Followers

Saturday, July 21, 2018

नयी यादें




जानते हो
तुम्हारी याद
बेतरह आती है
और मेरे ख्यालों में
हर मुलाकात
महकती रहती है

आँखों की बरसात
मिलवाती है उस
सूखी छतरी से
जिसके होते हुए
भीगना बहुत भाया था
हम दोनों को

कैफ़े का वो टेबल और
मेरी पसंदीदा कॉफ़ी
तेरे बिना
मुझे मुंह चिड़ाते हैं
पर तब  अनायास ही
कॉफ़ी से और इश्क हो जाता है

हाथों में कभी कभी
लगता है तेरे हाथ
रह गए हैं
बस ऐसे ही तुझसे जुड़ी
हर चीज़ को  महसूसते
मुस्कुरा कर चल पड़ती हूँ
नयी यादें बनाने ........


#रेवा








Friday, July 20, 2018

सुंदरता के मापदंड


सुंदरता के मापदंड
क्या हैं ? ???
ये मुझे कभी
समझ नहीं आया
पर जितना समझा 
उससे लगा
सूरत तो है ही
पर सीरत सबसे अहम है


ये दोनों का मेल इंसा को
इंसा बनाता है
अगर सूरत में कमी है
तो चल भी जाता है
पर सीरत का दर्जा
सबसे ऊपर....
लेकिन हँसी
आती है
ये बताते हुए की
आज सीरत  से
ज्यादा सूरत
को महत्व दिया जाता है

सुंदर सूरत हो बस
उसके बाद का सब
मैनेज हो जाता है
लगता है
आर्टिफीसियल दुनिया में
जीते जीते हमे
सब वैसी ही चीज़ें
पसंद आने लगी हैं......


रेवा


Thursday, July 19, 2018

कौन हूँ मैं ??



कौन हूँ मैं ??
एक नारी
बहुत आम सी
साँवले रंग वाली
गढ़ी गयी थी मैं
जिस गढ़त में
कई सालों तक
उसी के साथ चली
सीखी थीं जो बातें
उन्हें ही सच मानती रही
पर दुनिया कुछ और ही है
ये बात धीरे धीरे पता चली.....

तो मैंने दुबारा से ख़ुद को गढ़ा
एक नया चेहरा बनाया
जो मुझे बहुत पसंद आया
अक्षरों से दोस्ती की
और अपनी एक
नई दुनिया बनायी
जो इन किताबों से शुरू
होकर लफ़्ज़ों के रास्ते
तय करते हुए
कलम तक जाती है
और सुकून से भर
देती है मन ....


#रेवा

Wednesday, July 18, 2018

मेरा साया



दिन में वो साया
जो हल्की
धूप में
साथ नज़र आता है
वो अंधेरी रातों को
अकेला कर
कहाँ चला जाता है ??

उसके साथ रहते हुए भी
इतनी तन्हाई 
क्यों महसूस होती है ?
अपनी लकीरों में तो उसे
पाया है न
फिर भी क्यों दूर मुझसे
मेरा साया है ??

जब चाहती हूं
उसमे सिमटना
अपना दर्द बांटना
उसके बाजुओं को
अपने आंसुओं से भिगोना
तो वो क्यों नहीं मिलता ?

कहाँ चला जाता है
हर बार
मुझे यूँ अकेला कर
मेरा ही साया ??


#रेवा

Tuesday, July 17, 2018

उम्मीद




मत करो अब 
मुझसे वो पहली सी 
उम्मीद की 
नहीं दे पाऊँगी 
अब कुछ भी तुम्हें ...

