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Thursday, October 22, 2020

ताउम्र




मैं तो नहीं रहने वाली ताउम्र यहां 
आप 
क्या आप रहने वाले हैं
हमेशा के लिए यहां
नहीं ना
तो फिर इतनी चिंता किस
बात की
अरे खुल कर जियो
मौज में रहो

चार पैसे कम कमा लोगे
तो कुछ न बिगड़ेगा
कौन सा साथ लेकर
जाना है
जितनी जरूरत है उतना
कमाओ
मशहूर न हुए न सही
ऊपर कोई नहीं पूछने वाला

लेकिन सोचो
इन सब की वजह से
अगर ज़िन्दगी न जिया
तो वो न मिलने की दोबारा
ये बस इसी बार है
तो जी लो खुल कर
प्यार करो दिल भर कर
दोस्त बनाओ जी भर कर
मस्ती करो
और चैन से रहो
क्योंकि तुम हमेशा
नहीं रहने वाले यहां


#रेवा


Friday, August 28, 2020

ओहदा



मुझे मलाल है की 
मैं बुलंदियों को छू ना पाई
पर ये तस्सली भी है
कि जितना कुछ
हासिल किया अपने दम
पर हासिल किया
कभी किसी का सीढ़ी
की तरह इस्तेमाल नहीं किया

मैं जानती हूँ 
मैं जहाँ हूँ वहां पहुँचना
दूसरों की लिए   
चुटकियों की बात होगी 

पर मैं संतुष्ट हूँ ख़ुद से
और यही संतुष्टि हर किसी के
बस की बात नहीं

आपका ओहदा आपकी बुलंदी
आपको बहुत मुबारक
मेरी संतुष्टि मुझे प्यारी है 
हाँ एक बात और कहना चाहती हूँ
मुझसे जब भी मिलें
अपने ओहदे की पैरहन
उतार के मिले
क्योंकि मैं मुलाकात
इन्सान से करना पसंद करती हूँ 
ओहदे से नहीं 

#रेवा 

Tuesday, June 16, 2020

limelight


ये लाइट ऐसी वैसी नहीं है
बहुत चमकदार है
जो भी इसके पास आता है
वो चमक जाता है
सूरज की रौशनी
की तरह
और अपनी एक पहचान
बना लेता है

इस लाइट के और भी
कई गुण हैं
ये धीरे धीरे
ज़मीन से उठा कर
आसमान पर बैठा देता है
इंसान खुद को भगवान तो नहीं
पर ऊँचे सिंहासन पर
बैठा हुआ महसूस करता है

कभी जो नज़रे पड़े उन पर तो
उनका चमकता पर
इतराता हुआ चेहरा
साफ दिख जाता है
लेकिन हो भी क्यों न
मेहनत भी तो की है
यहां तक पहुंचने में....

अब ज़मीन से ऊपर उठ गए हैं
तो ज़ाहिर है नीचे की चीज़ें
मुश्किल से दिखाई देंगी
और इस वजह से
इनका सारी ज़मीनी हकीकतों से
नाता टूट जाता है

अब गर आसमान में रहना है
तो इतनी सी कीमत तो
देनी ही पड़ेगी !!

दुःख की एक बात और है
ये समय के साथ अकेले हो जाते हैं
दोस्तों और सच से दूर,
मुखौटा लगाना इनकी
जरूरत बन जाती है

पर मुखौटा लगाते लगाते उसी
में रहने की आदत हो जाती है
और फिर लोग भी उन्हे वैसे ही
मिलने लगते हैं,

और बाहर की लाइट
पाने की चाह में
उनके अंदर की रौशनी कम होने
लगती है

ये कहना गलत न होगा की 
ये हमेशा मुस्कुराहट सजा कर
दुःख की पहरन पहन कर
जीते रहते हैं
और कभी कभी थक कर
खुद से आज़ाद
हो जाते हैं!!!


#रेवा

Sunday, June 14, 2020

दोपहर





बहुत दिन बाद
आज दोपहर में 
कुछ सुकून के लम्हों से
मुलाकात हुई,
खुद में सिमटी
अधलेटी सी पड़ी थी मैं,
बाहर बरसात अपने
पूरे जोश में 
बरस रही थी,

मेरे पास ही फ़ोन पर
गुलज़ार साहब के
लिखे गाने चल रहे थे,

मेरा मन न जाने क्यों
अजीब सा हो रहा था,
ऐसा जैसे मैं कहीं
डूब रही हूँ

ग़म तो कुछ भी नहीं
फिर भी जाने क्यों ????
समझ ही नहीं आया ....
अनायास ही एक बूँद
मेरे गालों को गीला
कर गयी

और मैं तेरी याद में 
बुरी तरह भीग गयी,
पर जानते हो....
खुद को सुखाने का
बिलकुल मन था,
लग रहा था
बरसात यूँ ही होती रहे
और मैं यूं ही भीगती रहूँ !!!

