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Saturday, December 19, 2015

मटर


ठण्ड के आगमन के साथ
मटर सबके घरों मे
ख़ुशी ख़ुशी आई,
सारी गृहणियाँ को
ये बहुत सुहाई
अब घण्टो की
सोच हुई कम
जबसे मटर रानी
बोली आ गए हम ,
मटर को सबके साथ
घुला मिला
स्वादिष्ट व्यंजन सबने बनाई
इसी बात पर तो ये मटर रानी
इतराई ,
और फ़िलहाल
100 रुपया किलो मे आई ,
फिर भी सभी के मन भाई
भिन्डी , तोरु , परवल
हुए सब फीके
जबसे घरों मे
मटर रानी आई ,
अब तो सभी ने
यही पुकार लगाई
जय हो मटर रानी
जय हो मटर रानी !!
रेवा

Friday, November 27, 2015

आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……



आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

बीते लम्हों मे भरा एतबार पढ़ा
हँसी और आंसुओं का सैलाब पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

खुद के लिए तुम्हारी फ़िक्र तुम्हारा ख्याल पढ़ा
भुखी दुपहर को तुम्हारा इंतज़ार पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

सिंदूरी शामों को कॉफ़ी का साथ पढ़ा
बेक़रार रातों को तुम्हारा एहसास पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

झूठे वादों का अल्फ़ाज़ पढ़ा
टूटती सांसों से यादों का कलमा पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……


रेवा




Thursday, November 19, 2015

उपहार






दीये से इन नयनों मे
प्यार की बाती
जलायी है
तुम अपने
एहसासों के तेल से
इसे सदा 
सींचते रहना......
फिर देखना 
हमारे घर मे हर दिन 
दीवाली सी 
जगमगाहट फैली रहेगी,
दोगे न 
मुझे दीवाली का ये
उपहार !!!

रेवा

Monday, October 19, 2015

समुन्द्र


जब दूर दूर समुन्द्र पर
नज़र पड़ती है
तो प्रतीत होता है
समुन्द्र क्षितिज से
मिलने को बेताब है
पर उसकी
नियति ही है विरह .......

इसलिए तो
हर बार कोशिशें
नाकाम  हो जातीं हैं
और समुन्द्र की
लहरों को
किनारे की पनाह मिलती है !!!

रेवा

Wednesday, October 14, 2015

भिन्नरूप



शुरू हुए नवरात्र
आओ सब मिल पूजे
देवी शक्ति के
अनुपम रूप को  ,
युद्ध कर जिसने
किया संहार दानव स्वरुप को  .......

पर इस बार
चलो हम मनाये
इसके भिन्नरूप को    ,
युद्ध करें अपने अन्दर
के दानवों से
औ उजागर करें अपनी
दैवीय शक्ति प्रतिरूप को .......

अगर करें आज हम सब
ये प्रण
तो सार्थक होगा
अपना ये जीवन ………

शुभ नवरात्र


रेवा




Tuesday, September 29, 2015

क्या है मेरी पहचान ??



आज मन मे एक सवाल ने दस्तक दिया
क्या है मेरी पहचान ?

रसोई मे अच्छा खाना बनाना
और फिर तारीफ सुन खुश हो जाना ,
या मेरा व्यवस्थित घर
जिसे कभी अव्यवस्थित
रखने की गुंजाइश नहीं ,
या बच्चों की परवरिश
जो अब बड़े हो गए हैं
और अपनी दुनिया मे मस्त
क्या है मेरी पहचान ?

पति का घर लौटने का इंतज़ार
और उनका थका चेहरा जो
बिन बात किये
खा कर सो जाते है ,
या बच्चों की फटकार
उनके कमरे और पर्सनल
लाइफ से  बेदखली
क्या है मेरी पहचान ?

ससुराल मे मेरे उठाये गए
हर कदम पर प्रश्न
या घर की बचत पर
उठते सवाल
क्या है मेरी पहचान ?

