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Wednesday, April 12, 2017

मेरा वज़ूद




अपने शरीर से आज
झाड़ ली है मैंने
वो सारी कही अनकही
बातों की धूल  ,
अब मुझे साफ़
दिख रहा है
अपना  वजुद ,
पर घर की तरह
इस धूल को भी
मुझे रोज़ झड़ना होगा ,
वार्ना ये फिर
मेरे शरीर को अपना
बना लेंगे
और धुँधला जायेगा
मेरा वज़ूद

रेवा


Thursday, April 6, 2017

अनमोल मोती







सीपों मे बंद
मोती
जैसे आँसू
आज ढुलक कर
बिखर गए हैं
हमारे चारों तरफ ,
उन्हें जमा कर
एक माला बनाई है मैंने ,
जिसमे कुछ
मेरे मोती हैं और
कुछ तुम्हारे ,
क्या तुम बता सकते हो
कौन सा मोती बेहतरीन है ?      
किस मोती का क्या मोल है ?         
ठीक वैसे ही
तुम नहीं अंतर कर सकते
हमारे प्यार में ,
नहीं तय कर सकते इसका मूल्य
" हमारा प्यार वो अनमोल रत्न है
जो साल दर साल चमकता है
हमारे साथ और समर्पण से "

रेवा



Monday, March 27, 2017

जी करता है





आज खुद को गले
लगा कर सोने को
जी करता है ,
अपने कंधे पर
सर रख कर
रोने को
जी करता  है ,
अपने आंसुओं से
शिवालय धोने को
जी करता  है ,
समुन्द्र के रेत से
बनाया था जो आशियाना
उसे समुन्द्र को
सौंपने का
जी करता है ,
बिन पहचान जीते
रहे आज तक
अब अपनी पहचान
के साथ मरने को
जी करता है ,
आज खुद को गले
लगा कर सोने को
जी करता है..........

रेवा


Tuesday, January 24, 2017

अजनबी आवाज़





इतने सालों के साथ
और प्यार के बाद ,
आज एक अजीब सी
हिचकिचाहट
महसूस हो रही है ,

तेरी  वहीँ
रूहानी आवाज़
जिस पर मैं मरती हूँ
अजनबी सी
लगने लगी  ,

समझना नामुमकिन
सा हो गया है की
ऐसा क्यों
क्या मेरी सोच मे
फर्क आ गया  !
या हालात ने करवट
बदल ली ..............

"जैसे भी हों हालत-ओ -जज़्बात
रिसते हैं दिल के ज़ख्म
बन कर एक अनकही फरियाद "

रेवा

Wednesday, January 11, 2017

मुझे रहने दो






मुझे रहने दो मेरे घर मे अकेले
ये बखूबी जनता है मेरे मिज़ाज
जब भी ख्याल बिखरते हैं
बटोर कर सहेज लेता है उन्हें
सजा देता है करीने से अलमारियों मे
ताकि झाड़ू बुहार न ले जाये उन्हें
मुझे रहने दो मेरे घर मे अकेले ,

भरी बरसात मे और गर्म दुपहरिया मे
माँ की तरह देखभाल करता है मेरी
धूप और तूफान के हर कतरे
को रखता है दूर मुझसे
ताकि महफूज़ रह सकूँ
मैं उसके साये मे .............
मुझे रहने दो मेरे घर मे अकेले।

रेवा


Monday, January 2, 2017

दिल की चाहत







हँस के
हम अपना हर
दर्द छिपा लेते है
हमे प्यार है
तुमसे
ये बात हम अपनी
निग़ाहों से भी बचा लेते हैं 

तुम्हें इंकार तो नहीं
पर मैं अपने
रिश्तों से बंधी
हर बार इनकार
कर देती हूँ 

और दिल की चाहत
अपने आहों मे भर
रूह के हवाले
कर देती हूँ


रेवा

Wednesday, December 21, 2016

शीत





जाने क्यूँ इन शीत के
शुरुआती दिनों मे

मन अजीब सा हो जाता है


दिल का एक ख़ाली कोना
सर उठाने लगता है
उसे जितना समझाने की
कोशिश करती हूँ
वो ऊँन के गोले सा
उतना ही उलझता जाता है.....


एक अनभुझ पहेली

सा

हर रोज़ साथ

चलता रहता है

क्या तुम सुलझा

सकते हो ?


भर सकते हो मेरे दिल का

वो खाली कोना ?

करा सकते हो मेरी

शीत की सुबह को

गुनगुनी धूप सा एहसास ???


रेवा

Friday, December 9, 2016

दो तस्वीर




मैंने इन्द्रधनुष से कुछ रंग चुराया
उनमे तेरे साथ बिताये
पलों को मिलाया
और बनायी
दो तस्वीर
एक तेरी
एक मेरी ,
उन दो तस्वीरों
से फिर रंग चुराया
उसमे मिलाये
सारे गिले शिकवे
और प्यार
फिर बनायी दो तस्वीर
एक तेरी
एक मेरी ,
तस्वीरों को देखा
तो दोनों लगे एक दुजे की पहचान
क्यूंकि तू कुछ मुझ जैसा
हो गया था
और मैं कुछ तुझ जैसी ....... !!