जानते हो जब दर्द हदें  
तोड़ देता है 
तो बदले में 
बहुत कुछ ले भी लेता है 

मुस्कान तो आज भी 
खेलती है होठों पर 
लेकिन सुकून -ए- दिल 
नहीं है 

आंसुओं का इन आँखों में 
काम नहीं अब कोई 
पर आंखें अब शरारत से 
मुस्काती नहीं है 

गाती मैं आज भी हूँ 
पर मस्ती में 
गुनगुनाना भूल गयी हूँ 

आईना देख संवरती 
अब भी हूँ 
पर उसमे तुम्हारा अक्स देख 
शर्मा कर नज़रें नहीं झुकाती 

लटें अब भी उलझती हैं मेरी 
पर उन्हें सुलझाने के 
बहाने तुम्हें पास 
नहीं बुलाती 

बरसात मुझे अब भी 
उतनी ही पसंद है 
पर तुम्हारा हाथ पकडे 
बूंदों को महसूस करने की 
इच्छा नहीं होती 

रिश्ता तो आज भी है 
पर परवाह और प्यार की जगह 
जिम्मेदारी ने ले ली है....... 

रेवा 

Monday, July 16, 2018

पता





स्त्री हैं हम
हमारा कोई
स्थायी पता नहीं होता
जहाँ हम पैदा
होतीं हैं वहां
ताउम्र रहतीं नहीं
जहाँ उम्र गुजारती हैं
वहां कुछ इस तरह
रहती हैं
जैसे पांव के नीचे
खाई हो जिसमें
हम धस नहीं सकती
और सर पर जो
नीला आसमान है
उस पर पंछी बन
उड़ भी नहीं सकती
ज़िन्दगी इनके
बीच तारतम्य बैठाते
गुज़र जाती है ....

#रेवा 
#स्त्री 

#अमृता की "खामोशी के आंचल में"
पढ़ते हुए

Saturday, July 14, 2018

पुल




औरतें अकसर
पुल होती हैं
घर के तमाम
सदस्यों के बीच ...

बुजुर्ग बाप और
अधेड़ उम्र के बेटे के बीच
एक तरफ़ बहु
एक तरफ बीवी
बातों को बिगड़ने से
बचाने की कोशिश में
कभी एक तरफ़ होती है
कभी दूसरी तरफ
फिर पुल बना
सुधारने की कोशिश
करती हैं घर का माहौल......

किशोर होते बच्चे
जब नहीं समझते
अपने पापा की बात
और उनका गर्म खून
ज़ोर मरने लगता है.........
दूसरी तरफ उनके पापा
देने लगते हैं
अपने समय की दुहाई तो
फिर बन जाती हूँ पुल
बाप और बच्चों के बीच.......

हमारे अपने सपने
हमारी अपनी इच्छायें
जब जोर मारने लगती है तो
हम फिर एक पुल का
निर्माण करतीं है
घर का बजट
घर की ज़िम्मेदारी
और अपने सपनों के बीच.........

ऐसे है न जाने
कितने अनगिनत पुलों
का निर्माण करती हैं हम
हमारी बनायी पुलों की
ख़ासियत ये है की
ये बहुत मजबूत होती है
उन पुलों की तरह नहीं
जो भ्रष्टाचार की वजह से
भर भरा कर गिर जाते हैं .....


#रेवा 

Friday, July 13, 2018

मेरी जमा पूंजी


पापा आपके लिए

बचपन की यादें, कितनी प्यारी होती हैं न ..और जब  जनवरी का महीना आता है तो शिद्दत से बचपन और पापा याद आने लगते हैं ।
जबसे होश संभाला तब से शादी के बाद तक, माँ से ज्यादा पापा से जुड़ी रही उनकी सीख उनकी हिदायत उनकी रेसिपी।