मेरे मन का अंतर्नाद
या घर का वो कोना
जहाँ बैठ मैं करती हूँ
रात दिन खुद से
अनगिनत युद्ध
क्या है मेरी पहचान ??

रेवा



Wednesday, September 23, 2015

पापा आप बहुत याद आते हो



जब आप बीमार थे
तो कभी सोचा न था
युँ चले जाओगे
और चले गए तो
आप इतना याद आओगे .......

जब भी बचपन की कोई
भी बात कहीं भी होती है ,
जब भी घर आती हूँ
पापा आप बहुत याद आते हो.……… 

मेरे हर पसंद न पसंद
का ख्याल
आप रखते थे ,
कोई मुझे देख अनुमान नहीं
लगा पाता था की
परेशां हूँ
पर आप झट चेहरा पढ़ लेते थे
पापा आप बहुत याद आते हो ......…

कितना लाड़ और दुलारा दिया आपने
मम्मी को डांटा मेरे लिए
भइया को सजा वो भी मेरे लिए
कभी आपनेे हाँथ नहीं उठाया न
जोर से बोला मुझे
पापा आप बहुत याद आते हो .......

जब याद आते हो
तो आँखों के कोरों को
आंसुओं से भीगो लेती हूँ और
दिल की आह शब्दों
मे भर देती हूँ
पापा आप बहुत याद आते हो .....


रेवा

Monday, September 14, 2015

एक बड़ा सवाल ??



कैसा समय आ गया है
हमे याद रखना पड़ता है
और लोगों को भी
याद दिलाना पड़ता है की
हिन्दी हमारी मातृ भाषा है ,

हालात ये है की
साल के एक दिन हमे
हिन्दी दिवस मनाना पड़ता है
हिन्दी का स्थान और गरिमा
बना रहे इसके लिए अभियान
चलाना पड़ता है ,

बहुत दुखद है ये अवस्था
पर दोषी तो हम सभी हैं
अंग्रेजी मे बात करना अपनी
शान जो समझते हैं हम

जब हम ही ऐसा करते हैं
तो हमारे बच्चे भी यही करेंगे
फिर कैसे हम अपनी भाषा
से जोड़ पाएंगे आने वाली
नस्लों को ???

एक बड़ा सवाल ??

रेवा


Monday, August 31, 2015

तिरस्कार




मैं जानती हूँ जो 
खूबसूरती ढूंढती हैं 
तुम सब की नज़रें 
वो नहीं मिलती मुझमे.....

पर क्या इस से तुम्हे 
मेरी अवहेलना करने का
हक़ मिल जाता है ?


या तो खुले आम कह दो
या मुझे आज़ाद कर दो

ऐसे रिश्तों से ....... 

नहीं सेह सकती मैं और
तिरस्कार उस बात के
लिए जिसमे मेरा कोई हाँथ नहीं


ये भगवान की देंन है
किसी को ज्यादा किसी को कम

मैं जानती हूँ मेरा मन खुबसुरत है 
मैं प्यार और इज़्ज़त करती हूँ सबकी 
तो क्यों सहुँ मैं ये तिरस्कार ????