रेवा


Sunday, December 4, 2016

४० पार




आईने  के सामने खड़े हो
आज खुद से
बात करने की कोशिश करी .......
जब गौर से देखा तो
समझ ही नहीं आया की
ये मैं हूँ !!
न पहले सा रंग रूप
न निर्छल हंसी
न वो अल्हड़पन
न जिद्द
न वो बचकानी बातें
न कुछ कर गुजरने की चाह
बस एक उदासी ओढ़े
यथावत अपने काम हो अंजाम
देती एक स्त्री  ,
ये मैं तो हरगिज़ नहीं
फिर ये है कौन !!
ये है ४० पार की वो औरत
जो उम्र के इस पड़ाव पर
अपना वज़ूद तलाश रही है।

रेवा




Monday, July 13, 2015

अनकही जुबां !!



बेवफाई ने तेरी
कर दिया बेजुबां ,
हर तन्हा लम्हे से
करती हूँ मैं बस
एक ही सवाल ,
क्या मैं प्यार के
क़ाबिल नहीं ?
या किस्मत ही है
बईमा ,
या पल पल की तड़प
नाम है मेरे ,
काश ! तुम समझ पाते
मेरे नम आँखों की जुबां ,
पढ़ पाते
मेरी दर्द भरी मुस्कान ,
पर अब भी मेरे पास
जीने की है एक वजह
मेरे दिल मे बसे
तेरे प्यार की वो
अनकही जुबां !!

रेवा



Wednesday, November 26, 2014

इन चार कन्धों की सवारी


पड़ा था कफ़न मे लिपटा
चार कन्धों पर जाने को तैयार ,
रो रहे थे सारे अपने
पर वो था इन सब से अनजान ,
सजा धजा कर
कर रहे थे तैयारी ,
निकलनी थी आज उसकी
इन चार कन्धों की सवारी .......


कल मेरी भी जाने की आएगी बारी
पर फिर भी इस सच से अनजान ,
मैं इस जीवन के
झूठ - सच ,लालच ,
जलन ,मेरा तेरा
और न जाने ऐसे ही कितनी चीज़ों मे ,
करती हूँ अपने आप को
उलझाने की तैयारी ,
जानते हुए भी की
पड़ी रहूंगी एक दिन मैं भी ,
करने को
इन चार कन्धों की सवारी …………

रेवा

Saturday, November 22, 2014

जरूरी तो नहीं......

प्यार को प्यार मिल जाये
जरूरी तो नहीं ,
दिल को क़रार मिल जाये
जरूरी तो नहीं ,
जीने को तो जी लेते है सभी
ज़िन्दगी मौत से बेहतर हो जाये
जरूरी तो नहीं……

रेवा 

Tuesday, November 11, 2014

ख्वाबों का संसार


हर औरत को
गहने ,कपड़ों और
तोहफों से
बहुत प्यार होता है ,
हर बार शॉपिंग कर के तो
जैसे मन तृप्त हो जाता है ,
घर की सजावट मे
एड़ी चोटी का जोर
लगा देतीं हैं
कीमती सामानों से
सजावट करती हैं,
पर मिनी
वो अलग है
पसन्द उसे भी है ये सब
एक हद तक
लेकिन वो थोड़ी सी जुदा है.......
उसके लिए
सबसे बड़ा तोहफा है
"विश्वाश "
सबसे बेशकीमती गहना है
"प्यार "
उसने घर की सजावट
कीमती सामानों से नहीं
बल्कि "एहसासों" से की है
और यहीं तो है
उसके ख्वाबों का संसार ...........

"प्यार, विश्वाश और एहसासों की
दुनिया
येही ही तो है मन की
तृप्ती का जरिया ,
पा ले इसे जो एक बार
उसकी ज़िन्दगी हो जाये
गुलज़ार "

रेवा


Tuesday, November 4, 2014

ज़िन्दगी


मैं ज़िन्दगी के पन्नों को
जितना भी पढ़ने की
कोशीश करती हूँ
वो उतना ही
उलझती जाती है ….

मैंने प्यार करने की
जिससे भी कोशिश की
वो उतना ही मुझसे दूर
चला जाता है ……

मैंने दिलो जान से
जिससे भी दोस्ती निभायी
वो उतना ही अजनबी
बन जाता है …....

पर  मैं ये नहीं बोलती की
ज़िन्दगी अब तू मुझ पर रहम कर,
सितम जितने चाहे उतने कर
मैं भी फौलादी इरादे रखती हूँ
हर सितम के साथ
और मजबूती से
सामना करने को तत्पर होती हूँ.

