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Thursday, September 20, 2018

कान्हा



वो जो मेरा कान्हा है न
वो बादलों के बीच
कहीं जा बैठा है
कोई सीढ़ी उस तक
अगर जाती तो मैं रोज़
पहुँच जाती

लेकिन आज एक पगडंडी
नज़र आयी है
जब आँखें बंद कर
उसके सामने बैठती हूँ न
तो वो आता है मुझसे मिलने
मुस्कुराता है अपने
अंदाज़ में और फिर
झट जा कर छिप
जाता है बादलों की
ओट में

उसकी इसी मनोहारी
रूप को देखने मैं हर
सुबह शाम उसके
सामने जा बैठती हूँ
अपनी श्रद्धा का
अलख जगाये
और तृप्त हो जाती हूँ
उसका दर्शन पा कर.....

#रेवा 
#कान्हा 



Monday, September 17, 2018

एहसासों का ख़त


भेजा था मैंने
यादों के डाकिये
के साथ तुझे
अपने एहसासों का ख़त
पर वो बैरंग
वापस आ गया ,

यादों ने बहुत ढूंढा
हर गली हर
शहर तलाश किया
पर वो पता जो
उस ख़त पर लिखा था
वो नहीं मिला ,

लगता है तुमने अपना
घर बदल लिया है ..
पर मैं तो वहीं हूँ उसी
पुराने घर, पुराने पते पर
बदलना मेरी फितरत नहीं 
ये तो जानते ही हो न तुम 

पर लगता है 
याद रखना तुम्हारी भी
आदत नहीं
ये भी अब जान गई हूँ मैं

लेकिन कोई बात नहीं 
मेरे एहसास जो तुमसे जुड़े हैं 
उन्हें सहेज कर रख लिया है 
जो मुझे सुकून देते रहेंगे 
पर तुम अब ताउम्र 
इस सुकून से महरूम रहोगे !!!!






Sunday, September 16, 2018

हरे जिल्द वाली किताब



आज पुरानी संदूक खोली
तो हाथ आया
तुम्हारा दिया हुआ
पहला और आखरी
उपहार .....
वो हरे जिल्द वाली किताब
तुम्हें पता था न
मुझे किताबें बहुत पसंद है
तभी मुझे हैरान करने
डाक से भेजा था,

लिफाफा खोलते वक्त
ये नहीं लगा था
इसमे मेरी ज़िन्दगी
कैद है  ....
मैं बार-बार किताब
खोलती थी पढ़ने
पर हर बार
अटक जाती थी
अपने नाम पर,

वो नाम
जो तुमने रखा था
उसे छूती
उसे देख मुस्कुरा कर
सुर्ख हो जाती
और फिर किताब
बंद कर रख देती ,

घंटों ख्यालों में
खोयी रहती
जाने ऐसा क्या था
उस नाम में ??
वो नाम जो तुमने
अपने हाथों से लिखा था
और उसे छु कर
तुम्हारा प्यार
तुम्हारे हाथों का स्पर्श
तुम्हारे उँगलियों की नमी
पहुँच जाती थी
मुझ तक
जो मेरा न होकर भी
मेरा है  !!!

#रेवा
#किताब





Friday, September 14, 2018

मत जाया करो न




जानते हो
जब मैं
मायके जाती थी
तो लौटते समय
अक्सर ट्रेन में
गुलज़ार का लिखा ये गीत
गुनगुनाती थी
"दिल ढूँढता है फिर वही
फुर्सत के रात दिन  ......

उस समय ऐसा
लगता था
जैसे समय
बहुत धीरे
चल रहा है ?
ट्रेन की रफ़्तार
मद्धिम हो गयी है

तुम्हें देखने की तड़प
बढ़ने लगती
मन होता था दौड़ कर
तुम्हारे पास आ जाऊं
तुम्हारे सीने में सर छूपा कर
विरह में बिताये सारे दिन
एक ही पल में जी लूं

ये सोच कर मैं
हौले हौले मुस्कुराने
लगती
और मन ही मन
तुम्हें प्यार भरा पत्र
लिख डालती

जब घर आती तो
लगता की तुमने
हर्फ़ दर हर्फ़
मेरी सूरत में
वो सब पढ़ लिया
जो मैंने लिखा था
और तुम मुझे
अपने आगोश में
भर कर कहते
"मत जाया करो न "

मज़े की बात है
यही सुनने और
इस दूरी से
मिले प्यार को
बढ़ाने
मैं हर बार
चली जाती थी....

#रेवा






Wednesday, September 12, 2018

अंतर का दीया




मेरे अंतर में 
एक दीया सदा
प्रजवलित रहता है
जो मुझे हर ग़लती
में आगाह करता है

जो मेरी नकारत्मकता को
सकारात्मक ऊर्जा में
बदलता है

जो मेरे अंदर
मानवता की लौ को
किसी हाल में बुझने
नहीं देता

उस दीये की लौ की
ऊष्मा से मेरे सारे
दर्द वाश्प बन
उड़ जाते है

ये मुझे मेरी काया को
पढ़ने में मदद करता है 
और  मुझे प्यार की
खुश्बू से ओत प्रोत
रखता है

ये मेरे अंतर का दीया
मेरी काया का प्राण स्रोत है
जिस दिन ये काया मिट्टी
हो जाएगी 
उस दिन ये दीया
साईं तेरे दर पर जलेगा

#रेवा 
#अंतर का दिया 




Monday, September 10, 2018

मक़बरा


वो जीता है सालों से 
उसकी तस्वीरों
उसके ख्यालों और
अपने रंगों के साथ 

उसके लिए 
वो अभी भी इस 
दुनिया का हिस्सा है 

उसकी अलमारी 
उसकी किताबें 
उसकी तस्वीर 
सब जिंदा है 

वो दीवारों से भी 
उसकी बातें 
कर लिया करता है 

कमरे में अब भी 
उसकी खुश्बू 
मौज़ूद है
जो उसे रूहे सुखन
देती है 

वो घर उसकी यादों
का मक़बरा नहीं है 
जैसा की लोग 
कहते हैं
बल्कि उन दोनों
के प्यार का घोंसला है ....

#रेवा 
#इमरोज़ 
##अमृता के बाद की नज़्म 

Friday, September 7, 2018

देह की नौका



मैं अपनी देह को
बना कर नौका
जीवन रूपी
इस समुद्र को पार
करती हूँ
रास्ते में
आये तूफान को
झेलते हुए
लहरों के थपेड़ों से जूझती
और मजबूत बन जाती हूँ
कई बार
लपलपाती जीभ लिए
मगरमच्छों से भी
सामना हो जाता है मेरा
पर मैं टूटती नहीं हूँ
हारती नहीं हूँ
लड़ती हूं
लहूलहान करती हूँ
मारती हूं
और आगे बढ़ जाती हूँ
बीच में कई घाट भी आते हैं
जिनपर मैं ठहरती हूँ
विश्राम करती हूँ
और फिर निकल पड़ती हूँ
अपने लक्ष्य की ओर
लक्ष्य है
इस जीवन को जीना
और फिर
माटी में मिल जाना
जिस दिन उस माटी का
दीपक बन जलूँगी मैं
अपने उस कान्हा के सामने
समझ लूंगी मैं
मेरा जीवन सार्थक हुआ
सार्थक हुआ।
#रेवा
#देह