रेवा 

Thursday, August 27, 2015

~~~~~मन~~~~~



मन  इतनी जल्दी
कैसे भर लेता है
ऊँची उड़ान ,
हवा से भी तेज़
चलता है ,
एक पल मे
कितना कुछ जी लेता है
ख़ुशी, आँसूं  और
न जाने क्या क्या ,
कितना कुछ समां
रखा है अपने अंदर ,
जाने कितने दरवाज़े
खिड़कियाँ हैं उफ़ !!

कभी तो एक भी नहीं खुलती
पर कभी परत दर परत
उधड़ जाता है
ऊन के स्वेटर सा
और कर देता है खाली
खुद को ,
फिर भरने
नया आसमान !!

रेवा


Saturday, August 15, 2015

क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??






सर्व प्रथम स्वतंत्रता दिवस की ढेरो शुभकामनाएं सभी को !!!

अब कुछ सवाल ????

हमे स्वतंत्र हुए ६९ साल हो गए पर क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

आतंकवाद इस कदर बढ़ रहा है की
देश खोखला होता जा रहा है
क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

आज इंग्लिश बोलना अपनी शान और
हिन्दी मे वार्तालाप अपनी शान के खिलाफ
समझा जाता है ,
क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

आज हमारे देश की स्त्री कहीं
सुरक्षित नहीं ,
चाहे वो ५ साल की हो या ५० साल की
क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

हमारे देश के बच्चे जो भविष्य हैं हमारा
बाल मजदूरी मे जकड़े हैं
आँखों मे सपने देखने से पहले
जुर्म देखते है
क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

आधुनिकता हमे जकड़ती जा रही है
और संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है
क्या हम सच मे स्वतंत्र हैं ??

ये सवाल यहीं खत्म नहीं होते और भी कई जटिल समस्याएँ हैं
एक दूसरे को बधाई देने से बेहतर हर स्वतंत्रता दिवस पर
कोई भी एक छोटा काम देश के नाम …………

रेवा 

Friday, July 31, 2015

तुम्हारे बिना


तुम्हे क्या लगता है
मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता
आराम से रह लेती हूँ
तुम्हारे बिना ??
वहीँ घर के काम
खाना पीना और सोना ………

ये क्यों नहीं समझते की
जब तक सुबह तुम्हारे साथ
दो कौर खा न लूँ
मेरा मन भूखा रहता है ..........

शाम को जब तुम घर आते हो
तो खाली घर भर जाता है ,
तुम्हारी आवाज़ सुनकर
सन्तुष्टि सी महसुस होती है .......

बात तुम चाहे न करो
पर बगल मे तुम्हे सोया देख कर
मेरी नींद पूरी हो जाती है……

ऐसा महसुस होता है की
"तुम मेरी आदत और आदत
ज़िन्दगी बन गयी है अब "!!!!

रेवा 

Wednesday, July 22, 2015

बेमानी प्यार





जाने क्यों
पर भटकती रही
सदा प्यार के लिए….

प्यार नज़र भी आया
पर हंसी आई ये जान कर की
प्यार भी सहुलियत के हिसाब से
किया जाता है …

फ्री हैं तो प्यार जाता दिया
मसरूफ हुए तो ठुकरा दिया
उफ्फ्फ !!

जब ज़िन्दगी मे
खालीपन महसूस हुआ
तो याद आया फिर वही प्यार ....

और उस प्यार को वहां न पा कर
बेवफा और न जाने
क्या क्या उपनाम दिया....
वाह !

खुद को सच्चा
और प्यार को बदनाम किया …
