Followers

Thursday, September 20, 2018

कान्हा



वो जो मेरा कान्हा है न
वो बादलों के बीच
कहीं जा बैठा है
कोई सीढ़ी उस तक
अगर जाती तो मैं रोज़
पहुँच जाती

लेकिन आज एक पगडंडी
नज़र आयी है
जब आँखें बंद कर
उसके सामने बैठती हूँ न
तो वो आता है मुझसे मिलने
मुस्कुराता है अपने
अंदाज़ में और फिर
झट जा कर छिप
जाता है बादलों की
ओट में

उसकी इसी मनोहारी
रूप को देखने मैं हर
सुबह शाम उसके
सामने जा बैठती हूँ
अपनी श्रद्धा का
अलख जगाये
और तृप्त हो जाती हूँ
उसका दर्शन पा कर.....

#रेवा 
#कान्हा 



Monday, September 17, 2018

एहसासों का ख़त


भेजा था मैंने
यादों के डाकिये
के साथ तुझे
अपने एहसासों का ख़त
पर वो बैरंग
वापस आ गया ,

यादों ने बहुत ढूंढा
हर गली हर
शहर तलाश किया
पर वो पता जो
उस ख़त पर लिखा था
वो नहीं मिला ,

लगता है तुमने अपना
घर बदल लिया है ..
पर मैं तो वहीं हूँ उसी
पुराने घर, पुराने पते पर
बदलना मेरी फितरत नहीं 
ये तो जानते ही हो न तुम 

पर लगता है 
याद रखना तुम्हारी भी
आदत नहीं
ये भी अब जान गई हूँ मैं

लेकिन कोई बात नहीं 
मेरे एहसास जो तुमसे जुड़े हैं 
उन्हें सहेज कर रख लिया है 
जो मुझे सुकून देते रहेंगे 
पर तुम अब ताउम्र 
इस सुकून से महरूम रहोगे !!!!






Sunday, September 16, 2018

हरे जिल्द वाली किताब



आज पुरानी संदूक खोली
तो हाथ आया
तुम्हारा दिया हुआ
पहला और आखरी
उपहार .....
वो हरे जिल्द वाली किताब
तुम्हें पता था न
मुझे किताबें बहुत पसंद है
तभी मुझे हैरान करने
डाक से भेजा था,

लिफाफा खोलते वक्त
ये नहीं लगा था
इसमे मेरी ज़िन्दगी
कैद है  ....
मैं बार-बार किताब
खोलती थी पढ़ने
पर हर बार
अटक जाती थी
अपने नाम पर,

वो नाम
जो तुमने रखा था
उसे छूती
उसे देख मुस्कुरा कर
सुर्ख हो जाती
और फिर किताब
बंद कर रख देती ,

घंटों ख्यालों में
खोयी रहती
जाने ऐसा क्या था
उस नाम में ??
वो नाम जो तुमने
अपने हाथों से लिखा था
और उसे छु कर
तुम्हारा प्यार
तुम्हारे हाथों का स्पर्श
तुम्हारे उँगलियों की नमी
पहुँच जाती थी
मुझ तक
जो मेरा न होकर भी
मेरा है  !!!

#रेवा
#किताब





Friday, September 14, 2018

मत जाया करो न




जानते हो
जब मैं
मायके जाती थी
तो लौटते समय
अक्सर ट्रेन में
गुलज़ार का लिखा ये गीत
गुनगुनाती थी
"दिल ढूँढता है फिर वही
फुर्सत के रात दिन  ......

उस समय ऐसा
लगता था
जैसे समय
बहुत धीरे
चल रहा है ?
ट्रेन की रफ़्तार
मद्धिम हो गयी है

तुम्हें देखने की तड़प
बढ़ने लगती
मन होता था दौड़ कर
तुम्हारे पास आ जाऊं
तुम्हारे सीने में सर छूपा कर
विरह में बिताये सारे दिन
एक ही पल में जी लूं

ये सोच कर मैं
हौले हौले मुस्कुराने
लगती
और मन ही मन
तुम्हें प्यार भरा पत्र
लिख डालती

जब घर आती तो
लगता की तुमने
हर्फ़ दर हर्फ़
मेरी सूरत में
वो सब पढ़ लिया
जो मैंने लिखा था
और तुम मुझे
अपने आगोश में
भर कर कहते
"मत जाया करो न "

मज़े की बात है
यही सुनने और
इस दूरी से
मिले प्यार को
बढ़ाने
मैं हर बार
चली जाती थी....

#रेवा






Wednesday, September 12, 2018

अंतर का दीया




मेरे अंतर में 
एक दीया सदा
प्रजवलित रहता है
जो मुझे हर ग़लती
में आगाह करता है

जो मेरी नकारत्मकता को
सकारात्मक ऊर्जा में
बदलता है

जो मेरे अंदर
मानवता की लौ को
किसी हाल में बुझने
नहीं देता

उस दीये की लौ की
ऊष्मा से मेरे सारे
दर्द वाश्प बन
उड़ जाते है

ये मुझे मेरी काया को
पढ़ने में मदद करता है 
और  मुझे प्यार की
खुश्बू से ओत प्रोत
रखता है

ये मेरे अंतर का दीया
मेरी काया का प्राण स्रोत है
जिस दिन ये काया मिट्टी
हो जाएगी 
उस दिन ये दीया
साईं तेरे दर पर जलेगा

#रेवा 
#अंतर का दिया 




Monday, September 10, 2018

मक़बरा


वो जीता है सालों से 
उसकी तस्वीरों
उसके ख्यालों और
अपने रंगों के साथ 

उसके लिए 
वो अभी भी इस 
दुनिया का हिस्सा है 

उसकी अलमारी 
उसकी किताबें 
उसकी तस्वीर 
सब जिंदा है 

वो दीवारों से भी 
उसकी बातें 
कर लिया करता है 

कमरे में अब भी 
उसकी खुश्बू 
मौज़ूद है
जो उसे रूहे सुखन
देती है 

वो घर उसकी यादों
का मक़बरा नहीं है 
जैसा की लोग 
कहते हैं
बल्कि उन दोनों
के प्यार का घोंसला है ....

#रेवा 
#इमरोज़ 
##अमृता के बाद की नज़्म 

Friday, September 7, 2018

देह की नौका



मैं अपनी देह को
बना कर नौका
जीवन रूपी
इस समुद्र को पार
करती हूँ
रास्ते में
आये तूफान को
झेलते हुए
लहरों के थपेड़ों से जूझती
और मजबूत बन जाती हूँ
कई बार
लपलपाती जीभ लिए
मगरमच्छों से भी
सामना हो जाता है मेरा
पर मैं टूटती नहीं हूँ
हारती नहीं हूँ
लड़ती हूं
लहूलहान करती हूँ
मारती हूं
और आगे बढ़ जाती हूँ
बीच में कई घाट भी आते हैं
जिनपर मैं ठहरती हूँ
विश्राम करती हूँ
और फिर निकल पड़ती हूँ
अपने लक्ष्य की ओर
लक्ष्य है
इस जीवन को जीना
और फिर
माटी में मिल जाना
जिस दिन उस माटी का
दीपक बन जलूँगी मैं
अपने उस कान्हा के सामने
समझ लूंगी मैं
मेरा जीवन सार्थक हुआ
सार्थक हुआ।
#रेवा
#देह

Wednesday, September 5, 2018

दोस्ती


जाने कैसे 
जाने कब
जाने क्यों
उसने मेरा मन
पढ़ लिया 

एक एक कर
मेरे मन की
सारी गिरहें
खोल कर रख दी
मेरे सामने 

आश्चर्य तो हुआ
खुशी भी हुई की
मेरे दोस्त
कितना समझते
हैं मुझे
पर एक बारगी 
दोस्त के प्यार से 
आँखें नम हो गयी...

#रेवा
#दोस्ती 

Monday, September 3, 2018

गंगा के किनारे


गंगा किनारे मैं बैठी थी 
चुप चाप
संवेदना शून्य सी
जब ठंडी हवाएं
मेरे बालों को हौले
से सहला रही थी तो
मुझे सिहरन नही
हो रही थी,

न ही जब
एक पत्ता मेरे
गालों को चूम कर
गिरा तो मेरे गाल
सुर्ख़ हुए ....

न ही जब
खुद के ही कांधे
पर खुद सर टिकाए
चुप चाप बैठी रही
तो कुछ महसूस हुआ ,

जब सिमटने का मन
हुआ तो अपने ही
हाथों के बीच
अपने चेहरे को ढक लिया ...


