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Monday, March 12, 2018

भटकन



इश्क पाने की चाह में
भटकते भटकते
खो सी गयी हूँ
एक उम्मीद दिखती है
पर वो राह नहीं होती
वो तो गली होती है
जो निकलती है
एक और गली में
उनमें चलते चलते
उलझ सी गयी हूँ,
अब तो
डरने लगी हूँ खुद से
अपना आप
बोझ लगने लगा है...

जानती हूँ इश्क तो
खुद से करना चाहिए
अपने अन्दर ही तो है
समाहित है ये ज़ज्बा
कस्तूरी की तरह
पर ये किताबी बातें
लगती हैं
मैं चाँद की चांदनी
बन्ने की ख्वाहिश रखती हूँ
जैसे उन दोनों का
एक दूजे के बिना
कोई वजूद नहीं
एक दूजे के पूरक हैं वो
बस वैसे ही तो चाहती हूँ
मैं भी
पर वो मुमकिन होता नहीं 
और मैं इश्क पाने की चाह में
भटकते भटकते
ख़ुद से बेज़ार 
अपनी रूह को भूल 
बस लिबास बन 
फिर रही हूं !!

रेवा



Wednesday, March 7, 2018

रेगिस्तान


जीवन के रेगिस्तान में
मैं ऊंटनी बन भटकती रही
हसीन लम्हे
काटों संग फूलों जैसे मिले
उन्हें जब
कैद करना चाहा
तो वो रेत के मानिंद
फिसल गए हाथों से ....

जब रिश्तों की प्यास
से गला सूखा और प्यार
ढूंढा तब सिर्फ और
सिर्फ भ्रम हाथ लगा ....
और तब काम आया खुद की
जेब में भरा दोस्तों का प्यार ...
तपती रेत पर चलते हुए
धूप में एक साया
नज़र आया
लेकिन
जितना उसके पास जाती
वो और दूर हो जाता ,
उसके पास जाने की
कोशिश में
सूर्य की किरणों और
रेत से झगड़ कर मीलों
आगे निकल आयी
पर न वो मिला न उसकी
परछाई
वो भी रेगिस्तानी मृगतृष्णा निकला।

रेवा