हुँह !

"खुद हुए मसरूफ
और बेवफ़ा  मुझे नाम दिया ,
चल दिए दामन छुड़ा कर
और बेमानी मेरा प्यार हुआ  "!!!!!!!

रेवा

Monday, July 13, 2015

अनकही जुबां !!



बेवफाई ने तेरी
कर दिया बेजुबां ,
हर तन्हा लम्हे से
करती हूँ मैं बस
एक ही सवाल ,
क्या मैं प्यार के
क़ाबिल नहीं ?
या किस्मत ही है
बईमा ,
या पल पल की तड़प
नाम है मेरे ,
काश ! तुम समझ पाते
मेरे नम आँखों की जुबां ,
पढ़ पाते
मेरी दर्द भरी मुस्कान ,
पर अब भी मेरे पास
जीने की है एक वजह
मेरे दिल मे बसे
तेरे प्यार की वो
अनकही जुबां !!

रेवा



Monday, July 6, 2015

गोल रोटी



रोटी को गोल
बनाते बनाते
मेरी ज़िन्दगी भी जैसे
गोल हो गयी है………

हांथों मे बचा हैं तो बस
इधर उधर चिपका
गीला आटा.……

बेमतलब बेमानी रिश्तों की तरह
जिसे धो कर साफ़
करना है.…

फिर भरना जो है
रिश्तों की ऊष्मा से
और ये क्रम यूँही
चलता रहेगा
उसी गोल रोटी की तरह…

रेवा






Saturday, June 27, 2015

दुर्गा का अपमान


घुन लग गयी है
लोगो की सोच मे ,
दिमाग खाली हो गया है
गुरू शिष्य की गरिमा को
ताक पर रख दिया है ,
इसे भी जोड़ दिया है
देह की लालसा से ,
सरस्वती को पा कर अभिमान
से भर गए हैं या
गिर गए हैं ,
तभी तो दुर्गा का अपमान
करने की हिम्मत आई ,
अब दुर्गा को ही फिर से
रोद्र रूप धरना होगा ,
ताकी नाश कर सके इन
मुखौटों के पीछे छिपे
महिसासुरों का.............

रेवा


Saturday, June 20, 2015

मैं गृहणी हूँ





आज मान लिया मैंने की
सारी गलती मेरी ,
अगर बच्चे पढ़े न
बड़ों को जवाब दें तो
गलती मेरी ,
आखिर मैं ही तो रहती हूँ
दिन भर उनके साथ ,
अगर घर बजट
गड़बड़ हुआ तो
गलती मेरी ,
मैंने ही की होगी फिजुलखर्ची ,
सेहत ख़राब हो तो
गलती मेरी
ध्यान नहीं देती पौष्टिकता पर ,
आखिर मैं गृहणी हूँ !
बात मेरी चाहे
अनसुनी की जाती हो
पर जो भी होता है
उसमे मेरी रजामंदी
मान ली जाती है ,
और अगर गलत हुआ तो
गलती मेरी
क्योंकी मैं गृहणी हूँ................


रेवा

Thursday, June 11, 2015

निष्प्राण कलम


मेरे मन की गठरी से
निकल कर खो गयें है
सारे शब्द ,
ख्याल सिमट गए हैं
दिल की चार दिवारी के बीच ,
एहसास कहीं गुम हो गयें हैं
समय भी दब गया हैं
काम के बोझ तले ,
अब कैसे करूँ तुकबन्दी ?
कैसे भरूं
अपनी रचनाओं मे प्राण
जब मेरी कलम पड़ी है
निष्प्राण………………

रेवा


Tuesday, May 12, 2015

नारी




नारी

माँ बहन बेटी पत्नी दोस्त
और भी कई रूप
पर दिखता क्यों बस
हाड़ मास का देह स्वरुप ,
प्यार वात्सल्य से भरी
इस मूरत मे
क्यों दीखता है
काम ,वासना का ही रूप ,
बोलने को कर लेते हैं सब
बड़ी बड़ी बातें
और बनते हैं परम पुरुष,
पर मन के अंदर
वहीँ लालसा ,वो ही
लपलपाती लार टपकती
इच्छायें लिए घूमते हैं ,
इंतज़ार मे की कब मौका
मिले और भूख शांत हो ..........
"अगर ये दुनिया ऐसी है
तो मुझे दुगनी शक्ति से
भर दो माँ
ताकी आने वाली बेटियों को
