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Thursday, January 18, 2018

जहां इश्क वहां अमृता


जितना अमृता को 
पढ़ती हूँ उन्हे और
करीब से जानने का
मौका मिलता है
उनके और इमरोज़
के प्यार और एहसास को
पढ़ कर मेरी रूह
सिहर जाती है
आंखें भीग जाती है
इतना प्यार कैसे हो सकता है ?
मुमकिन नही न
पर है तो ऐसा ही
अमृता की मुस्कान
इमरोज़ की जान
अमृता का अगले जन्म का वादा
इमरोज़ का सच्चा इरादा
अमृता की आदत
इमरोज़ की इबादत
अमृता के नज़्म
इमरोज़ के रंग
और दोनों ही एक संग
ये सब कितना अदभुत है न ....
पर क्या इश्क मर सकता है
खत्म हो सकता है दुनिया से
नहीं न
गर इश्क नहीं तो दुनिया नहीं
तब जो खुद इश्क हैं
वो कैसे जा सकती है कहीं
वो यहीं है हम सब के बीच
जहां इश्क वहां अमृता
और वहीं इमरोज़ भी !!

रेवा 

Saturday, January 13, 2018

सिन्ड्रेला और बचपन




कल टेलीविज़न पर 
बिटिया सिंड्रेला देख रही थी
तो याद आया मुझे
बचपन में हमने भी पढ़ी थी
सिंड्रेला की कहानी
और खो गए थे सपनों में
ये सोच कर ख़ुश हो गए थे की
हमे भी परी माँ मिलेगी
फिर वो कुछ ऐसा करेंगी की
बिल्कुल सिंड्रेला के
जैसे राजकुमार से
हमारी भी मुलाकात होगी
उसके जैसे अच्छे कपड़े
और कांच के जूते होंगे
हमारे पास ,
पर आजकल हमने
बच्चों को बहुत
तर्कसंगत और व्यवहारिक
बना दिया है
गुड टच बैड टच जैसी
बातों में फंसा दिया है
जो समय की मांग भी है ,
पर बच्चों के सपने
उनकी बचकानी
बातें , ख्वाहिशें
उनसे छीन ली हैं
यहां तक कि वो किसी
अजनबी से बात भी नहीं
कर सकते
क्या पता कौन क्या कर दे ??
दुनिया चाहे बहुत आगे
निकल गयी है
पर हमारे बच्चे और
उनका बचपना
खत्म हो गया है

Thursday, January 4, 2018

अभिनय






अभिनय ??
न तो !!
कभी सीखा नही मैंने
पर हर रोज़ इसकी जरूरत
महसूस होती है
सबके साथ
क्या घरवाले क्या बाहर वाले
कभी कभी तो खुद के साथ भी,
चाहती कुछ हूँ
करती कुछ हूँ और
बोलती कुछ हूँ
कई बार मन बिल्कुल
नहीं मानना चाहता
आये दिन के समझौतों को,
पर उसका तो कत्ल
मैंने बहुत पहले ही कर दिया है न
अब तो वो बस दफ़न पड़ा है
मेरे शरीर में
और इसलिए
दख़ल नही दे पाता
किसी भी मेरे फैसलों में ,
लेकिन .....
उम्र के इस पड़ाव पर
थक सी गयी हूँ
अभिनय करते करते
अब तो
मुझे मुझ सी ही रहना है
तुम्हे तुम्हें तुम्हें मैं
पसंद हूँ तो ठीक नहीं हूँ
तो कोई  बात नहीं
कम से कम मेरा मन
अब गहरी नींद से जाग
ज़िन्दा तो हो सकेगा
और तब ज़िन्दा महसूस
करुँगी मैं भी !!!

