या की वो इसे कोई नाम दे?
क्या बिना नाम कोई बंधन या कोई
रिश्ता अपने मायने खो देता है,
और वो औरत है दूसरा मर्द
इसलिए क्या रिश्ता नापाक हो जाता है ?
ऐसे और भी कई सवाल हैं
क्या जवाब है हमारे पास ????
वैसे मेरा ये मानना है की 
रिश्ते कभी नापाक नहीं होते 
नापाक होती है सोच। 

रेवा 

Tuesday, April 10, 2018

स्त्री हूँ मैं






स्त्री हूँ मैं
पर अबला नहीं हूँ
बंद कर दो मुझे
इस नाम से पुकारना
मुझे कमज़ोर लिखना,
मैं अपना मुकद्दर
ख़ुद लिखना जानती हूं
किसी से बराबरी की
कोई जद्दोजहद नहीं
साबित करने की कोई होड़ नहीं
मर्दों की अपनी जगह है
और मेरी अपनी
धरती पर ये दोनो
एक दूसरे के पूरक हैं
बार बार बराबरी की बातें कर
हम ये साबित करने पर तुले हैं की
हम कमतर है
न हम कमतर हैं न सर्वोच्च
हम तो ख़ुद में पूर्ण
ईश्वर के सुंदर सृजन में से एक हैं !!


रेवा 

Thursday, April 5, 2018

ज़िन्दगी जीना चाहती हूं



मैं ज़िन्दगी जीना 
चाहती हूं
नशे के घूंट की तरह
पीना चाहती हूं ...
बूँद बूँद कर हर रोज़
कम हो रही है न
इसकी मियाद
और मैं उस बूँद के
वजूद को क्यों
समझ नहीं
पा रही हूँ ??
वो जो खो गया
मिल गया मिट्टी में
अब लौट के आयेगा ??
नहीं न
बस ...बस..तो फिर
अब बहुत हो गया
हर बूँद को अपनी
आंखें बंद कर
अपने चेहरे पर
महसूस करुँगी,
कभी अपने होठों की
प्यास बुझाऊंगी
और कभी उस बूँद
को बौछार बना
तुम्हे भिगो दूँगी
तो तय रहा
आज से
न न बल्कि अभी से
बूँद बूँद जियूंगी मैं !!


रेवा

Monday, March 12, 2018

भटकन



इश्क पाने की चाह में
भटकते भटकते
खो सी गयी हूँ
एक उम्मीद दिखती है
पर वो राह नहीं होती
वो तो गली होती है
जो निकलती है
एक और गली में
उनमें चलते चलते
उलझ सी गयी हूँ,
अब तो
डरने लगी हूँ खुद से
अपना आप
बोझ लगने लगा है...

जानती हूँ इश्क तो
खुद से करना चाहिए
अपने अन्दर ही तो है
समाहित है ये ज़ज्बा
कस्तूरी की तरह
पर ये किताबी बातें
लगती हैं
मैं चाँद की चांदनी
बन्ने की ख्वाहिश रखती हूँ
जैसे उन दोनों का
एक दूजे के बिना
कोई वजूद नहीं
एक दूजे के पूरक हैं वो
बस वैसे ही तो चाहती हूँ
मैं भी
पर वो मुमकिन होता नहीं 
और मैं इश्क पाने की चाह में
भटकते भटकते
ख़ुद से बेज़ार 
अपनी रूह को भूल 
बस लिबास बन 
फिर रही हूं !!

रेवा



Wednesday, March 7, 2018

रेगिस्तान


जीवन के रेगिस्तान में
मैं ऊंटनी बन भटकती रही
हसीन लम्हे
काटों संग फूलों जैसे मिले
उन्हें जब
कैद करना चाहा
तो वो रेत के मानिंद
फिसल गए हाथों से ....

जब रिश्तों की प्यास
से गला सूखा और प्यार
ढूंढा तब सिर्फ और
सिर्फ भ्रम हाथ लगा ....
और तब काम आया खुद की
जेब में भरा दोस्तों का प्यार ...
तपती रेत पर चलते हुए
धूप में एक साया
नज़र आया
लेकिन
जितना उसके पास जाती
वो और दूर हो जाता ,
उसके पास जाने की
कोशिश में
सूर्य की किरणों और
रेत से झगड़ कर मीलों
आगे निकल आयी
पर न वो मिला न उसकी
परछाई
वो भी रेगिस्तानी मृगतृष्णा निकला।

