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Saturday, June 30, 2018

नज़रें



नज़रें  कितना कुछ बयां करती हैं
कितने एहसास भरे रहते हैं उनमें
कुछ  एहसासों को शब्दों में
लिखने की एक कोशिश


विरहन 
जब अपने प्रियतम
के आने की खबर पा कर
उसके पास जाती है
और उसे नज़र भर देखती है

प्यार 
जब पति पत्नी के
कंधे पर प्यार से हाथ
रखता है और पत्नी
उसे निहारती है

व्यथा 
जब एक विधवा
दूसरी को देखती है
अपने जैसे दुःख से
गुजरते हुए

ममता
माँ रोती भी है
हंसती भी है
जब बेटी दुल्हन
बनती है

संतुष्टि 
जब अपने भूखे बच्चे को
खाना खाते हुए
माँ देखती है

बचपना 
बरसात को देख
भीगते उछलते
बड़ी उम्र के लोगों की
शरारती नज़रें

तृप्ति 
भूखे की थाली में
भोजन और प्यासे
को पानी
वो तृप्ति भरी नज़र

कुटिल
ये सबसे पहले
नज़रें बता देती हैं
शब्द और कार्य
देखने की जरूरत
ही नहीं पड़ती .......


रेवा

Friday, June 29, 2018

गुड़िया


छोटी सी गुड़िया थी तू
जब भगवान ने तूझे मेरी
झोली में डाला था..

पूरे घर में
उछलते कुदते
मिठी मिठी बातें करते
नखरे दिखाते
कब बड़ी हो
मेरी प्यारी सखी बन गयी
पता ही नहीं चला

मेरे हर फैसले में
मेरा साथ देने लगी
बिलकुल मेरी छाया
बन कर
पर तब सोचा नहीं
एक दिन तूझे
ये घर छोड़
पीया के घर जाना होगा
या सोचना चाहती नहीं थी

पर अब जब ये घड़ी
सामने है
तो दिल का कोना
रोज थोड़ा थोड़ा
खाली हो जाता है
आंखे रोज़ बरसती हैं
लेकिन मन बार बार
यही कहता है
जा रही है तू करने नयी ज़िन्दगी की शुरुआत
मिले तूझे प्यारे लम्हों की सौगात
पीया का सदा रहे तेरे हाथों में हाथ
होती रहे हमेशा ख़ुशियों की बरसात

रेवा

Thursday, June 28, 2018

त्याग की देवी





हम आम औरतें हैं
त्याग की देवी नहीं....
बंद कर दो हमे
इस नाम से पुकारना

हमारे भी सपने हैं
साधारण ही सही
पर.....
सपने तो कभी
साधारण नहीं होते
कभी छोटे या बड़े नहीं होते.....
सपने सपने होते हैं
जो हमेशा ही ख़ास होते हैं  ....

हम तुम में से किसी से
कुछ नहीं मांगती
जो और जितना हमारे नसीब में है
वो हमे मिल कर ही रहेगा....
गर न मिला तो शिकायत
बस ख़ुद से ही है
ख़ुद में ही कोई कमी
रही होगी ....

इसलिए हम त्याग बिलकुल
नहीं करतीं
जो समय की मांग है
जैसी परिस्थितीयाँ होती है
ख़ुद को उनके अनुरूप
ढालना ही समझदारी है
तो वहीँ करने की
कोशिश रहती है

विपरीत समय सब पर आता है
उस समय
हम औरतें
सहनशक्ति रखते हुए
हँस कर सब झेल जातीं हैं
और सबको हिम्मत भी देती हैं
दुःख हमे भी होता है
जैसे सबको होता है
टूटता भी है मन
पर हिम्मत बरकरार
रखती हैं हम

बस इल्तिज़ा इतनी है
त्याग की देवी की उपाधि
न दी जाए हमें.......