भय मुक्त समाज मिल सके !!


रेवा



Monday, May 11, 2015

मुनिया (लघु कथा )



सोमारी झारखण्ड मे रहने वाली एक आम औरत……पिछले ३ महीनो से लड़ाई लड़ रही थी।अपनी बच्ची को स्कूल मे पढ़ाना चाहती थी , घर वालों की और पति की मनाही के बावजूद , अपने समुदाय से लड़ कर उसने अपनी मुनिया का दाखिला स्कूल मे करवा दिया.... ताकि वो पढ़ सके और उसकी तरह बिना पढ़े जमीन के कागज़ पर अंगूठा लगा कर सारी ज़िन्दगी एक बंधवा मजदुर न बन जाये।
आज मुनिया को गोद मे लिए लालटेन की रौशनी मे भी उसे मुनिया के उज्जवल भविष्य का चढ़ता सूरज नज़र आ रहा था।

रेवा 

Tuesday, May 5, 2015

बेमानी



ज़ुबान पर नाम तो तेरा अब भी आता है
पर जाने क्यूँ ये लब खामोश रहते हैं ,

प्यार तो तुझ पर अब भी आता है
पर जाने क्यूँ ये दिल बेवफाई की चादर ओढ़ लेता है ,

ख्वाबों में तेरा अक्स अब भी नज़र आता है
पर जाने क्यूँ ये नज़रों का धोखा लगता है ,

आदत सी हो गयी है यूँ जज़्बातों को कुचलने की
जाने क्यूँ ये प्यार अब बेमानी सा लगता है।

रेवा

Friday, April 24, 2015

सिर्फ तुम


रात की खामोशियों मे
चाँद की करवटों मे
चादर की सलवटों मे
मन की कसमसाहट मे
तकिये के गीले गिलाफ मे
दर्द भरे इस दिल मे
तुम सिर्फ तुम ही तो हो

रेवा 

Tuesday, April 7, 2015

गिद्ध




आज फिर मेरा
विश्वाश नोचा गया ,
ये नोच खसोट 
करने वाला गिद्ध 
और कोई नहीं 
बल्कि प्यार नामक 
शब्द का उपयोग 
करने वाला इंसान है ,
हँसी ! आती है 
प्यार का नगाड़ा 
बड़े जोर से बजाते है 
पर उनकी नज़र 
रहती है सिर्फ 
स्त्री की देह मे ,
"माटी से बना देह 
मिल जाएगा माटी मे 
उसे इतना मत नोचो की 
अपनी ही देह से घृणा हो जाये"। 


रेवा 


Friday, March 27, 2015

                                            
                                               सरस काव्य-गोष्ठी (कोलकाता )


मुझे ये बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है की , कोलकाता की संस्था "बंगीय हिन्दी परिषद" ने 22.3.15 रविवार 

को कवि-कल्प के तत्वावधान मे एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया।  

इस ऐतिहासिक संस्था को बड़े-बड़े साहित्यकार जैसे महादेवी वर्मा ,हरिवंश राय बच्चन ,निराला जी 

ने अपने पद्चिन्हों से नवाज़ा है। 

मुझे बहुत ख़ुशी महसूस होती है की मुझे इस संस्था से जुड़ने का मौका मिला ,और  मैंने अपने काव्य पाठ 

का सफर यहाँ से शुरू किया। जिसके लिए मैं रवि प्रताप जी ,नीलिमा दीदी और मेरी सखी आशा पाण्डेय 

की सदा आभारी रहूंगी। 

अपने अनुभव के बारे मे क्या बताऊ ……… वहां अनेक दिग्गज शायर , कवियों और कवित्रियों को सुनने 

का मौका मिला , उनकी सोच और उनके कलम को सलाम ,ऐसा लग रहा था मानो वो शाम काव्य रस से 


सरोबार हो गयी हो , कहाँ समय बीता पता ही नहीं चला। 

इस काव्य गोष्ठी के सफलता की खबर प्रभात खबर , दैनिक जागरण ,जनसत्ता ,राजस्थान पत्रिका और 