ये सब मैं इसलिए 
कह रही हूँ 
क्योंकि 
बदनसीब मैं नहीं
तुम हो जिसकी
मुझे ऐसे जगह
इतने सुहाने समय में भी
याद न आई ।

#रेवा

Sunday, September 2, 2018

पूर्ण और अपूर्ण


इस दुनिया में
ढूंढ़ने .. निकली तो 
पाया हर चीज़ अपूर्ण है
पूर्ण कुछ भी नहीं...

प्रेम कभी तृप्त नहीं होता
अतृप्त ही रहता है
ज्यादा कि मांग
कभी खत्म नहीं होती ,
न ही विरह
उसमें सदा
मिलन की आस होती है ,

साधक की साधना भी
अपूर्ण है
वो जीवन से दूर भागता है ,
प्रकृति भी पूर्ण नहीं तभी तो
कृत्रिम चीजों का
सहारा लेते हैं हम,

फूल उनकी
कोमलता और सुगंध
क्षणिक है ,
कोयल का संगीत
कलरव है
भाषा न होने के कारण
भावहीन संगीत जैसा,

कपोत कितने
अच्छे लगते हैं न
पर ये और अन्य पक्षी
भोजन के लिए
झगड़ते हैं
यहां तक कि
एक दूजे को खा
लेते हैं और
बड़े पक्षियों से
सदा डरे हुए से रहते हैं,
पूर्णता की तलाश
कभी पूरी नहीं होती 

अपनी परिस्थितियों के
अनुसार जीवन निर्वाह
करना ही ज़िन्दगी है
तो बस जीवन जीयो
पूर्ण होने की लालसा के बिना ....

चित्रलेखा पढ़ते हुए मिले ज्ञान के आधार पर

#रेवा
#चित्रलेखा

Saturday, September 1, 2018

इमरोज़


इमरोज़ की 
तरह होना
नामुमकिन है

लफ़्ज़ों को
रंगों में घोल
यूँ इश्क की
चित्रकारी करना
नामुमकिन है

अपने इश्क को
किसी और के इश्क
में खोए देखकर भी
उससे इश्क करना
नामुमकिन है

अपनी पीठ पर हर रोज़
किसी और का नाम
लिखा जाना
फिर भी हंसते हंसते
रास्ता तय करना
नामुमकिन है

यूँ सालों किसी की
यादों के सहारे
उसके एक एक
सामान को
सहेज कर रखना
नामुमकिन है

इमरोज़ बनना
नामुमकिन है
पर इश्क करना
मुमकिन है 

#रेवा
#अमृता के बाद की नज़्म

Wednesday, August 29, 2018

बारिश की बूँदें (2)



बारिश की बूँदें
प्रकृति का सौन्दर्य
दोगुना कर देती है
सबका मन हर्षो उल्लास से
भर देती है ,
प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए
तो ये बूँदें  मानो
वरदान हो ,
पर यही बूँदें
मेरे मन को शीतल
करने की बजाय
अग्न क्यों पैदा
कर रही है ??
हर एक गिरती
बूंद के साथ
मन और भारी क्यों हो रहा है ??
क्यों पंछियों की तरह
मैं भी खुश हो कर
दूर गगन में
नहीं उड़ पा रही ,
वो भी तो अकेले
ही होते हैं हमेशा 
फिर मैं क्यों नहीं ?
क्यों बरसात मुझे
किसी के साथ और
प्यार की जरूरत महसूस
कराता है ?

"ये आकाश से गिरते बूँदें हैं
 या मेरी आँखों के अश्क़
 ये आकाश प्यार बरसा रहा है
 या मेरा मन अपनी व्यथा "

रेवा

Tuesday, August 28, 2018

पक्की सखी (अमृता)


जब कभी
मन बेचैन हो उठता है
और दिल बोझिल
सा हो जाता है
तब मैं अपने दोस्त
कलम और कागज़
के पास आती हूँ
पर जाने क्यों
कभी कभी लफ्ज़
मुझसे दुश्मनों सा
व्यवहार करते हैं

तब कुछ सूझता नहीं
पर ऐसे समय
हर बार मेरी पक्की
सखी अमृता
आ जाती हैं मेरे पास ,
मैं पढ़ने लगती हूँ
उनकी नज़्म
जाने क्यों उनका लिखा
पढ़ते पढ़ते
मेरा रोम रोम सिहर
उठता है
आँखों से बरसात
होने लगती है

ऐसा प्रतीत होता है जैसे
मैं उन्हे सुन पा रही हूँ
उनकी आँखों में वो
प्यार देख पा रही हूँ
लगता है जैसे
उनका इश्क
शब्दों में ढल कर
मेरी रूह तक पहुँच
रहा है .....

मैं ख़ुद को सकारात्मक
ऊर्जा से भरा हुआ
महसूस करती हूँ
और पता है
जब जब मेरी
उनसे ऐसी मुलाकात
होती है न
तब तब मैं
ख़ुद को उनके और
करीब पाती हूँ......

#रेवा
#अमृता के बाद की नज़्म



Monday, August 27, 2018

राखी (लघु कथा )


आज राखी है मुन्नी ने बोला  " भइया इस बार गुड़िया लूँगी ......पिछली बार भी आपने बहला फुसला कर कुछ न दिया था मुझे " गणेश बोला इस बार पक्का और मुस्कुरा दिया , उसने फूल बेच कर रुपये जो जोड़ रखे थे।

लेकिन सुबह मुन्नी को अचानक बुखार आ गया, डॉक्टर और दवा के चक्कर मे सारे पैसे चले गए.......  फिर भी उसने हार न मानी फिर से फूल बेचने निकल पड़ा, उसे विश्वास था की शाम होते तक उसके सारे फूल बिक जाएंगे। और वो मुन्नी को प्यारी सी गुड़िया देगा।

पर अचानक उनके कसबे में अफरा तफरी मच गयी ....सरकार के किसी बात का विरोध करने कुछ पार्टी के लोगो निकल पड़े थे सड़कों पर … अब फूल बिकेंगे नहीं तो  वो मुन्नी की इच्छा कैसे पूरी कर पाएगा वो सोचने लगा .... हताशा से आँखें भींग गयी …पर वादा किया था बहन से .....कुछ तो करना ही था, आखिर उसने एक जुगत लगायी .....गीली मिट्टी से गुड़िया बना कर उसे सुखाया और सजा धजा कर रख लिया ......राखी बंधने के बाद जब उसने गुड़िया मुन्नी को दी तो उसकी आँखों की चमक देख कर गणेश को लगा आज उसकी राखी सार्थक हो गयी।

#रेवा


Saturday, August 25, 2018

इंसान


उदासी ओढ़ कर
आँसू बिछा कर
बैठ जाना तो बहुत
आसान काम है
हर कोई कर सकता है

पर जब हमने 
इंसान बन कर 
जन्म लिया है तो फिर
सोचना, समझना
हर परिस्थिति का
सामना करना
इन सब से तो हमारी
पक्की यारी होनी ही है 

खुशी देने के लिए ही तो 
बनाया है न ईश्वर ने
चाँद तारे
फूल ओस
तितली पंछी
बरसात हवा
इन्हें महसूस करो
और मस्ती से भर जाओ

तो चलो
उदासी को समेट कर
रख दो ऐसी जगह
जहां से वो दिखे ही न
और आंसुओं को
खुशी से वाश्प
बना उड़ा दो
और लग जाओ
जीवन को जीने में


#रेवा 
#जीवन 

Friday, August 24, 2018

ओस की बूंद


आज पढ़िए मेरी एक पसंदीदा पुरानी रचना

ओस की बूंद सी है
मेरी ज़िन्दगी
सिमटी सकुची
खुद में 
अकेले तन्हा
पत्ते की गोद
पर बैठी ,
सूर्य की
किरणों के साथ 
चमकती, दमकती,
इठलाती 
मन में कई
आशाएं जगाती,
हवा के थपेड़ो को
झेलती, सहती 
फिर उसी मिट्टी में
विलीन हो जाने को
आतुर रहती ....
ओस की बूंद सी है
मेरी ज़िन्दगी.......

रेवा

Thursday, August 23, 2018

I hate you


हर बार
बार बार
यही तो कहना
चाहा की
मुझे तुमसे
कितना प्यार है......

पर जब कहने की
बारी आती है
तो हर बार
यही कहती हूँ
"I hate you "
बहुत गंदे हो तुम !!!

जाने क्यों ये कह
कर लगता है
मैंने सब कह दिया
और तुम सब समझ गए  !!

समझ जाते हो न ???
इसलिए तो लगता है
बोलो कुछ भी
और कैसे भी
प्यार की जुबां को
समझना इतना भी
मुश्किल नहीं है
है न !!!