रेवा

#औरत

Wednesday, June 27, 2018

शाम


शाम को जब
दिन के तमाम
उलझनों से
फारिग होकर
छत पर टहलने
जाती हूँ तो ,
प्रकृति की छटा
देखते ही बनती है
सूरज अपने बिस्तर पर
विश्राम करने की तैयारी
में  उलझा रहता है ,
तो उधर चाँद उठने को बेताब ....
कहीं लालिमा बिखरी रहती है
तो कहीं एकदम नीला आकाश

पवन भी दिन भर
सूरज की सेवा से मुक्त हो
उन्मुक्त बहने लगता है
और पंछी घर जाने की
खुशी में कलरव
करते नज़र आते हैं
आह ! ये वातावरण मेरा
मन मोह लेता है.....
पर पता है ऐसे समय मुझे
सबसे ज़्यादा क्या याद
आता है ??
तुम ....सिर्फ तुम और
तुमसे जुड़ी तमाम शाम !!!!


रेवा 

Tuesday, June 26, 2018

हमराही



जब चाहा तुम्हारा साथ
तुम्हारे कंधे से कंधा
मिला कर चलना ,
तुम्हे अपना सबसे
प्यारा हमराही और
दोस्त बनाना
तब तुमने
छिटक दिया मेरा हाथ
साथ तो क्या
प्यार के दो बोल
भी मय्यसर न हुए,
अब जब ठोकरें खा कर
मैंने चलना सीख लिया
तो अचानक तुम्हे
एहसास हुआ की
मुझे तुम्हारी जरूरत है
और तुम्हे मेरी
पर अब आदत रह नहीं गयी
हाथ थाम कर चलने की.....
अब फिर से ख़ुद को
बदलना बस में नही मेरे ,
फिर भी साथ तो
चलना है
आखिर जीवन साथी जो हो
तो चलो
एक समझौता करते हैं
मैं तुमसे तुम्हारी बेरुखी
छीन लेती हूँ
और तुम मुझसे मेरा
प्यार मांग लेना
फिर जीवन मैं और तुम
से इतर  "हमारा" हो जाएगा !!!

रेवा 

Monday, June 25, 2018

स्वार्थी




आज मैंने तुम्हें
तुम से मिलाने की
एक और कोशिश करी
इस कोशिश में लगा ......

जबसे मैंने तुम्हें जाना है
तुम्हें दूसरों के लिए ही
जीते देखा है
माँ , बाप , बीवी , बच्चे
भाई ,बहन
चलो माना ये दूसरे नहीं हैँ
पर इनमे कहीं तो तुम्हारा भी
एक कोना होना चाहिए न
ऐसे जीते जीते तुम एकदम
अलग थलग बिल्कुल अकेले
हो गए
बस काम और घर
बोलना भी कम कर दिया
सबकी जरूरतें पूरी करते रहे
ख़ुद को दरकिनार कर
ये भी अच्छी बात है
पर ये क्यों भूल जाते हो
अपने लिए सिर्फ तुम जवाबदेह हो
सुनो.....
एक बात मानोगे मेरी
थोड़े से स्वार्थी बन जाओ
ख़ुद के लिए जीयो
ख़ुद को गले लगाओ
ख़ुद प्यार करो
अपने मन पसंद काम करो
फिर देखो दुनिया कितनी
सुंदर लगेगी तुम्हें......


रेवा 

Friday, June 22, 2018

दरवाज़े




कई दरवाज़े हैं
मेरे मन के अन्दर
जिन पर ताला तो है
पर उनकी चाबियाँ भी
मेरे ही पास है
हर दरवाज़े को
रोज़ खोल कर
छोड़ देती हूँ
ताकि ताज़ी हवा
जाती रहे

ऐसा करते समय मैं झांक
लेती हूँ उनके अन्दर
हर दरवाज़े के पीछे मेरे
घर के सदस्यों के
दुःख दर्द
उनकी ख्वाहिशें
छिपी होती हैं
जो झांकते ही मेरी
हो जाती है

मैं जागती हूँ तो दिन भर
मेरे साथ चलती हैं
मैं सोती हूँ तो
मेरा अवचेतन मन उसी के
बारे में सोचता रहता है

सुबह उठते ही
मैं अपने आप को
प्रभु का नाम बुदबुदाते
हुए पाती हूँ
ताकि दूर हो जाए
उन सबके दुःख दर्द
और पूरी हो सके उनकी
तमाम ख्वाहिशें !!!

