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Friday, December 28, 2018

हम❤तुम


दर्द जब करवट 
बदलता था सीने में
और आँखें नम रहती थीं
तब तुम आए थे

दर्द के समंदर से
खिंच लाये मुझे
बैठाया मुझे अपने पास
पूछा दिल की बात
मैं अपनी दर्द की डायरी के
सफे पलटने लगी
और तुम्हें सुनाती रही
कितने दिन तुम बस
मूक सुनते रहे

जब तूफ़ान आता
तो मुझे डूबने से
बचाते रहे
उदास आंखों
को मुस्कान का
लिबास पहनाते रहे
जिस दिन खत्म
हुई वो डायरी
थाम लिया तुमने
सैलाब को
प्यार का मरहम
लगाया
हर ज़ख्म
भर कर उस
पर एहसासों का
इत्र लगा दिया

अब देखो कैसे
खिलखिलाता है
ये दिल, ये आंखें
और हम❤तुम

#रेवा

Tuesday, December 25, 2018

जीवन की रीत


मैंने अपने दिल में 
तिनका तिनका
जोड़ कर तेरे इश्क़ का
एक घोसला बनाया है

जिसमें हम रह रहे हैं साथ साथ
अपनी दुनिया बसा कर
हर दुख सुख साझा करते हुए
समय आने पर
बच्चे उड़ कर चले जाएंगे
अपने अपने घरौंदों की ओर

रह जाएंगे बस तुम और मैं
एक चाहत है मेरी
जब हमारी उड़ने की आये बारी
तो हम उड़े भी साथ साथ
लेकिन पता है ये मुमकिन नहीं
हमेशा रह जाती है अकेली
एक कि प्रीत
पर ये भी जानती हूँ
यही तो है जीवन की रीत

#रेवा

Sunday, December 23, 2018

फटा कपड़ा





मेरे लिए वो सिर्फ
एक कपड़ा था
जिसका अब कोई
महत्व नहीं था ,
बिल्कुल फीका
पड़ चुका था
और इसलिए
मेरी अलमारी में
वो अपनी जगह
खो चुका था,

लेकिन उसके लिए
वो तन ढकने का
उसे ठंड से बचाने का
सामान था 
बक्से में पड़े
चीथड़ों के बीच
एक पूरा बिना
फटा कपड़ा

#रेवा

Saturday, December 22, 2018

रेखा



जब पहली बार
थामा था तुमने मेरा हाथ
हम दोनों कि रेखाओं की
भी हुई थी वो पहली मुलाकात

उस दिन से आज तक
रोज़ जब जब वो मिलते हैं
वो एकाकार होते जाते हैं

जब जीवन के डगर में
आते है टेढ़े मेढ़े रास्ते
और हम दोनों विश्वास से भरपूर
थामते हैं एक दूजे का हाथ
तब और मजबूत हो जाता है
इन रेखाओं का साथ

अब तो ये है हाल
पता ही नहीं चलता कौन सी
रेखा किसकी है
दोनों मिल कर
अब एक समान लकीर
जो बन गयी है

मेरी है बस इक आस
ऐसे ही बना रहे इन
रेखाओं के साथ

#रेवा

Thursday, December 13, 2018

खेल



कब तक खेलोगे 
ये सारे खेल
आख़िर कब तक ??

घर पर
बाहर भी
ऑफ़िस में 
आम जनता के
साथ भी 
दोस्तों के साथ
सभा में भी 

अपनी बातों से
अपनी नज़रों से भी
अपनी हर हरक़त से
बोलो न कब तक
खेलोगे ये खेल ??
क्या तुम ऊब नहीं जाते
बोलो न 

#रेवा 

Wednesday, December 12, 2018

कोहरा


कोहरा यानी
पृथ्वी का आकाश से
आलिंगन ....
शाम यानी
दिन और रात का
मिलन ...
बरसात यानी
आसमान का धरती को
प्यार भरा संदेश ....
भोर यानी
रात के आगोश से निकल
झिलमिलाती सूर्य की
किरणें ...
समुन्दर यानी
गीली नदी का बहता
प्यार .......
आँखें यानी
असंख्य मोतियों से भरा
सीप......
इश्क यानी
मैं, तुम और एहसास !!!


रेवा

Tuesday, December 11, 2018

नदी हूँ मैं



नदी हूँ मैं 
हाँ नदी हूँ 
अविरल बहना
मेरी नियति है.... 
तुम 
हाँ तुम
तुम भी तो समुन्द्र हो
मुझे अपने में सामना
तुम्हारी भी नियति है....


पर तुमने नियति के विरुद्ध
अपना रुख मोड़ लिया
मुझे तन्हा छोड़
अपनी मौज में बहने लगे ,
न तुमने कभी अपना
रुख मोड़ा न मेरी सुध ली
पर मैं तो नदी हूँ
सहती रही बहती रही 


पर अब बस
बस  
ना अब सहूंगी ना 
तुझ में समाने का 
इंतज़ार करूंगी 
अपने वेग के साथ 
अपने रास्ते बनाते हुए 
अपनी नियति 
बदलूंगी 


#रेवा 
#स्त्री 

Saturday, December 8, 2018

अक्षर


कभी कभी जब 
मैं आत्मविश्लेषण करती हूँ
तो स्वतः ही
एक सवाल मन में 
उठता है

मैं क्यों कविताएं लिखती हूँ
क्यों हर रोज़ लगता है
कुछ न कुछ लिखना है ही ?
क्या सिर्फ वाह वाही के लिए
या समाज के लिए
या बस यूँ ही
या ख़ुद के लिए लिखती हूँ ?

जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं
लगता है मैं खुद की तलाश में हूँ
प्यार की तलाश में हूँ
जीवन की खोज में हूँ
इसलिए अक्षरों की 
शरण में आई हूँ
उनसे पक्की दोस्ती कर
जीना चाहती हूँ
जानना चाहती हूँ
समझना चाहती हूँ 

वो जो स्पष्ट नहीं
वो जो है तो मुझ में
पर मिलता नहीं मुझे 
इसिलए अभी सफ़र में हूँ
अ से ज्ञ तक की 
यात्रा जो करनी है .... 

#रेवा

Friday, December 7, 2018

पहले मिलन का एहसास






हर बार जाने किस
तलाश में ये वाक्या
बयान करती हूं
पर जितनी बार लिखती हूँ
लगता है
कुछ रह गया लिखना

मिले थे हम वहाँ
जहां मिलती हैं झीलें
अजनबी से उस शहर में
थी ये हमारी पहली मुलाकात
लेकिन पहचान लिया था
भीड़ में भी
दो जोड़ी आंखों को तुमने
चले थे फिर हम कुछ दूर साथ
पी थी कॉफी और कि थी
अनगिनत बात
चले गए फिर तुम अपने
रास्ते और मैं अपने
पर एक सकूं था साथ की
कम से कम आज
जिस हवा में तुम सांस ले रहे हो
ले रही हूं मैं भी वहां सांस
न हो फिर कभी मुलाकात
लेकिन पूरी ज़िंदगी
महकता रहेगा ये
पहली मिलन का एहसास


#रेवा