#रेवा
#प्यार 

Wednesday, August 22, 2018

एकाकार का आभास



जानती हूँ मैं
मेरे दिल 
तुमने जीया है
असीम प्यार
एकाकार का आभास

हर पल में पाया है
सदियों सा एहसास
दिल की धड़कन से लेकर
सांसों की तड़पन
तक को महसूसने वाला प्यार

बिन छुए
हृदय को स्पंदित करने वाला
एहसास
साँसों के उतार चढ़ाव से
मन का हाल जानने वाला
दुनिया से मिलाने वाला
ख़ुद की पहचान करवाने वाला
कड़वी यादों को
मीठी यादों से भरने वाला 

कभी बच्चों सा ज़िद्दी
कभी शिक्षक सा कड़क
होकर समझाने वाला

मैं जानती हूं मेरे दिल .....
फ़रिश्ते जैसे इस इंसान
को न पा कर भी
पाने जैसा है
और बिन साथ जीये भी
ताउम्र साथ रहने जैसा है !!!!


#रेवा 

Monday, August 20, 2018

मैं स्त्री हूँ





हां मैं स्त्री हूँ
लेकिन कमज़ोर
बिल्कुल नहीं ...
और साथ साथ ये भी बता दूं
मैं भी इंसान हूँ

मुझ में संवेदनाएं हैं 
अपनों से जुड़ी 
परिस्थियाँ मुझे
विचलित करती हैं
और तब मैं भावनाओं 
में बह कर कमज़ोर
पड़ जाती हूँ

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब बात आती है
मेरे बच्चों की
जब बात आती है
उनके भविष्य की

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं चाहती हूं हर
कीमत पर अपने घर की
सुख और शांति

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब देखती हूँ
पति का चिंतित लटका
हुआ चेहरा
उनकी बिगड़ती सेहत

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं देखना चाहती हूं
अपने घर के सदस्यों
के चेहरे पर खुशी और सुकून
और ये सब इसलिए की
मैं इन सब से बेइंतहा प्यार
करती हूं 

लेकिन ये भी बता दूं
मुझे कभी 
टेकन फ़ॉर ग्रांटेड मत लेना 
क्योंकि स्त्री तो हूँ पर 
कमज़ोर न बिलकुल नहीं ....... 


#रेवा 
#स्त्री 

Sunday, August 19, 2018

सवाल (लघु कथा )




कमला  दोपहर होते तक, घर का काम करते करते थोड़ा सा थक जाती थी,  ४३ की हो गयी है, यूँ तो उम्र के इस पड़ाव तक आते आते लोग सेटल हो जाते हैं। पर ऐसा कमला के साथ नहीं था......अभी अपना घर भी नहीं ले पायी थी ……अभी तो बुक करवाया है …लोन ले कर उसकी किश्ते चुकाती थी हर महीने  ……महीने के अंत तक हाथ एकदम खाली, पति को क्या बोले जानती वो खुद भी थी की कुछ बचता नहीं।
बेटे का अब १२ पूरा हो गया अब उसके आगे की पढ़ाई के लिए पैसों का जुगाड़ करना था, बेटे को लैपटॉप फ़ोन दोनों चाहिये था, बेटी भी १० में आ गयी अब फ़ोन उसे भी चाहिये।
उधर नन्द की बेटी की शादी होने वाली है, भाई को भात भरने की रस्म करनी होती है, उसके लिए भी मोटी रकम चाहिये।
अपने लिए तो कभी कुछ सोच ही नहीं पाती कमला, उसका भी मन करता कभी अपने लिए कुछ साड़ी ले ले , पर आजकल कपड़े गहने के दाम मे मिलने लगे हैं। बच्चों के साथ बाजार जाती, काफी चीज़ों पर मन चलता पर फिर लगता बच्चों को ज्यादा ज़रुरी है सामान दिलवाना, वो तो कैसे भी चला लेगी, मन मसोस कर रह जाती। सारे महीने बस दूसरे महीने के हिसाब में निकल जाते।
आज यही सब उसके दिमाग मे घूम रहा था की अचानक हँस पड़ी, इस बात पर की "लोग कहते हैं ४० के बाद जिम्मेदारी कम हो जाती है, अपनी ज़िन्दगी एन्जॉय कर सकते हैं, अपने मन की कर सकते हैं, पर क्या आम मिडिल क्लास गृहणी ऐसा कर सकती है  ???

#रेवा


Saturday, August 18, 2018

कामवाली बाई (लघु कथा )





ललिता रोज़ काम पर आती और बड़ बड़ करती रहती.......

"छोड़ देब अपन मरद के, अब न रही ओकरे साथ .... सगरा दिन पी कर पड़ल रहत है "
घर घर काम करके ४ बचवन के बड़ा कईली , पर ओकरा ओही ढंग ढाचा बा ......
बस "बड़का बिटवा कामये खाए लगे, फेर चल जाब इ घर दुआर छोड़ के  "
इस बात को चार महीने हो गए बेटे को नौकरी भी मिल गयी।

पर आज फिर रोते रोते आई "बीबी जी कुछो पेइसा एडवांस दे दो , मरद का सर फट गवा "
मैंने बोला "बेटे से क्यों नहीं लेती ?? " अब तो कमाने लगा है।

बोली "का करे बीबीजी बेटा भी बाप के जेइसन पी कर घर आवत है ...... हम के अउर बिटिया के मारत है "
हमरी किस्मत में कहाँ सुख ??
फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा "आप हे सही बोलत रहे "
हम अपनी बिटिया को अइसन नरक म नाही देब ..... अउर ३ - ४ घर काम पकड़ लेब  ...पर ओकरा  खूब पढ़ा लिखा कर अच्छा घर मा बियाह करब।

उसका चेहरा दुःख में भी इस निश्चय के साथ चमकने लगा ,और मुझे अपार ख़ुशी हुई की कम से कम एक लड़की की ज़िन्दगी में मैं कुछ अंतर ला पाई ।

#रेवा  

Friday, August 17, 2018

धूप और बरसात का मिलन




जानते हो
आज इस बरसात
और धूप के
खेल में
Fm में बजते
पुराने गानों के बीच
तुम्हारी बहुत
याद आ रही है ...

चारों तरफ हर
कुछ बहुत सुहाना है......
मौसम, गानें
और तुम्हारी याद ....

तो ऐसे में मुझे
खुश होना चाहिए.....
फिर भी मन उदास
सा क्यों हो रहा है  ??

तन्हाई नहीं
अकेलापन महसूस
हो रहा है
वो भी शिद्दत से

मैं खुद को समझ
नहीं पा रही की
आखिर क्या चाहिए मुझे ??
और ये आंखें
ये आंखें क्यों भीग
रही हैं बार बार  ???

सुनो
तुम तो सब जानते हो न
क्या तुम मेरी इस दशा को
समझ 
मुझे समझा सकते हो
बोलो, बोलो न .....

जानती हूं
तुम कुछ न बोलोगे
क्योंकी तुम जानते हो
धूप और बरसात
कुछ क्षण साथ रहते हैं
पर मिल कभी नहीं पाते ...

#रेवा

Thursday, August 16, 2018

क्षणिकाएं



बरसात पर कुछ क्षणिकाएं 

१. एहसासों की बरसात तो बहुत हुई 
    पर दिल आजकल कंक्रीट का जंगल 
    हो गया है 
    बिना जज़्ब हुए बह जाते हैं एहसास......

२. बड़ी मुश्किल से तन्हाई में
    खुश रहना सीखा था मैंने
    तेरी यादों की बरसात ने
    मेरी तमाम कोशिशों को
    बूँद बूँद कर बहा दिया.....

३.  गीले बरसात ने
    आज फिर ताज़ा कर दी
    सीली यादों को  
    उन्हें तुम बेरुखी की तपिश
    से बचाये रखना....


४. बादल जब धरती पर बरस जाते हैं तो
    आसमान बिलकुल साफ़ हो जाता है
    बस ऐसे ही मैं तुम्हारे काँधे पर 
    सर टिका कर बरसना चाहती हूँ......

५. इतनी बरसात के बावजूद
   जल की मछली
   जल में है प्यासी.....

#रेवा
#बरसात





Wednesday, August 15, 2018

कोशिश (जय हिन्द )


झगड़े किस घर
में नहीं होते  ?
ग़लतफ़हमी ग़लतियाँ
आम बात है.......
तो क्या हम घर से
मुंह मोड़ लेते हैं ?
घर के मुखिया को
बुरा भला कह कर
उसको उसके हाल पर
छोड़ देते हैं ??