रेवा



Thursday, June 21, 2018

कविता



मैं रोज़
पढ़ती हूँ कविता
कई बार कुछ ऐसा पढ़ती हूँ
जो मन को झकझोर देता है,
द्रवित कर देता है
कई बार आक्रोश से
भर देता है
कभी कभी बेअसर भी
होती हैं कविताएं

लिखती भी हूँ हर रोज़
प्रेम, विरह
धरती, आकाश
समुद्र, नदी
भूख, गरीबी
सहनशक्ति और
न जाने क्या क्या
लेकिन सोचती  हूँ
क्या मेरी कविताएं
कुछ दे पाती है किसी को ???

क्या ये बेरोज़गार को रोज़गार
बेघर को घर
भूखे को रोटी 
प्यासे को पानी
न उम्मीदों को उम्मीद
मज़लूमों को इंसाफ 
विरहन को प्यार
दे पाती हैं ????

इनमें से  कुछ भी तो नहीं
दे पाती मेरी कविताएं
पर फिर भी मैं रोज़ आती हूँ
इनके पास
रोज़ पढ़ती हूँ
रोज़ लिखती  हूँ
क्योंकी प्यार है मुझे
कागज़ और कलम से
विशवास है मुझे
ये कविताएं कहीं किसी को
कुछ सुकून के पल तो दे ही पाती हैं
कहीं किसी का ज़मीर भी
जगा जातीं हैं 
किसी को सोचने पर मजबूर 
कर देती हैं 
और आने वाली नस्लों को
हमारे जीवन से मिलवाती हैं
इसलिए हे कवि/ कवियत्री
तुम ज़रूर लिखो कविताएं।


रेवा 


Wednesday, June 20, 2018

अंतर्यामी




तुम तो अंतर्यामी हो ना
सब जानते समझते हो
रोज़ तुम्हारी पूजा करते हैं सब
तुमसे सलामती की दुआ मांगते हैं
अपने परिवार की सुरक्षा
उनकी सेहत उनकी ख़ुशियाँ मांगते हैं

मैं भी ऐसा ही तो करती हूँ,
बचपन से
जबसे माँ ने सिखाया की
किसी और से कुछ नहीं मांगना
सिवा तुम्हारे
तुम ही हमारे माता पिता हो
तुमसे मांगने में कैसी शर्म

पर अब तो लगता है
तुम भी सुनते नहीं
सब यही बोलते हैं कर्म करो
ऐसा नहीं की कर्म नहीं करती
पर सुनवाई नहीं होती
तुम्हारे दरबार में

तुम्हारे ठेकेदारों के भी
पाँव पड़ती हूँ की
शायद वो मेरी सिफारिश
कर दें तुमसे
तुम मेरी न सही
तो उनकी ही सुन लो

पर लगता है तुम भी घबरा
गए हो इतने मांगने वालों से
किस किस की सुनोगे
तो चलो आज से मैं
नहीं मांगती कुछ भी

जब अंतर्यामी हो ही
तो जानते ही हो सब
तुम ज़िद्दी भी हो
तो तुम्हारी सृजन
यानि मैं भी ज़िद्दी
देखते हैं तुम्हारे दरबार में
इन्साफ़ के क्या पैमाने हैं ??

रेवा











Tuesday, June 19, 2018

किताबें




जब मन दर्द से भरा हो
तब सांस भी कांच के
टुकड़ों से चुभते हैं ......
काजल भी बग़ावत
पर उतर आते हैं
आंसुओं को
रोकने में असमर्थ ....
वैसलीन के बावजूद
होंठ सूख जातें हैं और
मुस्कुराने से इनकार करते हैं
गाने के बोल
कानों में ज़हर घोलते हैं ....
ऐसे मे कभी कभी
संतुष्टि दे जाती है किताबें
जिसे पढ़ कर जब
सीने पर रखो तो
लगता है
ये सारा दुख
खुद मे समा रहीं है
और भर रही हैं
हृदय में शब्द दर शब्द
सुकूं !!!