अनेक अकबरों ने छापी। 


रेवा 

प्रभात खबर 
दैनिक जागरण

Monday, March 23, 2015

अपनी पहचान..........


नहीं चाहिये मुझे
तुम ,तुम और तुम 
नही मानूँगी अब मैं 
सबकी बात ,
सिर्फ़ इसलिए की मुझे 
कहलाना है 
एक अच्छी बहु 
ननद ,भाभी और 
वो तमाम ऐसे रिश्ते 
जो बस चुप रहकर 
सुनने और सही 
होते हुए भी अपेक्छा न 
करने से मिलते  है  ,
अब मुझे भी चाहिए 
अपना आत्मसम्मान 
अपने काम और बातों 
मे  आत्मसंतुष्टि ,
और अपनी पहचान.......... 

रेवा 


Wednesday, March 18, 2015

अंतर (लघु कथा )

अंतर (लघु कथा )


आज सुबह - सुबह फिर रमेश और रीना लड़ पड़े ....... काम को ले कर बात हो रही थी ,
रमेश ने कहा "तुम्हे अपना एक छोटा सा काम बोला था लैपटॉप पर सर्च कर के कर देना
पर तुमसे एक काम नहीं होता ,  करती क्या हो सारा दिन ?" बच्चे स्कूल चले जातें है ,
मैं ऑफिस....... बस पड़ी रहती हो सारे दिन सोफे पर टीवी के सामने ,
इतना सुनना था , रीना की आँखों से आंसू बहने लगे ,
सुबह ५ बजे से होता है उसका दिन शुरू और रात १० बजे ख़त्म …
गुस्से मे आज उसने सारे दिन का ब्यौरा बताया रमेश को,
और पूछा ''अब बोलो कब करूँ तुम्हारा काम ''!
तो रमेश ने मुँह बना कर टका सा जवाब दिया , " तुममे और इस काम वाली बाई मे कोई अंतर नहीं "
वो तो अनपढ़ है और तुम पढ़ी लिखी अनपढ़......................


रेवा टिबड़ेवाल







Wednesday, March 11, 2015

श्याम का प्यार (लघु कथा )


लता वैसे तो एक वैश्या थी ,उसे पता था की एक आम औरत की ज़िन्दगी वो नहीं जी सकती ……… पर थी तो एक लड़की ही न.......... मन होता था की उसका भी घर बार हो प्यार करने वाला पति  हों....... वो भी हर त्यौहार अपने परिवार के साथ मनाये। भगवान से रोज़ प्रार्थना करती..........
पता नहीं उसकी प्रार्थनाओं का असर था  या भगवान को उस पर दया आ गयी , श्याम वैसे तो उसका कस्टमर
बन कर आया था पर उसे लता  से प्यार हो गया , और किसी तरह महीने भर मे उसकी मालकिन को पैसे दे कर शादी कर ली ,और गांव ले आया ……… और आज वो होली दहन के दिन सर ढक कर पूजा कर रही है और फेरी ले रही है ,आज उसकी बरसो पुरानी इच्छा पूरी हो गयी।


रेवा टिबड़ेवाल  

Friday, March 6, 2015

कोई और रंग



नहीं चढ़ता अब कोई और रंग
उस एक रंग के चढ़ने के बाद ,
चेहरे का रंग लाल हो गया
उसके एक स्पर्श के साथ ,
साँसें गुलाबी हो गयी
आलिंगन मे समाने  के बाद ,
मैं राधा और वो कान्हा बन गया
इस प्यार की डोर के साथ !

रेवा


Monday, March 2, 2015

बाल विवाह (लघु कथा )

गीता बार बार रो रही थी ,                            
"पिताजी मैं नहीं पहनूँगी ये जोड़ा "
मुझे माँ को बहनो को और आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाना ,
पर बलवंत नहीं माना  ,
चिल्लाते हुए बोला " एक एक कर के हाँथ पीले नहीं करूँगा तो कब तक तुम ४ बहनों को पार लगाउँगा "