जब हम ये अपने घर
के साथ नहीं करते तो
अपने देश के साथ
कैसे कर सकते हैं ??
दोष देना
बुरा भला कहना
बहुत आसान है
पर सुधारने की
कोशिश करना
थोड़ा मुश्किल ज़रुर है
नामुमकिन नहीं
कम से कम हम
अपने अपने स्तर पर
शुरुआत तो कर ही सकते हैं

बहुत कुछ
गलत हो रहा है देश में
मैं मानती हूँ
पर सरहद पर देश की
रक्षा करने वाले
देश के लिए मरने वाले
सैनिक तो गलत नहीं है,
उनके लिए
अपने इस प्यारे घर के लिए
आइये हम सब मिल कर
अपने देश को बेहतर
हिंदुस्तान बनाने की
पुरज़ोर कोशिश करें....


जय हिन्द !!!

#रेवा
#देश



Tuesday, August 14, 2018

यादें




जानते हो 
आज मैंने
हमारे यादों को
जीने की एक
कोशिश की है

उसी पुराने 
बस में बैठी 
सीट भी वही 
मिल गई जहां
हम अक्सर बैठा करते थे
जानती हूँ .....
वो बस बहुत लंबा
रूट लेती है 
पार्क तक
पहुंचाने में
लेकिन आज भी 
वो रास्ता
तय करना
मुश्किल नहीं लगा.....

मैं अपनी कविता 
ख़ुद को ही सुनाती रही
एक पल......
ऐसा लगा मानो तुम
बगल में बैठे
मग्न हो सुन रहे हो,,,,,

बस से उतर कर
पार्क के उसी बेंच
पर बैठी तो ....
अनायास ही एक
हिचकी आयी और
दो बूंद ओस 
छलक आये
पलकों पर...... 

सर टिका लिया बेंच से
लगा जैसे तुम्हारे कांधे
पर सर रखा हो
तभी मोबाइल पर fm
सुनाने लगा
वही पुराना गीत
"जो तुम याद आये बहुत याद आये "

सब वैसे का वैसा ही
तो है
अंतर बस इतना सा है
पहले तुम बगल में
हुआ करते थे
अब मेरे अंदर रहते हो .....


#रेवा
#याद

Monday, August 13, 2018

लिफ़ाफे में भरा एहसास




ऐसी बातें क्यूँ
करते हो मुझसे
किसने कहा था
इतना प्यार जताने को
देखो ...
रुला दिया न मुझे

कभी सोचती हूँ
अगर तुम न मिले होते
तो मैं क्या करती
किताबों में पढ़े
एक लफ्ज़ "इश्क"
को कैसे महसूस करती
सुनो !!
तुम ताउम्र ऐसे ही
रहोगे न ....

बदल तो न जाओगे
अगर इरादा हो तो
बस एक काम करना
एक कागज पर
प्यार लिख देना और
लिफ़ाफ़े में एहसास भर कर
मुझे भेज देना......
जब याद आएगी तुम्हारी
तो लिफ़ाफे को खोल कर
थोड़ा सा एहसास
महसूस कर लूंगी......
और तुम्हारे हाथों से लिखा
प्यार पढ़ लूंगी
बोलो
करोगे न ऐसा !!!!


#रेवा
#इश्क 

Sunday, August 12, 2018

गज़ल







आज पढ़ें मेरे आदरणीय मित्र Anil Kumar जी की गज़ल


तुमको जो खत लिखे थे मैंने तुमसे ही सब पढ़वाने हैं सपने मेरी आंखों के हैं तुमने मुझ को समझाने हैं तेरे मेरे दोनों के ही सारे हिस्से जल जाने हैं तुमने ही जब आग पहन ली हम भी तेरे परवाने हैं तेरे बारे में दोनों ने अलग अलग कुछ सोचा है कब तूने खुद को चांद है माना हम भी तेरे दीवाने हैं आकर बोले ख्वाबों से अब दोनों आँखें खाली कर लो इस अलमारी में हमको अब थोड़े आंसू रखवाने हैं गजलें बेचो ख़्वाब भी बेचो पूरी दौलत लेकर आओ घर तो माना बनवा दोगे ताजमहल भी बनवाने हैं दिल में आने से पहले तुम दिल मेरा क्यों धड़काते हो आप अभी तक बेगाने हैं ? दरवाजे क्यों खटकाने हैं?

Saturday, August 11, 2018

नहीं लिखना चाहती



मैं कवयित्री हूँ !
पर नहीं लिखना चाहती
शोक गीत
नहीं लिखना चाहती
राजनीति के दाँव पेंच
नहीं लिखना चाहती
बच्चियों के साथ अत्याचार
नहीं लिखना चाहती
मिड डे मील से होती मौत
क्योंकि नहीं भर सकती
अपने बच्चों के
फेफड़ों में भय 

नहीं लिख सकती
किसान की भूख और
पेड़ों से लटके शव
नहीं लिखना चाहती
सैनिकों के रोते बच्चे
नहीं लिखना चाहती
त्रस्त आम नागरिक

लिखना चाहती हूं
मेरा खुशहाल भारत
मेरा भारत महान
लिखना चाहती हूं
भाई-भाई
हिन्दू मुसलमान
सारे जहाँ से अच्छा
हमारा हिन्दुस्तान
पर लिख नहीं पाती

समाज के हर कोने से सुनते ही
अजगर निकल आयेगा
मेरी सोच और कलम को मेरे साथ
निगल जायेगा, निगल जायेगा।


#रेवा 
#भारत 

Friday, August 10, 2018

कोई बात नहीं


मैं बड़ी बड़ी बातें 
सोच ही लेती हूँ
मसलन
फर्क नहीं पड़ता मुझे
किसी भी बात से
कोई तारीफ़ करे तो
अच्छा न करे तो
कोई बात नहीं,
कोई दोस्त की तरह
हाथ थाम राह दिखाये
तो ठीक नहीं तो
कोई बात नहीं ,
मैं करती रहूँ कोशिशें
पर वो नज़र अंदाज़ की जाए
तो कोई बात नहीं ,
मैं बेरुखी देखती रहूँ
पर कहती रहूँ की
कमी मुझ में ही है
कोई बात नहीं ,
जिससे करूँ प्यार
वो प्यार होते हुए भी
न जताए
तो भी कोई बात नहीं,

पर असलियत तो ये है
इंसान हूँ मैं भी
चुभती हैं बातें
नजरअंदाजी दुख
दे जाती है
बेरुखी तोड़ देती है
विरह का एहसास
तड़पा देता है
पर ख़ुद को सहनशक्ति की
मिसाल दिखाते हुए
ख़ुद से भी झूठ बोलती रहती हूँ
और कहती रहती हूँ
कोई बात नहीं  ......

#रेवा
#मैं 

Thursday, August 9, 2018

आकाश की तड़प



आकाश की तड़प
आज समझ आई ...

जब आसमान
तड़पता है
प्यार के लिए
तो धड़कने
बढ़ जाती हैं उसकी
और वो बादल बन
गरजने लगता है
सांसें तेज़ हवाओं सी
चलने लगती हैं
दिल की टीस
बिजली बन
कड़कने लगती है
पर जब उसकी ये
पुकार भी
कोई नहीं सुनता
तो आँसू बन कर
बरस पड़ते हैं ये बादल।

रेवा



Wednesday, August 8, 2018

दीदी


ये सिर्फ संबोधन
नहीं प्यार है

दीदी तुम माँ तो नहीं
पर उससे कम भी नहीं
जानती हूँ
मेरे दुःख में 
तुम्हारी आँखें भी भर
आती है
तुम्हें लगता है
तुम ऐसा क्या कर दो
कि मैं दुखी न रहूँ

और मेरी ख़ुशी में भी तुम
हमेशा खुश हो जाती हो
जाने तुम इतनी अच्छी
कैसे हो लेती हो हर बार
लगातार .......

तुम्हारे पिटारे में सिर्फ
प्यार नहीं सलाह और
हर परेशानी का हल
भी होता है
वो भी टोकरी भर के......
हर सलाह इस विश्वास
से देती हो की
अगर मैं मान लूँ तो
सारी तकलीफ़ दूर
तुम्हारा इसमे
स्वार्थ भी होता है
और वो है मेरा सुख

बचपन से लेकर
आज तक
बस तुमने दिया है
कभी कुछ लेने की
चाह नहीं की
एक बात बताना तुम किस
मिट्टी की बनी हो ??