रेवा







Friday, June 5, 2020

पेड़ और प्रकृति






बीज की कोख़
में रहते हैं
तमाम पेड़ पौधे
जब बड़े होते है 
परिवार बढ़ता है उनका
फूल,पत्ते, टहनियाँ,फल...... 
जब फूल,फल इनसे
अलग होते हैं
ये हमसे कुछ बोलते नहीं
बल्कि खुशी खुशी
हमे दे देते  हैं

जब पत्ते पीले होकर
झड़ जाते हैं
तब भी चुप रहते हैं...
इन्हे आस होती है
कि नए फूल पत्ते
फिर खिलेंगे

पर जब हम इन
पेड़ों को ही काट
देते हैं
तब इंतक़ाम लेते हैं
पेड़ों के जन्म दाता
यानी ये प्रकृति

जो हम झेलते हैं
तूफान, बाढ़, सूखा
मौसम में अचानक बदलाव
और अनेक बिमारियों के
रूप में ...

क्या अच्छा न हो की
हम सजग हो जाएं
अपनी प्रकृति
और अपने इन जीवनदायिनी
बंधुओं का ख्याल रखे ...

रेवा


Tuesday, June 2, 2020

टैग



चुप खड़े रह कर जब सिर्फ हाँ में 
सर हिलाया तो सबको खूब 
पसंद आया 
दौड़ दौड़ कर सारे घर का काम 
निबटाया तो सबको खूब 
पसंद आया 
सज धज कर हर अनुष्ठान में 
सम्मिलित हुई तो सबको 
बहुत पसंद आया 
हर तरफ से अपना मन मार कर जब तक 
जिंदगी जीती रही औरों के लिए 
सबको खूब पसंद आया 
"अच्छी बहू" का टैग भी लगाया

आधी से ज्यादा जिंदगी बिता कर 
जब ख़ुद के लिए जीने की चाह जगी 
तो किसी को अच्छा नहीं लगा 

जब चुप ने शब्दों का साथ देना शुरू 
किया, खुद के लिए बोलना शुरू किया 
तो किसी को अच्छा न लगा 

जहां मन ने कहा हाँ वहां जाना 
जहां मन ने कहा न वहां नहीं जाना 
नहीं गई
तो किसी को अच्छा न लगा

जब औरत मन की करने लगे 
ख़ुद के लिए जीने लगे वो बोलने लगे 
अरे नहीं (जवाब ) देने लगे 
तो वो अच्छी रह नहीं जाती 

और तब उसे अच्छाई के 
सिंहासन से 
उतार कर एक और टैग से 
नवाज़ा जाता है 
आज के जमाने की "बिगड़ी बहू"

Thursday, May 28, 2020

हमारे सच्चे दोस्त




ये पौधे हैं न 
कभी भेद भाव नहीं करते 
पानी नाराज़गी से 
डालो या प्यार से 
ये अपनी पत्तियों के हरेपन 
और फूलों की खिलखिलाहट से 
मन खुश कर ही देते हैं 

ये चाँद है जो हर रात 
नज़र आता है आसमान पर 
और कभी कभी 
दिख जाता है खिड़की से भी 
ये हमारे मिज़ाज़ को नज़रअंदाज़ कर देता है 
दिन चाहे जैसा भी बिता हो 
ये हर रोज़ अपनी चांदनी की ठंडक 
भेज थपकी दे के कर सुला देता है 

ये कागज़ और कलम हमेशा साथ देते हैं 
जब मन दुखी हो तो दुख बयां कर देते हैं 
जब खुश हो तो ये अक्षर 
हँस कर खुशी भी बयान कर देते हैं
ये अपेक्षाएं नहीं रखते 
जज तो बिल्कुल भी नहीं करते 
न कोई वाओ फैक्टर ढूढते हैं 
हम जैसे हैं हमें वैसे ही स्वीकार 
कर हमेशा मान देते हुए 
एक सच्चे दोस्त का फर्ज 
बाखुबी निभाते हैं 

आज इस कविता के जरिये मैं हमारे 
इन सच्चे दोस्तों को धन्यवाद देती हूँ