रेवा 

Monday, June 18, 2018

पहली बरसात


याद है आज भी मुझे 
वो पहली बरसात
जो मेरे जीवन की
पहली बौछार नहीं थी
पर फिर भी खास थी
तुमने पूछा था उस दिन
सुनो, कभी भीगी हो
बारिश में ??
मैंने कहा नहीं
मुझे पसंद नहीं
तुमने कहा,
अरे
बूंदों से किस बात का बैर
आसमान से बरसते प्यार
में भीग कर तो देखो
बूंदों से प्यार न हो जाये
तो कहना
जाने क्यों पर
बात मान ली तुम्हारी
खूब भीगी थी उस दिन
तन तो भीगना ही था
पर उस दिन की
बरसात में मन भी
भीग गया !!!

रेवा

Saturday, June 16, 2018

चट्टान




जब जीवन में 
आता है
मुश्किलों का
भारी चट्टान
तब
मनोबल कमज़ोर
हो जाता है
मन टूट जाता है
दिमाग फटने लगता है
विश्वास
डगमगाने लगता है
उनके टूटने, फटने और
कमज़ोर होने को
महसूसो
तभी तो पता चलेगा
वो हैं तुम्हारे अंदर
मौजूद अभी भी
ऐसा करो 
एक नई चट्टान बनाओ
आत्मविश्वास की 
उसमे मनोबल का लेप लगाओ
फिर देखो
कैसे मुश्किलों का हल
निकलता है !!


रेवा 

Friday, June 15, 2018

योगी




ऐसा क्यों महसूस होता है की
मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है
वो तुम ही थे न
जो रोज़ ख़्वाबों में आकर
मेरे दिल की सफ़ाई कर
प्यार का दीप जला जाते थे
कई बार तुम्हें रोकना चाहा
पर तुम वो योगी थे
जो चाहते थे कि मेरा प्यार में
विशवास बना रहे
इसलिए अलख जागते रहे
लेकिन बदले में कभी कुछ भी न चाहा
पर बिना चाहे ही
तुम्हारे सांसों की खुश्बू
बस गयी है मेरे सांसों में
तेरे दिल की गुफा में अब मैं
आराम करना चाहती हूं
ओ मेरे योगी ख़्वाबों से इतर
हकीक़त बन कर आओगे न !!!!

रेवा

Wednesday, June 13, 2018

तुम में तुम्हें



तुम कभी नहीं
जान सकते
तुम में तुम्हें
कितना ढूंढती हूँ मैं
तुम तो जैसे
खो से गए हो
खुद में

रोज़ तुम्हें
समझाते जीवन के
मायने बताते
तुम्हें तुम से वापस
मिलाने की कोशिश में
मैं, मैं रह नहीं गयी
ये सारी कोशिशें .......
जीवन जीने की जंग
सब अपनी जगह सही है

पर कभी कभी मेरा
मैं तुम्हारे तुम से
मिलना चाहता है
और करना चाहता है
अनगिनत बातें
बातें प्यार की
बातें मेरी और तुम्हारी
आँखों में आँखें डाले
देखना चाहता है
सिर्फ तुम्हें
बांहों में बांहें डाले
महसूस करना चाहता है
सिर्फ तुम्हें

मैं नहीं चाहती यूँ ही
दुनिया से रुखसत होना
जीना चाहती हूँ बार बार
और मरना भी चाहती हूँ
बार बारे
पर तेरे साथ तेरी बांहों में !!!