मिट्टी चाहे जो हो
जिस कुम्हार ने
तुम्हें गढ़ा है
उसने पानी की जगह
प्यार मिलाया है
जानती हो तुम्हारे बिना
मैं अपनी ज़िन्दगी
सोच भी नहीं सकती

दीदी तुम माँ तो नहीं
पर उससे कम भी नहीं ..........

#रेवा





Tuesday, August 7, 2018

इन्वेस्टमेंट


ऐसा नहीं की
इन बीतते सालों में
तुम बिल्कुल नहीं बदले
बदले तो हो
पर मुश्किल ये है की
तुम मुझे
समझ नहीं पाते ,

चलो न समझो
पर ये तो जानो की
मुझे क्या पसंद है
क्या नापसंद
मैं जानती हूं न  ....
तुम्हरी पसंद नपसंद
तो तुम क्यों नहीं ? ?
क्या बहुत मुश्किल है ये ??
अगर है तो बोलो पूछो
मैं सब बताउंगी ....

हंसी आती है
मुझे कभी कभी !!
जब तुम
मुझे अच्छा
लगाने के लिए
ऐसी हरकत करते हो
जिसका उस समय
कोई मतलब नहीं
निकलता
उसकी बजाय
थोड़ा सा प्यार ही जता दो
चाहे जो भी स्थिति हो
मुझे ख़ुशी मिल जाएगी 

वैसे जानते हो
ज्यादा भारी भरकम 
ख्वाहिशें नहीं है मेरी
प्यार और ख्याल बस
इन दो से उम्र भर खुश रहूंगी मैं
मज़े की बात है की
इसमे कुछ खर्च नहीं होता
बल्कि इस इन्वेस्टमेंट में
रिटर्न्स डबल होते हैं जनाब !!!


#रेवा
#तुम 

Monday, August 6, 2018

बेटे के नाम पत्र



मेरे बच्चे .....

तुम नौजवान हो गए हो अब तो ... पर हरकत अब भी बचपन वाली करते हो।
हर बार तुम गर्मी की छुट्टियों में कॉलेज से घर आते हो , तो घर भरा भरा सा लगता है, लगता है मेरा घर पूरा हो गया ....हम सब मिल कर घूमते हैं, खाते हैं शौपिंग करते हैं, खूब सारी बातें करते हैं...बहुत सारे ज़रुरी पड़े हुए घर के काम भी करते हैं। तुम्हारी खूब खिचाई भी करते हैं

और इन सब के साथ साथ ही हर बार तुम्हें ढेर सारी डांट का भी सामना करना पड़ता है।
वैसे मैं मानती हूँ की तुम बहुत समझदार हो गए हो !
पर फिर भी मैं समझाती  हूँ ...टोकती भी हूँ .....और  डांटती भी हूँ,  चाहे तुम सिर्फ कुछ दिन ही हमारे पास आते हो  ....

वो इसलिए की हम तुम्हें एक काबिल इन्सान बनता हुआ देखना चाहते हैं  ....जानती हूँ डांट सुनकर तुम्हें बहुत गुस्सा आता है। बोलते भी हो की  "सब ठीक करता तो हूँ फिर भी डांट " उफ्फ्फ

गुस्से में तुम थोड़े चुप से भी हो जाते हो ....... पर ये मुझे बर्दाश्त है क्योंकि मैं तुम मे जो कमियाँ देखती हूँ  और बोलती हूँ वो कोई और नहीं बोल सकता और यही सारी बातें तुम्हें ज़िन्दगी में आगे जाने में मदद करेंगी .... अगर इन सब बातों से तुम्हारा भविष्य निर्माण होता है , तो पूरी उम्र मैं ये करने को तैयार हूँ।

तुम्हारे जाने के बाद घर खाली सा हो जाता है .....रसोई में भी बर्तन झगड़ना कम कर देते हैं, घर भी आवाज़ नहीं करता चुप हो जाता है ...मम्मी मम्मी कर के मेरा सर अब कोई नहीं खाता ....खाने की फरमाइश नहीं होती।

कुछ और भी है जो तुम्हें बताना चाहती हूँ।  तुम्हारे जाने के बाद .....तुम्हारे दादाजी थोड़े और बूढ़े हो जाते हैं ..... पापा कई दिनों तक चुप रहते हैं वो दिखा नहीं पाते अपनी तकलीफ़..... बस तुम्हारे कमरे के चक्कर लगाते रहते हैं। तुम्हारी छोटी बहन kool दिखने की कोशिश करती है पर तुम्हारे जाते ही बच्ची से बड़ी और जिम्मेदार हो जाती है।

जब तुम चले जाते हो तो कुछ दिन तक मैं तुम्हारी ओढ़ी हुई चद्दर अपने पास रखती हूँ ....जिससे मुझे तुम मेरे ही पास महसूस होते हो।

अंत में बस इतना कहना चाहती हूँ ....तुम जहाँ रहो खुश रहो ...स्वस्थ रहो और अच्छे इन्सान बनो।


#रेवा
#बेटा 

Sunday, August 5, 2018

दोस्ती



छोड़ आईं हूँ मैं 
ख़ुद को
उन यादों की
गलियों में ,
जब सालों बाद
बचपन के दोस्तों
से हुई मुलाकात ,
इतनी खुशी
इतनी रौनक मन में
और किसी लम्हे में
नहीं हुई

चेहरा खुद ब खुद
खिल उठा
पैर नाचने को
थिरकने लगे
दिल फिर क्लास की
शरारतों जैसा हो गया
जो तब नहीं बोली थी 
हमने बातें
वो बता कर खूब हँस लिए
वो समय तो अब बीत गया
पर एक एक पल
याद है मुझे
उन्हें याद कर
बार बार ज़िन्दगी से
प्यार हो जाता है
बार बार विश्वास पर
विश्वास हो जाता है 
क्योंकि दोस्ती है तो 
विश्वास है। 

#रेवा
#दोस्ती

Saturday, August 4, 2018

परदेस





चले तो गए हो तुम परदेस
पर बहुत कुछ
छोड़ गए हो
जाते-जाते

कल जब तुमने सवाल किया
मेरे बिना अकेलापन सालता होगा न ??
तो मैंने कुछ नहीं कहा
कैसे कह देती मैं अकेली हूँ....

तुमने
कमरे के हर कोने मे
अपना प्यार ..... 


चाय के कप मे
अपनी गर्माहट ....... 


आईने मे
अपना अक्स ...... 


कपड़ों मे
अपनी खुश्बू और....... 


मेरे कन्धों  पर
अपने तमाम एहसास...... 


सब तो मेरे पास ही छोड़ दिया 

अब कहो तो
मैं अकेली कहाँ हूँ. ......... 

#रेवा

Thursday, August 2, 2018

पुल (२)


औरत अक्सर पुल होती है
अपने बचपन के घर और
अपने शादी के बाद के घर के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
अपनी मायके की मान्यताओं
और ससुराल की मान्यताओं के बीच

औरत अक्सर पुल होती हैं
अपनी आकाँक्षाओं और
अपने द्वारा किये समझौते के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
अपने लिए सम्मान की चाह
और ख़ुद को मिले अपमान के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
अपनी ख़ुद की जकड़ी हुई सोच
और अपने बच्चों की सोच के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
अपनी तबियत और
घर के रोज़मर्रा के काम के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
प्यार की चाह और 
एहसासों के तड़प के बीच

औरत दहलीज़ होती है 
अंदर और बाहर की दुनिया के बीच......

#रेवा
#औरत


Memories



आज पढ़िए मेरी बेटी की लिखी रचना ........

Walking through the hall way of our memories,
I revisited the day you looked at me with eyes full of love.
The way you left little notes on my hand,
And caught me blushing from across the room.
The rush in my heart that I felt, when you
stared at me through the crowds.
The night when you softly whispered, "I love you"
with a breath so transfixing.
You filled the gaps between my fingers,
And all the emptiness was healed.
I walk through the hall way of our memories,
And revisit those days, over and over and over again.

- Rashi T.

Tuesday, July 31, 2018

मेरे हमसफ़र




सुनो
जब तुम गीली रेत पर
या गीली मिट्टी पर
चलते हो तो
मैं तुम्हारे पंजे के
निशान पर पैर रख कर
आगे बढ़ती हूँ,
ये मेरा खेल नहीं
बल्कि मुझे पाता है की
तुम मुझे सही
राह पर ले जा रहे हो
समुद्र के ऊँचे लहरों से
से बचाते हुए....

हमारे पथ पर आये सारे
गड्ढों और कटीली
झाड़ियों को हटाते
संकरी पगडंडियों से
होते हुए
मुझे मंजिल तक
पहुँचाओगे.....