"ऐ ज़िन्दगी खेल ले मुझसे तू
जी भर आँख मिचोली,
मैं भी डटी रहूंगी भर कर
बुलंद हौसलों की टोली "

रेवा

Thursday, October 9, 2014

मुट्ठी भर एहसास



मुट्ठी भर एहसास
जो हर बार
भर लेती हूँ ........
फिसल जाती है
रेत की तरह
उँगलियों के कोरों से .......
थाम लेती हूँ
सर्द आँहों को
हर रात ………
ताकि हर सुबह
फिर भर सकूँ
एहसासों को ……
जाने कब तक
चलेगा ये सिलसिला…...
अब तो आस  ने भी
हवा के साथ
रुख बदलना
शुरू कर दिया है

रेवा 

Monday, September 29, 2014

बेकाबू आँसू



धो लिये आज आंसुओं से
अपने सारे गम........
भर ली अपनी झोली
फिर इन नमकीन
जल की धाराओं से
चाहती नहीं थी
इन्हें न्योता देना
पर क्या करूँ
इन्सान हूँ
देवताओं जैसी फितरत
कहाँ से लाऊँ..........
जब सहनशक्ति
अपनी हदें पार
कर लेती है
तो ये आँसू बेकाबू
हो जातें हैं
जिनकी किस्मत मे
होता है बह कर
बस सूख जाना ...........


रेवा


Monday, September 22, 2014

क्या होती है बरसात ?



क्या होती है बरसात ?
कैसी होती है ?
ये सवाल आज भी
मेरे लिए सवाल है……

सुना है इसकी बूंदें
जब तन को छूती है तो
एक सिहरन सी महसूस होती है
जैसे किसी ने हौले से प्यार
भरा स्पर्श किया हो.......

बाँहें फ़ैलाये जब
इसमे भिंगो तो
ऐसा लगता है जैसे
किसी ने प्यार से
बाँहों मे भर लिया हो......

जब लटों से
हवाएँ अठखेलियाँ करती हैं
तो लगता है जैसे
किसी ने गिले बालों को
अपनी उँगलियों से
सहलाया हो.......

पर ये सब मैं
महसूस नही कर पाती क्यूंकि
आज भी ऐसी प्यार भरी
बरसात का मैं बस इंतज़ार
ही कर रही हूँ ...........

"बादल बरसे
 प्यार फिर भी तरसे
 गीला वन-उपवन
 पर सुखा है तन -मन "

रेवा


Thursday, September 18, 2014

आज भी बचपन याद आता है !



आज भी बचपन याद आता है
मस्ती भरे दिन
अल्हड़ हर पल छीन........
बारिश मे भीगना
कीचड़ मे खेलना
वो कागज़ की नाव बनाना.......
होली मे रंग बिरंगे
गुब्बारे मारना
और छिप जाना.......
आज भी बचपन याद आता है

तड़पता है दिल
भीगती हैं आँखें
याद कर वो दिन .......
पर ये भी सच है
ये जीवन चक्र है,
मगर दिल के एक कोने
मे एक बच्चा अभी
भी रहता है ,
बहार आने को जो मचलता है
पर जब जब वो बहार
आता है
उसे फिर से ये कह कर
धकेल दिया जाता है की
"इस उम्र मे इतना बचपना
 शोभा नहीं देता है"
 पर क्या करें
 आज भी बचपन याद आता है

रेवा



Saturday, August 23, 2014

जुड़ाव


वो जो ऊपर बैठा है न
जाने कैसे कैसे खेल रचता है ......
अचानक किस-किस से मिला
देता है ,
जीवन यूँ भी तो जीते रहते थे हम
उतार चढ़ाव सहते रहते थे हम
पर जाने क्यों
कभी किसी ऐसे
इंसान से मिला देता है की
लगता है आज तक कैसे
जी रहे थे हम ,
उसके साथ की तब
हर मोड़ पर जरूरत
महसूस होने लगती है,
समझ ही नहीं आता
इतने दिनों कैसे संभाल
रहे थे हम ,
चाह कर भी उस इंसान से
दुरी नहीं बना पाते,
शायद जुड़ाव सिर्फ
जरूरत से नहीं
बल्कि एहसासों से
कर लेते हैं हम .............

"दिल की ये कैसी हसरत हो गयी
तेरी मुझे ये कैसी आदत हो गयी
यूँ मिलने को तो मिल जाते हैं कई लोग
पर तू रूह से जुड़ा है
तुझसे मुझे मुहब्बत हो गयी "

रेवा

Wednesday, August 6, 2014

सीली यादें



आहा !
प्यार भरी वो बारिश
सदा याद रहेगी मुझ को
जी भरकर भीगे थे हम
हर लम्हा हर पल
जीया था हमने
इन्द्रधनुषी सपने जैसा

पर बरसात के मौसम की तरह
तुम भी अब गुम हो गए हो कहीं
कई मौसम आये गए
पर तुम न आये
अब तो बस
रह गयी है
कुछ सीली यादें

अलमारियों में
बंद तुम्हारे खतों में अब
फफूँद लग गयी है
जिसे हर बरसात के
बाद साफ़ कर धूप में
रख देती हूँ ...

दिल की दीवारों से भी अब
पपड़ी बन झड़ने लगी है
तुम्हारी यादें और
धब्बे नज़र आने लगे हैं

मैंने सोचा उन पर
वास्तविकता
का रंग लगा दूँ
पर दोबारा उन पर
कोई भी रंग
क्यों न चढ़ा लो
वो अपने होने का एहसास
करवा ही देते हैं.…

और किसी न किसी
रूप में बनी रहती
हैं ये यादें

रेवा