चुप - चाप पेहेन ले।
गीता लाख गिडगिडायी पर उसकी एक न चली , जोड़ा पहनते हुए
उसे ये डर भी सताने लगा की जैसा उसके साथ हो रहा है ,
उसकी तीनो बहनों के साथ न हो।वो अपनी बहनों की तरफ देखने लगी उनके  मासूम चेहरों ने ,
उसमे एक अजब से विश्वाश को पैदा किया
और मंडप मे जाने से पहले गीता ने भगवान के सामने हाँथ जोड़ कर प्रण लिया
"मेरे साथ जो अन्याय हो रहा है वो मैं अपनी बहनों के साथ कभी नहीं होने दूंगी "
अब ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य् है।
इतना कह कर एक दृढ निश्चय के साथ चल पड़ी।

रेवा 

Wednesday, February 25, 2015

प्यार की खुशबू


ऐसी चली फागुन की पुरवाई
फिर तेरी याद हो आई ,
यादों के बंद बक्से से
प्यार की खुशबू ने
ली अंगड़ाई ,
बाँवरे मन ने की
कोशिश हज़ार
पर हो गया मदहोश
फिर एक बार ,
जाने ये कैसा इत्र है
जो महका गया
मेरा तन और मन
बन कर बरखा की बौछार ।

रेवा

Thursday, February 19, 2015

नाम (लघु कथा )


नाम  (लघु कथा )


"निर्मला पानी ला , अरी कितना समय लगाएगी" ,
चिल्लाने लगी निर्मला की मालकिन...... डरी सहमी 9 साल की निर्मला काँपने लगी उस भय से की फिर देर हो गयी तो कल कि तरह मार पड़ेगी ,  जैसे ही वो गयी मालकिन ने सारे दिन का काम बता दिया ........ " देख कपडे धो लिए , फिर बर्तन और हाँ खाना बना कर आयरन भी कर लिए .........थोड़ा जल्दी हाँथ बढ़ाया कर ,मुझे आते आते शाम हो जाएगी तब तक सब निपट जाना चाहिये "……कह कर फ़ोन पर अपनी दोस्त से बातें करने लगी और कहा , सुलेखा याद है न आज हमे " गांव की छोटी बच्चियों को प्राथमिक शिक्षा देना कितना जरूरी  " टॉपिक पर स्पीच देनी है।  स्पीच इतनी इमोशनल होनी चाहिये की इस बार कम से कम अख़बार मे हमारी मैगज़ीन "शिक्षित बचपन ".......का नाम जरूर हो

रेवा

Thursday, February 12, 2015

पैकिंग (लघु कथा )

काम कर रही थी सानु माँ के साथ.......कई महीनों से चल रही थी तैयारी सानु की शादी की ...अब तो वो दिन बिलकुल करीब आ गया था , सानु बहुत खुश थी ,क्युकी लड़का उसे बहुत पसंद था ,जैसे जीवन साथी की उसने कामना की थी संजय बिलकुल वैसा ही था।
माँ भी बहुत खुश थी , माँ का सबसे बड़ा अरमान होता है बेटी को दुल्हन के जोड़े में देखना , और वो सपना अब पूरा होने वाला था।
अब शादी को बस चार ही दिन बचे थे , माँ ने सानु को बोला " सानु नए सामानों के साथ तेरे पहले के सामान भी पैक कर ले" , पता नहीं कब क्या काम आ जाये , तेरे इतने गहने और कास्मेटिक हैं सब रख ले,और हाँ अपनी फवौरिटे परफ्यूम भी ,वार्ना फिर लड़ेगी शिखा से ,माँ का इतना कहना था बस  सानु की आँखों से अचानक आँसू बहने लगे…… माँ सकपका गयी और सानु को पुचकारते हुए पूछने लगी।
सानु ने कहा " माँ सारे सामान मैं पैक कर लुंगी , पर कैसे पैक करू बचपन ,पापा का लाड़ ,भैया का दुलार ,शिखा की छेड़खानी ,इस घर से जुड़ी  तमाम यादों की पैकिंग कैसे करूँ माँ ??