परिस्थियाँ चाहे जैसी हों
जब साथ हैं तो पार
कर ही लेंगे हर मुश्किल
अगर तुम लड़खड़ाए
तो मैं थाम लूँगी
गर मैं गिरी तो
हाथ बढ़ा देना

वादा करो
बस यूँ ही हाथ
थामे रहोगे
जीवन के
हर सफ़र में !!!!


#रेवा
#हमसफ़र



Monday, July 30, 2018

बूंदों की पोटली






बूंदों की पोटली में 
बांध कर 
भेजी है मैंने 
प्यार की सौगात....
जब वो बूँद
पड़ेगी तेरे तन पर
तो महसूस होंगे
तुझे
मेरे एहसास......     

       
पर वादा करो
अगली बरसात के
साथ
लौटाओगे मुझे अपने
जज्बात.....


गर न भी मिल पाए 
हम तुम तो क्या 
यूँ ही बरसात के साथ
भेजते रहेंगे एक दूजे को
साथ होने का एहसास.......

#रेवा
#बरसात 

Friday, July 27, 2018

हादसा (कहानी )





आज विमल रीता को देखने आने वाला है .....रीता के घर में सुबह से तैयारी चल रही है , वो भी आज पार्लर से खास तैयार हो कर आई .....वैसे तो दिखने में  वो एक आम लड़की है पर बहुत सुलझी हुई और समझदार , पढ़ाई में  सामन्य पर बहुत क्लासेज कर रखी थी उसने , चाहे पैकिंग हो कंप्यूटर हो या ब्यूटी कोर्स , सब किया था उसने ...... घर मे वो सबसे छोटी थी सो खूब लाड़ प्यार मे पली बड़ी  .....बड़े दो भाई  बहन की शादी हो गयी और अब सबको को उसकी शादी की जल्दी थी .......इसी से उसकी पढाई पूरी होते ही लड़का ढूंढने लगे , विमल उसके पिता के दोस्त के दूर के रिश्तेदार का बेटा था वहीँ से उसके लिए रिश्ता आया था ।

रीता ने  विमल को पहली बार  देखा और वो उसके मन को भा गया...... ऊँचा कद सांवला रंग, क्लीन शेव न ज्यादा मोटा न पतला , रेड शर्ट और ब्लू जीन्स मे डैशिंग लग रहा था , अच्छे जॉब मे भी था ......बिज़नेस मैन रीता को जरा भी पसंद नहीं  , उसने अपने पापा को देखा था कैसे रात दिन बस काम मे लगे रहते  थे ...... हुँह उनकी भी कोई लाइफ होती है , न घर  आने का कोई फिक्स टाइम न जाने का , नही घूमने फिरने का समय।
इसी से उसे बिज़नेस मैन से शादी करने का बिलकुल भी मन नहीं था।

विमल को भी हलकी गुलाबी साड़ी मे लिपटी रीता एक नज़र मे पसंद आ गयी , घर वालों को तो पहले ही पसंद थी रीता .....बातों बातों मे  सब ने हस कर हामी भरी और दोनों को कुछ देर समय दिया ताकि वे भी आपस मे बात कर आश्वस्त हो जाएं.......बातों के दौरान पता चला की उनका नेचर काफी मिलता जुलता है एक दूसरे से........बस फिर क्या था रिश्ता पक्का हो गया , रीता इतनी खुश हुई  की उसे लगा उसका दिल उछल कर बहार आ जायेगा , पंडित को तुरन्त बुला कर तारिख निकलवाई गयी ,शादी की तारीख  कुछ जल्दी की निकली आगे मुहरत जो अच्छे नहीं थे।

इस वजह से सगाई ज्यादा दिन नहीं रही.....दोनों ज्यादा घूम फिर नहीं पाये  ३  ४ बार ही मिलना हो पाया , इन मुलाकातों  में  ये तो पता चल गया की विमल काफी आज़ाद ख्याल का और केयरिंग है।  समझदारी से पैसे खर्चा करता है......न बहुत ज्यादा बोलता है न कम......पर फिर भी दोनों एक दूजे को ज्यादा अच्छी तरह जान नहीं पाये ,ये बात रीता को खल रही थी। जब ये विमल से बोला तो उसने कहा  कोई बात नहीं अब तो सारी  ज़िन्दगी एक साथ रहना एक दूसरे को पूरी तरह समझने का बहुत वक्त मिलेगा , तो रीता आश्वस्त हो गयी।  देखते देखते शादी का दिन नजदीक आ गया .... खूब रची थी उसके हाँथों की मेहँदी , सबने चिढ़ाया बहुत प्यार करेगा विमल तुझे और ये सुन वो शर्म से लाल हो जाती , दूल्हा बना विमल भी बहुत जच् रहा था।  मंत्रो के बीच दोनों का विवाह राजी ख़ुशी संपन्न हो गया।  विदाई के समय माँ की सीख और आंसू पल्लू से बांध कर चली आई ससुराल .... एक बड़ी और एक छोटी ननद थी उसकी ..... छोटा सा परिवार , सारे नेग चार निबट गए और उसे उसके कमरे मे सजा धजा कर बैठा दिया गया।

हर लड़की की तरह इस रात को लेकर उसने भी अनेक सपने संजोये थे। वो  बेसब्री से विमल का इंतज़ार करते करते सतरंगी ख्वाबों मे खो गयी .....अचानक खट की आवाज़ हुई , वो समझ गयी विमल आ गए , उनके आने का आभास भर से वो अपने मे सिमट गयी।  उसे लग रहा था जैसे उसके गाल लाज से सुर्ख हो गए हैं, जबान तालु मे चिपक गयी है , थोड़ा डर भी लग रहा था।  विमल आया और चुप चाप पलंग पर बैठ गया ......काफी देर वैसे ही बैठा रहा , न कोई बात न चुहल बाज़ी न ही उसे देख मुस्कुराया ,न कुछ पूछा , फिर   कमरे मे इधर उधर घूमता रहा रीता को बहुत अजीब लग रहा था , अभी वो सोचने की कोशिश  ही कर रही थी की क्या हुआ विमल को ?  इतने मे ही उसने देखा की विमल एक उपन्यास लेकर मुँह दूसरी तरफ कर के लेट गया , रीता को धक्का सा लगा ......नाना प्रकार के बुरे ख्याल आने लगे .......कहीं ऐसा तो नहीं विमल अब उसको पसंद नहीं करता ,कहीं उसकी ज़िन्दगी मे कोई और तो नहीं।  कुछ देर वो चुप रही  , पर जब काफी देर बाद भी विमल वैसे ही लेटा रहा तो उससे चुप न रहा गया और पूछ ही बैठी  "क्या बात है काफी परेशान लग रहे हो " विमल ने कहा "कुछ नहीं बस ऐसे ही " रीता के २ ३ बार पूछने पर भी जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो रीता को गुस्सा  आया और तकलीफ भी हुई पर , उसने एक बार और कोशिश की और विमल को कहा की "अब मैं आपकी जीवन भर की साथी हूँ , मुझसे नहीं बांटोगे अपनी परेशानी तो निभाना बहुत मुश्किल हो जायेगा , मुझे बीवी बाद मे पहले अपनी दोस्त समझो और फिर बताओ क्या बात है ,थोड़ी देर चुप रहने के बाद बिमल बोला थोड़ी लम्बी बात है ,रीता ने कहा कोई बात नहीं मैं सुनने को तैयार हूँ।

हम ३ दोस्त हुआ करते थे तीनों मिडिल क्लास फैमिली से थे , एक ही स्कूल मे बचपन से एक साथ पढ़ते थे हमारी दोस्ती पुरे स्कूल की शान थी , हर चीज़ मे हम तीनो आगे चाहे स्पोर्ट्स  हो डिबेट हो या कोई cultural activity हम तीनो का नाम पहले ही लिख दिया जाता  ,हमारी दोस्ती की मिसालें दी जाती ,हमे तीन बदन एक जान बोला जाता था ,हमारे माता पिता भी दोस्त या कह लो रिश्तेदार बन गए ,इस वजह से भी मिलने जुलने मे काफी आसानी हो जाती  ,यहाँ तक की होली हर साल हम सब एक साथ ही खेलते थे ,ठण्ड के समय पिकनिक और वैसे एक दूसरे के घर पढ़ने आया जाया करते । 'किशन हममे सबसे बड़ा था अपनी दो बहनों का इकलौता छोटा भाई पर उसके पापा नहीं थे ,दिखने मे वो राजकुमार सा लगता ,मुझे दोस्त और छोटे भाई सा प्यार देता बन्टी को एक बड़ा भाई और एक बड़ी बेहेन थी ,वो दिखने मे थोड़ा नाटा था पर सोने जैसा मन था उसका ।  हम दोनों उसे खूब चिढ़ाया करते थे ,मैं और बन्टी उम्र मे बराबर थे अच्छे दोस्त होते हुए भी लड़ लिया करते तब हमेशा किशन बीच बचाव करता।

