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Friday, June 22, 2018

दरवाज़े




कई दरवाज़े हैं
मेरे मन के अन्दर
जिन पर ताला तो है
पर उनकी चाबियाँ भी
मेरे ही पास है
हर दरवाज़े को
रोज़ खोल कर
छोड़ देती हूँ
ताकि ताज़ी हवा
जाती रहे

ऐसा करते समय मैं झांक
लेती हूँ उनके अन्दर
हर दरवाज़े के पीछे मेरे
घर के सदस्यों के
दुःख दर्द
उनकी ख्वाहिशें
छिपी होती हैं
जो झांकते ही मेरी
हो जाती है

मैं जागती हूँ तो दिन भर
मेरे साथ चलती हैं
मैं सोती हूँ तो
मेरा अवचेतन मन उसी के
बारे में सोचता रहता है

सुबह उठते ही
मैं अपने आप को
प्रभु का नाम बुदबुदाते
हुए पाती हूँ
ताकि दूर हो जाए
उन सबके दुःख दर्द
और पूरी हो सके उनकी
तमाम ख्वाहिशें !!!

रेवा



Thursday, June 21, 2018

कविता



मैं रोज़
पढ़ती हूँ कविता
कई बार कुछ ऐसा पढ़ती हूँ
जो मन को झकझोर देता है,
द्रवित कर देता है
कई बार आक्रोश से
भर देता है
कभी कभी बेअसर भी
होती हैं कविताएं

लिखती भी हूँ हर रोज़
प्रेम, विरह
धरती, आकाश
समुद्र, नदी
भूख, गरीबी
सहनशक्ति और
न जाने क्या क्या
लेकिन सोचती  हूँ
क्या मेरी कविताएं
कुछ दे पाती है किसी को ???

क्या ये बेरोज़गार को रोज़गार
बेघर को घर
भूखे को रोटी 
प्यासे को पानी
न उम्मीदों को उम्मीद
मज़लूमों को इंसाफ 
विरहन को प्यार
दे पाती हैं ????

इनमें से  कुछ भी तो नहीं
दे पाती मेरी कविताएं
पर फिर भी मैं रोज़ आती हूँ
इनके पास
रोज़ पढ़ती हूँ
रोज़ लिखती  हूँ
क्योंकी प्यार है मुझे
कागज़ और कलम से
विशवास है मुझे
ये कविताएं कहीं किसी को
कुछ सुकून के पल तो दे ही पाती हैं
कहीं किसी का ज़मीर भी
जगा जातीं हैं 
किसी को सोचने पर मजबूर 
कर देती हैं 
और आने वाली नस्लों को
हमारे जीवन से मिलवाती हैं
इसलिए हे कवि/ कवियत्री
तुम ज़रूर लिखो कविताएं।


रेवा 


Wednesday, June 20, 2018

अंतर्यामी




तुम तो अंतर्यामी हो ना
सब जानते समझते हो
रोज़ तुम्हारी पूजा करते हैं सब
तुमसे सलामती की दुआ मांगते हैं
अपने परिवार की सुरक्षा
उनकी सेहत उनकी ख़ुशियाँ मांगते हैं

मैं भी ऐसा ही तो करती हूँ,
बचपन से
जबसे माँ ने सिखाया की
किसी और से कुछ नहीं मांगना
सिवा तुम्हारे
तुम ही हमारे माता पिता हो
तुमसे मांगने में कैसी शर्म

पर अब तो लगता है
तुम भी सुनते नहीं
सब यही बोलते हैं कर्म करो
ऐसा नहीं की कर्म नहीं करती
पर सुनवाई नहीं होती
तुम्हारे दरबार में

तुम्हारे ठेकेदारों के भी
पाँव पड़ती हूँ की
शायद वो मेरी सिफारिश
कर दें तुमसे
तुम मेरी न सही
तो उनकी ही सुन लो

पर लगता है तुम भी घबरा
गए हो इतने मांगने वालों से
किस किस की सुनोगे
तो चलो आज से मैं
नहीं मांगती कुछ भी

जब अंतर्यामी हो ही
तो जानते ही हो सब
तुम ज़िद्दी भी हो
तो तुम्हारी सृजन
यानि मैं भी ज़िद्दी
देखते हैं तुम्हारे दरबार में
इन्साफ़ के क्या पैमाने हैं ??

रेवा











Tuesday, June 19, 2018

किताबें




जब मन दर्द से भरा हो
तब सांस भी कांच के
टुकड़ों से चुभते हैं ......
काजल भी बग़ावत
पर उतर आते हैं
आंसुओं को
रोकने में असमर्थ ....
वैसलीन के बावजूद
होंठ सूख जातें हैं और
मुस्कुराने से इनकार करते हैं
गाने के बोल
कानों में ज़हर घोलते हैं ....
ऐसे मे कभी कभी
संतुष्टि दे जाती है किताबें
जिसे पढ़ कर जब
सीने पर रखो तो
लगता है
ये सारा दुख
खुद मे समा रहीं है
और भर रही हैं
हृदय में शब्द दर शब्द
सुकूं !!!

रेवा 

Monday, June 18, 2018

पहली बरसात


याद है आज भी मुझे 
वो पहली बरसात
जो मेरे जीवन की
पहली बौछार नहीं थी
पर फिर भी खास थी
तुमने पूछा था उस दिन
सुनो, कभी भीगी हो
बारिश में ??
मैंने कहा नहीं
मुझे पसंद नहीं
तुमने कहा,
अरे
बूंदों से किस बात का बैर
आसमान से बरसते प्यार
में भीग कर तो देखो
बूंदों से प्यार न हो जाये
तो कहना
जाने क्यों पर
बात मान ली तुम्हारी
खूब भीगी थी उस दिन
तन तो भीगना ही था
पर उस दिन की
बरसात में मन भी
भीग गया !!!

रेवा

Saturday, June 16, 2018

चट्टान




जब जीवन में 
आता है
मुश्किलों का
भारी चट्टान
तब
मनोबल कमज़ोर
हो जाता है
मन टूट जाता है
दिमाग फटने लगता है
विश्वास
डगमगाने लगता है
उनके टूटने, फटने और
कमज़ोर होने को
महसूसो
तभी तो पता चलेगा
वो हैं तुम्हारे अंदर
मौजूद अभी भी
ऐसा करो 
एक नई चट्टान बनाओ
आत्मविश्वास की 
उसमे मनोबल का लेप लगाओ
फिर देखो
कैसे मुश्किलों का हल
निकलता है !!


रेवा 

Friday, June 15, 2018

योगी




ऐसा क्यों महसूस होता है की
मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है
वो तुम ही थे न
जो रोज़ ख़्वाबों में आकर
मेरे दिल की सफ़ाई कर
प्यार का दीप जला जाते थे
कई बार तुम्हें रोकना चाहा
पर तुम वो योगी थे
जो चाहते थे कि मेरा प्यार में
विशवास बना रहे
इसलिए अलख जागते रहे
लेकिन बदले में कभी कुछ भी न चाहा
पर बिना चाहे ही
तुम्हारे सांसों की खुश्बू
बस गयी है मेरे सांसों में
तेरे दिल की गुफा में अब मैं
आराम करना चाहती हूं
ओ मेरे योगी ख़्वाबों से इतर
हकीक़त बन कर आओगे न !!!!

रेवा