रेवा

Sunday, February 18, 2018

पिंजरा

एक पिंजरे से निकाल
कर दुसरे पिंजरे में
कैद करने के लिए
आज़ाद किया जाता है
पंछियों को,
उन्हें गर खुला छोड़
दिया तो डर है कहीं
आज़ाद हो वो
अपनी मनमानी न
करने लग जायें ,
अपने मन से उड़ान
न भरने लग जायें ....
अरे पिंजरे में रहेंगे
तभी तो वो अपने
स्वामी के भरोसे
जीयेंगे
वो देंगे तो खायेंगे
उनका जब मन किया
उसे पिंजरे से निकाल
खेलेंगे
फिर पिंजरे में कैद कर देंगे
लेकिन सालों ऐसे
रहते रहते
वो अपनी उड़ान ही
भूल जातीं हैं
और यही तो सारा खेल है .....

रेवा








Monday, February 12, 2018

औरत

क्या औरत
मर्द का तराशा हुआ
बुत है ?
जिसे वो तराशता है
चमकाता है
अपनी मर्ज़ी से
नुमाइश करता है
और फिर जब
मन भर जाये तो तोड़
देता है .......
न बिलकुल नहीं
न हम बुत हैं न मूरत
न बलिदान की देवी
न ही हम
सुपर वुमन बन ने की
रेस में शामिल हैं ,
हम सोचने, समझने
हँसने और बोलने वाली
बेबाक औरतें हैं ....

रेवा

Wednesday, February 7, 2018

कुरुक्षेत्र

हर कोई
सुकून की तलाश में
भटक रहा है
कोई घर में तो कोई
बाहर सुकून तलाशता है
किसी का अपने से युद्ध है
तो किसी का अपनों से ,
कोई नाम के पीछे पागल है
कोई पैसों के पीछे
कोई अहम में रहता है
तो कोई वहम में
कोई गैरों में अपनों को
ढूंढ लेता है
तो कोई अपनों को
गैर बना देता है
कोई सिर्फ दिखावे से प्यार करता है
और कोई अपने ज़मीर से
पर ये तो सच है
हर एक इंसान
इस जीवन के कुरुक्षेत्र में
युद्धरत है !!


रेवा

Saturday, February 3, 2018

डर




मन में एक अजीब सी 
हलचल 
रस्सा कसी मची हुई है
कभी अजीब सा
अनदेखा अनजाना डर
कभी बेहिसाब प्यार
इतना की तुम्हें
आंखों से ओझल ही
न होने दूं
जानती नहीं ऐसा क्यों है ??
पर लगता है
तुमसे दूर जाने का डर
तुम्हें खोने का डर हावी
हो रहा है
हर जीवन साथी की तरह
हमने भी साथ लम्बा
सफ़र तय करने की
कसम खायी है
पर अगर बीच रास्ते
किसी ने धोखा दे दिया तो
या अपना रास्ता बदल
लिया तो क्या ??
जवाब तो नहीं किसी
के पास भी इन सवालों का
बस एक विश्वाश की डोर
जरूर है
जो होती तो मज़बूत है
पर कभी कभी
कुछ हादसे कमज़ोर
बना देते हैं !!

रेवा


Wednesday, January 31, 2018

चिड़ियाँ

मेरे आंगन के कोने में
एक बहुत प्यारी छोटी
कोमल सी चिड़ियाँ ने
घोंसला बनाया था
मैं जब भी आंगन में बैठती
वो फ़ुर्र उड़ कर आ जाती
फुदकती रहती और
अपनी ची ची
से मन मोह लेती
पूरा घर उसकी
हरकतों से ज़िन्दगी
से भर जाता 

पर ये पता न था की
कोई और भी नज़र
रखे हुए है इन सब पर
एक दिन मेरी बैठे बैठे
आँख लग गयी
तभी एक कौवा आया
चिड़ियाँ को मुंह में दबाने की
कोशिश करने लगा
उसकी दर्द भरी आवाज़ से
मेरी तंद्रा भंग हुई
किसी तरह चिड़ियाँ को बचाया
उसके घाव पर मरहम लगाया
पर वो डरी सहमी उड़ना कम
कर दिया
मेरे आस पास ही फुदकती थी
लगा उसे उठा कर पिंजरे में
डाल दूं, ताकि वो सुरक्षित रहे
पर ऐसा नही किया
उसके पंख, पंजो
और चोंच को फिर से
मजबूत करना शुरू किया
उसे हाथ में उठा उड़ा देती
धीरे धीरे उसने
डरना छोड़ दिया
अब वो उन्मुक्त हो
उड़ती है आकाश में
बिना रुके बिना थके
बिना डरे ....

रेवा