ये उन दिनों की बात है जब हम ९वि क्लास मे थे ........ हमारी गर्मी की छुट्टियां चल रही थी , किशन  सुबह सुबह  आ धमका घर  ,मैं बाथरूम मे था दीदी ने उसे बैठाया और बोला "तेरे पसंद का 'नाश्ता है किशन खा ले "पर उसे जाने किस बात की जल्दी थी दीदी से पूछ मुझे बाथरूम  से जल्दी निकलने को कहने लगा ,मैं बहार आया तो बोला  " चल विमल घूमने चलते हैं यहीं कहीं पास मे ......... बन्टी को भी उसके घर से ले लेंगे ,मेरे मम्मी पापा घर पर थे नहीं सो मैं दीदी को बता कर निकल गया , हम दोनों बन्टी के घर गए पहले तो ताईजी ने मना कर दिया पर बहुत बोलने पर मान गयी , हम तीनो ने वहां नाश्ता किया फिर जल्दी वापस आने का बोल कर निकल गए , अब मसला ये था की जाना कहाँ है ?? किशन तीनों मे सबसे बड़ा था उसने कहा "पास ही एक डैम है बहुत नाम सुना है चल आज वहीँ चलते हैं"  पहले बन्टी और मैंने मना कर दिया पर किशन के बहुत बोलने पर चल दिए , अब आया सवाल कैसे जाएंगे डैम पैसे तो है नहीं पास मे तो किशन ने कहा उसके पास कुछ पैसे हैं जिसमे तीनो का आना जाना हो जायेगा।  फिर क्या था निकल पड़े हम मस्ताने , हमने एक ऑटो रिक्शा ली और रास्ते भर मस्ती करते  पहुँच गए डैम........ ज्यादा भीड़ नहीं थी उस दिन ,पहले हम वहाँ बैठे पानी का आनंद लेते रहे ,फिर किशन ने कहा "चल यार नहाते हैं " बन्टी ने उसका समर्थन किया ,पर मुझे पैर मे फोड़े हो रखे थे सो मैंने मना  कर दिया उनके बहुत कहने पर भी तैयार नहीं हुआ तो दोनो ने अपने कपड़े उतारे और मुझे कहा की तू यहीं बैठ हमारे कपड़े की रखवाली कर हम आते हैं ..............
कुछ देर वो किनारे पर ही पानी मे खेलते रहे फिर थोड़ा आगे गए ......  मैं बोर होने लगा और उन्हें आवाज़ देने लगा की आ जाओ अब , तो बोले रुक विमल आतें हैं थोड़ी देर मे बड़ा मज़ा आ रहा है वो आगे और आगे जाने लगे मैं किनारे से ही देख रहा था , थोड़ी देर मे वो मेरी नज़रों से ओझल हो गए मुझे लगा मुझे डरा रहे हैं जरूर पानी मे छिप गए होंगे , मैंने आवाज़ लगायी बोला की डांट पड़ेगी घर जा कर लेट हो रहा है अब आ जाओ , पर कोई जवाब नहीं आया ........ बार बार आवाज़ लगायी कोई जवाब नहीं  ,मैं अब डर गया बदहवास सा उन्हें आवाज़ लगाता रहा ,वहां आस पास कुछ लोग थे उन्हे बताया और मदद के लिए बोलता रहा , पर उन दोनों का कहीं पता न लगा ,मेरे पास पैसे भी नहीं थे घर कैसे जाता सबको कैसे बताता , फिर याद आया किशन के पास पैसे थे सो उनके कपडे लेकर उनकी जेब टटोली ........... तो कुछ पैसे मिले किसी तरह डर से कांपता गिरता पड़ता ऑटो कर के घर आया दीदी को सारी  बात बताई उनके कपड़े दिए ,दीदी ने तुरंत मम्मी पापा को फ़ोन किया ,वो लोग  घर आये और मुझे डांटने लगे ...... और फिर बात डैम भागे मुझे लेकर ,वहाँ गोताखोरों को ३ घंटे लगे उन्हें ढूंढने मे , उन्हें बहार निकला गया तो वे इस दुनिया से जा चुके थे ,गोताखोरों के अनुसार वो पानी के भंवर मे फंस गए थे ........... मैं एकदम भक्क रह गया बोली जैसे बंद हो गयी , मुझे घर लाया गया , माँ उस दिन मुझे छाती से लगा बहुत रोई बार बार भगवान का शुक्रिया अदा करती और मुझे प्यार करती ......पर मुझे तो जैसे कुछ समझ ही नहीं  आ रहा था  ,मैं पुरे ५ महीने स्कूल नहीं जा पाया उस हादसे ने मेरे मन पर गहरा असर किया था , मम्मी मुझे एक मिनट को भी अकेला नहीं छोड़ती थी ...... कितने दिनों तक मैं दहशत मे रहा माँ पापा के बीच सोता .......  रात को डर से उठ जाता मुझे हर जगह पानी ही पानी नज़र आता  ,ऐसा लगता था दोनों मुझे मदद के लिए बुला रहे हैं  , मैं जैसे ही हाँथ बढ़ाता मेरी नींद खुल जाती  , माँ पाठ पूजा गंडे ताबीज़ जाने क्या क्या करती कभी डॉक्टर कभी कुछ ......... फिर धीरे धीरे सबके प्यार से मैं सामन्य होने लगा।

सबसे बरस हाल किशन के परिवार का था...... उसके पिता भी नहीं थे ,मुझसे तो उनलोगो ने किनारा ही कर लिया था ....... तीनों परिवारों के बीच दरार आ गयी उन दोनों की फैमिली को लगता था इसमे मेरी गलती है , मुझे ये बात बहुत तकलीफ देती  ,मन करता था उनके घर जाने का पर नहीं जा पाता था ....... पर कहते हैं न समय हर बात का मरहम होता है , मैं भी धीरे धीर अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया  ........उनके परिवार वाले भी अपना जीवन जीने लगे ........  लेकिन मैं कुछ भी भूल नहीं पाया ,सबको यहीं लगा की मुझे अब कुछ भी  याद नहीं , पर बचपन की यारी थी हमारी  आज भी उन दोनों का चेहरा मेरी आँखों के आगे घूमता रहता है  ,कभी कभी तो मुझे भी लगता है की शायद मैं जिम्मेदार हूँ इस सबका , और तब अपराधबोध से भर उठता हूँ.........या तो मैं भी चला जाता उनके साथ .........  या  उस दिन उन दोनों को पानी मे न जाने दिया होता ,किसी तरह रोक लेता तो आज वो मेरे साथ होते  ,मेरी शादी मे शामिल होते ........ आज का दिन मेरी ज़िन्दगी का कितना बड़ा और एहम दिन है बार बार मुझे उन दोनों की कमी खल रही है ...... ये कह कर विमल की आँखों से अश्रुधार बहने लगे बच्चों की तरह फफक फफक कर रोने लगा।
रीता चुपचाप सुनती रही , उसे समझ ही नहीं आया की वो क्या करे........ इतनी बड़ी बात कैसे रियेक्ट करे उसे कैसे सांत्वना दे। प्यार हर मर्ज़ को कम कर देता है ये सोच वो प्यार से विमल का सर सहलाती उसे समझाने लगी ..... कुछ एक घण्टे में  विमल शांत हुआ ....... तब तक भोर होने को थी ....ऐसी सुहागरात किसी की
नहीं होती होगी पर वो फिर भी खुश है विमल ने अपने दिल का गहरा राज़ उसे बताया और यही तो एक प्यार भरे रिश्ते की शुरुआत है।

रेवा



Thursday, July 26, 2018

किस्से




ये दुनिया जिसमें
हम सब सांस ले
रहे हैं
पेट भर खा कर
मौज़ मस्ती कर रहे हैं
वो दुनिया जाने
कितनी बच्चियों की /
औरतों की चीखों से 
भरी पड़ी हैं 

हर रोज़ एक नहीं
कई किस्से
हां ये किस्से ही तो हैं न...
जो सुनने पढ़ने को मिलते हैं
और हम
सुनते हैं पढ़ते हैं
गुस्सा आता है
ख़ून खौलता है
कैंडल मार्च होता है
और फिर भूल जातें है
चैन से सो जाते हैं
फिर अपनी रोज़ की
दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं
और दूसरे किस्से का
इंतज़ार करते हैं

दोष किसी एक का नहीं
अकेले सिस्टम का नहीं
अकेले समाज का नहीं
पर कहीं तो कुछ है
कुछ नहीं बहुत कुछ है
जिसे दुरुस्त करना है

कभी सोचा है ऐसे हादसों से
बच्चियों की /लड़कियों की
पूरी ज़िंदगी कब्र में तब्दील
हो जाती है
माँ बाप की नींद हराम हो जाती है
पूरी ज़िंदगी वे ख़ुद को दोषी
मानते रहते हैं
कब तक ऐसा चलेगा ???
ये सवाल मेरा ख़ुद से भी है 
क्योंकि मैं भी कुछ कर नहीं रही
लिखने के सिवाय

पर तुम डरो ऐ दुनिया वालों
औरतें कहीं बच्चा पैदा करने
से ही इंकार न कर दें
लेकिन वो अगर ऐसा कुछ
करतीं हैं तो
ये उनके लिए अपनी जाति को
बचाने की एक पुरज़ोर
कोशिश होगी.....