रेवा 

Sunday, February 8, 2015

टूटा विश्वाश



आज शब्द और सोच
दोनों ने जवाब दे दिया ,
जब दोस्त ने दोस्ती को
शर्मसार कर दिया……
टूट गया विश्वाश                          
मिट गयी हर आस ,
पर समझ फिर भी नहीं
आता कैसे तोड़ दूँ
वो बंधन वो प्यार ,
न आँसू है आँखों मे
न चैन ओ सुकून है
दिल मे ,
बस एक ही सवाल है
इस मन मे
क्यों हर बार ऐसा होता है
मेरे जीवन मे ?


रेवा





Wednesday, February 4, 2015

सिंदूरी शाम



सिंदूरी शाम
धुंध मे छिपा चाँद ,
मधम संगीत
हौले हौले
चलती ये पुरवाई ,
ऐसे मौसम में
उफ्फ तेरी रुस्वाई,
पर मेरा प्यार
जो जोड़ देगा
दिल के हर तार ……

रेवा



Thursday, January 22, 2015

"मुझे प्यार हो गया खुद से"


बचपन से लेकर आज तक
बहुत कड़वाहट मिली है ,
बेगानों से और
अपनों से भी……
आदत सी हो गयी है जैसे
तिरस्कार और कड़वाहट
सहने की ,
पर मज़े की बात तो
ये है की
अब इस कड़वाहट मे भी
मधुरता का स्वाद आता है,
ज़िन्दगी अब कड़वी नहीं
बल्कि शहद सी मीठी
लगती है,
और ये कमाल
इसलिये हुआ है
क्योकी
"मुझे प्यार हो गया खुद से" !

रेवा 

Monday, January 19, 2015

दोस्ती की खुशबू



आज फिर एहसासों को
शब्दों मे पिरोने की कोशिश
कर रही हूँ और                        
शब्द कम पड़ रहे हैं.……

२७ सालों बाद
स्कूल के दोस्तों से मिली ,
जो अपनापन और प्यार
महसूस हो रहा था
वो हर किसी से
मिल कर नहीं होता ,
उस लम्हे को कैसे दूँ शब्द ?

वो लम्हा तो बस
दिल के दरवाज़े मे
क़ैद हो कर अपनी खुशबू
बिखेर रहा है  ,

ख़ुशी के पल तो
पंख लगा कर उड़ गए
पर एहसासों के
निशाँ छोड़ गए ,

आज आँखें बार - बार
नम हो रहीं है
उन पलों को याद कर के ,

पर तस्सली इस बात की है की
ये एहसास ,दोस्ती और मिलन
की खुशबू अब सदा रहेगी
हम सब के साथ

रेवा



Tuesday, January 13, 2015

मैं

आज पता नहीं क्या हुआ ?
पर बहुत दिनों बाद
खुद से मुलाकात हुई ,
थोड़ी ही सही
पर अपने आप से
बात हुई ,
खुश हुई
रोई भी बहुत ,
पर अंत तः
एक शुन्य सा महसुस हुआ
जिसमे न कोई सोच
न गिला न शिकवा ,
पर ये शुन्य
अन्दर तक
सुकून दे गया मुझे ,
लेकिन अगले ही छण
फिर शुरुआत हो गयी
एक नए मैं की……………

रेवा

Monday, January 5, 2015

पिया के घर चली...........




माँ के आँगन की कली
ममता की छाँव मे पली
बन के दुल्हन आज
पिया के घर चली ……

गहनों से कर के श्रृंगार
सितारों से सजी है माँग
प्यार से भरी है मेहंदी
एहसासों का पहन के जोड़ा
पिया के घर चली ………

भाई के लाड़ से सजी है डोली
माँ बाप के आशीर्वाद से
भरी है झोली ,
आँखों मे लगा के
अरमानों का सुरमा
वो आज
पिया के घर चली...........

बिलखते हैं भाई बेहेन
तड़पते माँ बाप
रोती है सखियाँ
पर वो उन सबको छोड़
पिया के घर चली………

धन्य है वो माई
जिसने बेटी जाई
अपने आँगन को कर के सूना
बना दिया किसी और के घर का गहना ……।

रेवा