Tuesday, November 7, 2017

स्टोरी मिरर (वेबसाइट)



हम सब अपनी लेखनी के द्वारा
मन में उठते भावों को एहसासों को
पन्नों में उतारने की कोशिश करते हैं ,
हममे से कोई कविता द्वारा
अपने भावों को व्यक्त करता है तो कोई
लघु कथा और कहानियों द्वारा।
तो फिर देर किस बात की
आइये और जुड़िये
हमारे साथ story mirror web portal से
जहाँ आप पढ़ सकते हैं
लिख सकते हैं और यही नहीं
इस पोर्टल पर हिन्दी के साथ अनेक भाषाएँ हैं

मैं आप सबकी सुविधा के लिए यहाँ
पोर्टल का लिंक शेयर कर रही हूँ।

https://storymirror.com/

धन्यवाद





Wednesday, September 27, 2017

आदतें

शुरू से मुझे
चुप रहने की
आदत सी थी
पर तुमने
बोल बोल कर
खुद को
मेरी आदत बना ली ,
लफ़्ज़ों को एहसासों  के
धागे में पिरो कर
सुकूँ की चादर
बुन दी ,
हर रोज़ वो जो
खिड़की से
दिखता है न
मेरा एक टुकड़ा चाँद
उसकी चांदनी की चमक
मेरे चेहरे पर सजा दी ,
चुप रहने वाली को
तुमने हंसना बोलना
गुनगुना सीखा दिया ,
पर
मैंने अकसर सुना है की 
आदतें बदलनी
पड़ती हैं !!!!!


रेवा

Tuesday, September 26, 2017

हिदायत




धुप की ऊँगली थामे
भटकते रहे मेरे
खयाल ,
शाम की सर्द
हवाओं में भी
उलझे रहे हर सवाल ,
पर
रात ने हौले से
सितारों को टांक
आसमान की चादर ओढ़ा दी ,
सपनो के नर्म बिस्तर पर
मुझे थपकियां दे
चांदनी ने लोरी सुनाई ,
ज़िन्दगी इसी का नाम है
पगली
सुबह हर हाल मे तेरे आंगन
को रौशन करेगी
ये हिदायत फिर मुझे उस
चाँद ने दी  !!!


रेवा 

Monday, September 18, 2017

एक सोच

मैंने अभी कुछ दिनों से फेसबुक से थोड़ी सी दूरी बना ली है ......फेसबुक भी मुझे न्यूज़ चैनल्स की तरह अनर्गल  विलाप करता सा प्रतीत होता है , कभी सरकार की बुराई कभी डेरा सच्चा की, कभी दूसरे बाबाओ की, कभी आतंकवाद की।
सार्थक पहल या बहस हम नहीं करते, जो हो गया उसको जानने के लिए समाचार ,अखबार तो है ही फिर यहाँ भी वही ? हम क्यों नहीं कुछ उपाय सुझाते हैं, या ऐसी कुछ बात जिससे हमारे आने वाले जनरेशन जो की भविष्य हैं हमारे देश के, उनको कुछ तो मिले हमसे।

उदहारण के लिए  हम अपने पर्यावरण पर बात कर सकते हैं  जो आज एक बड़ा विषय है,  जिसकी शुरुआत हम अपने घर से ही कर सकते हैं, बहुत व्यापक रूप की जरुरत नहीं।  मसलन जिनके यहाँ भी RO से पानी शुद्ध होता है उससे जो (waste water ) निकलता है और पानी बर्बाद होता है उसे कैसे काम में लाये , हम सब सब्जी लाने जाते हैं हर अलग सब्जी अलग पैकेट में लेते हैं उस प्लास्टिक पैकेट को कैसे खुद "न " बोले, एक झोले में डलवायें  और दूसरों को भी समझाए। एक घर से शुरू करें सब को बताए, वो एक मोहल्ले में फैलेगा ऐसे ही ये शहर और देश में फैलेगा, कुछ और विषय में ऐसे ही सार्थक क़दमों की बात करें।

जहाँ तक मेरा सवाल है मैंने अपनी तरफ से शुरू की है RO और प्लास्टिक पैकेट को लेकर मेरे आस - पास के लोगों से बातें। ये इसलिए यहाँ mention किया ताकि लोगों को ये न लगे ये बेकार की बक -बक कर रही है ,खुद कुछ करे तो पता चले ।

हममे से हर एक अलग अलग ग्रुप से जुड़ा है सब में ये सार्थक चर्चा हो तो हम कुछ  शुरुआत कर सकते हैं। सरकार ,न्यूज़ चैनल्स और लोगों को दोष देकर कर कुछ हासिल नहीं होने वाला।

ये मेरी सोच है ,मैंने रख दी सबके सामने।

शुक्रिया

रेवा