#रेवा
#औरत

Wednesday, July 25, 2018

ये आंखें भीग जाती हैं


मुस्कुराने की चाह में जाने क्यों हर बार ये आंखें भीग जाती हैं .... तुझे सुकून से भरने जब जब तेरे माथे पर हाथ फेरती हूँ तो ये आँखें भीग जाती हैं ..... तुम जब किसी दिन खिल खिला कर हँसते हो न हंसना चाहती हूँ मैं भी पर जाने क्यों ये आँखें भीग जाती हैं ..... जब कभी लम्बे इंतज़ार के बाद तुम मुझे अपने आगोश में समेटते हो तो सुकून से भर जाती हूँ पर जाने क्यों ये आँखें भीग जाती हैं कभी कभी जब तुम मेरी सिर्फ मेरी परवाह करते हो मुझे बहुत ख़ास महसूस करवाते हो तो उस दिन ये आँखें भीगती नहीं अनायास ही बरसने लग जाती हैं ...... #रेवा

Tuesday, July 24, 2018

दरवाज़े की ओट



रोज़ जब तुम
ऑफिस के लिए
निकलते हो तो
मैं दरवाज़े की
ओट में खड़ी हो जाती हूँ

कहती कुछ नहीं तुमसे
पर मन ही मन
तुम्हारी सेहत
तुम्हारी सलामती की
दुआ मांगती हूँ
और ये विश्वाश
दिलाती हूँ तुमको की
हमारे संसार, बच्चों
और बड़ों का मैं
पूरा ध्यान रखूंगी
ताकि जब तुम बाहर रहो
तो सुकून से भरा रहे
तुम्हारा दिल और
ये विशवास  रहे मन में की
तुम शाम को
खिलखिलाते घर और
मुस्कुराते चेहरों को देखोगे

ये इसलिए नहीं करती की
तुम पुरुष हो और मैं स्त्री
कमाना तुम्हारा धर्म और
घर संभालना  मेरा कर्तव्य
बल्कि ये इसलिए करती हूँ
क्योंकि मैं तुमसे
बेइन्तहा प्यार करती हूँ।

#रेवा



Monday, July 23, 2018

मैं



जीवन की
हर ख़ुशी
तुम से शुरू होकर
तुम पर ही क्यों
खत्म हो ??

जब इस दुनिया में
हम अकेले आते हैं
और अकेले ही जातें हैं
तो फिर हर बार
हर जगह तुम क्यों ?

तुम तुम की रट छोड़ कर
मैं, अपने मैं से खुश
नहीं रह सकती क्या ??
आखरी अपने लिए
और अपने किये
हर काम के लिए तो
मैं ही जिम्मेदार हूँ न
फिर खुशी के लिए
तुम क्यों ?

चलो आज से
एक कोशिश करती हूं
तुम को आज़ादी
देती हूं
और मैं अपने मैं से
खुश रहने की शुरुआत
करती हूं ...


#रेवा 


Saturday, July 21, 2018

नयी यादें




जानते हो
तुम्हारी याद
बेतरह आती है
और मेरे ख्यालों में
हर मुलाकात
महकती रहती है

आँखों की बरसात
मिलवाती है उस
सूखी छतरी से
जिसके होते हुए
भीगना बहुत भाया था
हम दोनों को

कैफ़े का वो टेबल और
मेरी पसंदीदा कॉफ़ी
तेरे बिना
मुझे मुंह चिड़ाते हैं
पर तब  अनायास ही
कॉफ़ी से और इश्क हो जाता है

हाथों में कभी कभी
लगता है तेरे हाथ
रह गए हैं
बस ऐसे ही तुझसे जुड़ी
हर चीज़ को  महसूसते
मुस्कुरा कर चल पड़ती हूँ
नयी यादें बनाने ........


#रेवा








Friday, July 20, 2018

सुंदरता के मापदंड


सुंदरता के मापदंड
क्या हैं ? ???
ये मुझे कभी
समझ नहीं आया
पर जितना समझा 
उससे लगा
सूरत तो है ही
पर सीरत सबसे अहम है


ये दोनों का मेल इंसा को
इंसा बनाता है
अगर सूरत में कमी है
तो चल भी जाता है
पर सीरत का दर्जा
सबसे ऊपर....
लेकिन हँसी
आती है
ये बताते हुए की
आज सीरत  से
ज्यादा सूरत
को महत्व दिया जाता है

सुंदर सूरत हो बस
उसके बाद का सब
मैनेज हो जाता है
लगता है
आर्टिफीसियल दुनिया में
जीते जीते हमे
सब वैसी ही चीज़ें
पसंद आने लगी हैं......


रेवा


Thursday, July 19, 2018

कौन हूँ मैं ??



कौन हूँ मैं ??
एक नारी
बहुत आम सी
साँवले रंग वाली
गढ़ी गयी थी मैं
जिस गढ़त में
कई सालों तक
उसी के साथ चली
सीखी थीं जो बातें
उन्हें ही सच मानती रही
पर दुनिया कुछ और ही है
ये बात धीरे धीरे पता चली.....

तो मैंने दुबारा से ख़ुद को गढ़ा
एक नया चेहरा बनाया
जो मुझे बहुत पसंद आया
अक्षरों से दोस्ती की
और अपनी एक
नई दुनिया बनायी
जो इन किताबों से शुरू
होकर लफ़्ज़ों के रास्ते
तय करते हुए
कलम तक जाती है
और सुकून से भर
देती है मन ....


#रेवा

Wednesday, July 18, 2018

मेरा साया



दिन में वो साया
जो हल्की
धूप में
साथ नज़र आता है
वो अंधेरी रातों को
अकेला कर
कहाँ चला जाता है ??

उसके साथ रहते हुए भी
इतनी तन्हाई 
क्यों महसूस होती है ?
अपनी लकीरों में तो उसे
पाया है न
फिर भी क्यों दूर मुझसे
मेरा साया है ??

जब चाहती हूं
उसमे सिमटना
अपना दर्द बांटना
उसके बाजुओं को
अपने आंसुओं से भिगोना
तो वो क्यों नहीं मिलता ?

कहाँ चला जाता है
हर बार
मुझे यूँ अकेला कर
मेरा ही साया ??


#रेवा

Tuesday, July 17, 2018

उम्मीद




मत करो अब 
मुझसे वो पहली सी 
उम्मीद की 
नहीं दे पाऊँगी 
अब कुछ भी तुम्हें ...

जानते हो जब दर्द हदें  
तोड़ देता है 
तो बदले में 
बहुत कुछ ले भी लेता है 

मुस्कान तो आज भी 
खेलती है होठों पर 
लेकिन सुकून -ए- दिल 
नहीं है 

आंसुओं का इन आँखों में 
काम नहीं अब कोई 
पर आंखें अब शरारत से 
मुस्काती नहीं है 

गाती मैं आज भी हूँ 
पर मस्ती में 
गुनगुनाना भूल गयी हूँ 

आईना देख संवरती 
अब भी हूँ 
पर उसमे तुम्हारा अक्स देख 
शर्मा कर नज़रें नहीं झुकाती 

लटें अब भी उलझती हैं मेरी 
पर उन्हें सुलझाने के 
बहाने तुम्हें पास 
नहीं बुलाती 

बरसात मुझे अब भी 
उतनी ही पसंद है 
पर तुम्हारा हाथ पकडे 
बूंदों को महसूस करने की 
इच्छा नहीं होती 

रिश्ता तो आज भी है 
पर परवाह और प्यार की जगह 
जिम्मेदारी ने ले ली है....... 

रेवा