रेवा



Tuesday, June 12, 2018

तुम्हारी कविता



एक दिन यूँ ही 
अलसायी सी 
दोपहर में 
तुम्हारी कविताओं की 
किताब हाथ में आ गयी 
जिसमे तुमने लिखी थी 
मेरी ये सबसे पसंदीदा 
कविता 

बारिश की सौंधी ख़ुश्बू
तुम्हे  किसी भी 
इत्र से ज्यादा पसंद थी ,
घंटों बैठ मेरे साथ 
बरसात को निहारा करती थी 
पानी का धरती पर 
गिरना और फिर 
उसी मे मिल जाना
तुम्हें  फिलोस्फिकल लगता,

टप टप पत्तों से झरते
मोती से
अपनी अंजुरी भर
मुझ पर लुटाती ,
तो कभी अपने बालों को
गीला कर
मेरे एहसासों को भिगो देती ,

कभी यूँही
मेरे कंधे पर सर रख
अनगिनत बातें करती .....
पर अब न तुम हो
न मेरे शहर में वो बरसात ....
काश ! वो बरसात
लौट आये
काश ! तुम फिर
अपनी कागज़ की
कश्ती में कहीं से आ जाओ
और भिगा दो मेरे
सुप्त एहसासों को !!!

रेवा

Monday, June 11, 2018

प्यारी सी बच्ची



कभी कभी
मैं सोचती हूँ
उस प्यारी सी
बच्ची की बारे में
जिससे मिली थी
कुछ महीनों पहले

जो रहती है
एक कसबे में
जो ज्यादा पिछड़ा
नहीं है ,
जहाँ बात
करने के लिए
मोबाइल उपलब्ध है
और इन्टरनेट भी है
पर लड़कियों को इन्टरनेट जैसी
सुविधाओं से दूर रखा जाता है

अपने समाज को
लेकर सजग
पर समाज की वजह से
न मिलने वाली
सुविधाओं के प्रति
आक्रोशित थी

उसकी आँखों में
जुनून सा तारी था
कुछ कर गुजरने की ललक थी
साथ ही अपने को
औरों के बराबर
खड़ा करने की चाह थी
सपने छोटे
पर बहुत सारे थे
जिनसे वो बिलकुल
समझौता नहीं
करना चाहती थी

उसे मैं
आज तक नहीं भूल पाई
और भूलना चाहती भी नहीं
क्योंकि उसकी आंखें
उसकी बातें
और लड़ने का जुनून
मुझे उम्मीद की किरणों
से मुलाकात करवाती है!!

रेवा


Saturday, June 9, 2018

प्रकृति


जानते हो 
प्रकृति कभी बूढ़ी
नहीं होती
झुर्रियां नहीं आती चेहरे पर
अंग बेकार या शिथिल नहीं
होते इसके
साल दर साल बीतते जाते हैं
पीढ़ियाँ बदलती जातीं हैं
पर वो वैसी ही रहती है
लेकिन हम ठहरे मनुष्य
हमे दिमाग से नवाजा है
ख़ुदा ने
तो हर जगह दखलंदाज़ी
करना भी ज़रूरी है
हमने शुरू कर दी
प्रकृति से छेड़ छाड़
शुरू शुरू में तो एक आध
फोड़े फुंसी ही निकले
पर हमें समझ नहीं आया
जिसका नतीजा ये निकला की
धीरे धीरे
प्रकृति सच में बूढ़ी होने लगी
उसके अंग बीमार हो गए
नदियों का पानी सूख ने लगा
पेड़ो की जगह
कंक्रीट नज़र आने लगे
हवा में कारख़ानों का ज़हर
घुलने लगा
खाद् कीटनाशक और
प्लास्टिक की वजह से
मिट्टी ज़हरीली होने लगी
कहीं नहीं छोड़ा हमने प्रकृति को
अब हाल ये है की
वो दिन दूर नहीं जब
प्रकृति जर्जर होकर सच में
मर जाएगी !!

रेवा 

Friday, June 8, 2018

सुनो...




सुनो...
खड़ी हूँ मैं
बाहें फैलाए
तुम्हे अपने आगोश में 
समाने की ज़िद लिए....

रेवा

Thursday, June 7, 2018



मुश्किलों से हार नहीं मानती मैं
लड़ने को हमेशा तैयार हूँ
ये नहीं बोलती की आँसू नहीं आएंगे
पर उन्हें राहों को रौशन करने वाले
दीये बना कर हम आगे बढ़ते जाएंगे !!

रेवा