एक इच्छा जाहिर करने की देर थी पापा मेरी हर ख़्वाहिश पूरी करने की कोशिश करते। चाहे वो साइंस पढ़ना हो या भूख हड़ताल कर कंप्यूटर क्लासेज करना । या फिर साईकल सिखना , या फिर वेस्टर्न ड्रेस पहनने की चाह जो उन्हें बिल्कुल पसंद न थी , दीदी ने इनमे से कुछ भी नहीं किया था।
धर्म युग नाम की एक मैगज़ीन आती थी तब, पापा हमेशा वो पढ़ कर रोचक बातें साझा करते थे मुझसे । मुझे गाने सुनना बहुत पसंद था , उस समय चित्रहार बुधवार और रंगोली रविवार सुबह आता था । रविवार को मैं और पापा नाश्ता बनाते थे, जैसे ही रंगोली शुरू होता एक आवाज़ आती " बेटा आजा तेरा प्रोग्राम शुरू हो गया है। हम दोनों फिर गाने सुनते और देखते थे ।

एक सफ़ेद मखमल का छोटा बैग लाये थे पापा , जब ठंड शुरू होती तो काजु किशमिश अखरोट आता था घर में , सब मिला कर हम तीनों भाई बहन में बराबर में बांट दिया जाता था, हमारे लिए वो अमृत था, मैं उसे पापा के दिये बैग में रखती और ठंड भर खाती थी , कभी कभी दीदी भईया के हिस्से से भी थोड़ा मार लेती थी ।

जब मैं बीमार पड़ती तो सारा घर सुबह सोता रहता पर पापा हॉर्लिक्स बना कर दे जाते थे मुझे, मजाल है भूखी रह जाऊं, एक बार उन्हें पता चला कि मैं कॉलेज भूखी गयी हूँ तो उन्होंने पूरा घर सर पर उठा लिया था।
पढ़ाई पूरी होने के बाद जब शादी की बारी आई तो उन्होंने बस एक सीख दी थी "बेटा नए माहौल में एडजस्ट होने में कम से कम 1 साल लग जाता है, कोशिश करोगी तो एडजस्ट कर लोगी । बस वही सीख पल्ले में बांध ली थी मैंने।
अब वो इस दुनिया में नही हैं, लगता है वो गए तो पीहर साथ ले गए ....पर उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है और पापा मेरी यादों में हमेशा रहेंगे ।


#रेवा 

Thursday, July 12, 2018

प्यार का एक और रूप




होता है ऐसा भी
के कोई प्यार
जता जता के
हार जाता है

पर हम उससे
प्यार करते हुए भी
उसकी
कद्र नहीं कर पाते
और अपने प्यार की
गहराई
समझ नहीं पाते

शायद मन के
कोने में ये बात
रहती है की
वो कहाँ जाने वाला है
प्यार करता है न
जब चाहूँ मिल जायेगा
मुझे

पर जब हालात
बदलते  हैं
और वो प्यार वो साथ
छूट जाता है
तब
आंसुओं के सैलाब के
अलावा कुछ नहीं बचता

#रेवा 

Wednesday, July 11, 2018

विरह वेदना



आज मैं अपनी एक पुरानी रचना साझा कर रही हूँ .....


मैं खिड़की के कोने खड़े हो कर तेरा इंतज़ार करती
तेरे एक स्पर्श के लिए महीनों तड़पती 
तुझे याद कर के अपनी साड़ी का पल्लू भिगोती
इतना बेकरार हो जाती की तमाम कोशिशों के
बावजूद तेरी आवाज़ सुन कर गला भर आता

याद की इन्तहा होने पर
तेरे कपड़ों में पागलो की तरह तेरी खुशबू ढूंढती
और बिना बात ही हर बात पर रो पड़ती  ........

महीनों बाद जब तेरे आने की ख़बर मिलती
एक खुशी की लहर बन कर हर जगह फ़ैल जाती
मुझे लगता की मेरी खुशी, मेरी हँसी, मेरा चैन
मेरा सुकून,मेरी ज़िन्दगी आ रही है ....

पर आने के बाद तेरी वो बेरुखी, उफ्फ्फ !
तेरा मेरे एहसासों को मेरे जज्बातों को
मेरी तड़प को, नज़र अंदाज़ करना
मैं जैसी हूँ  वैसा ही छोड़ कर चले जाना .....

मुझे और भी आंसुओं मैं डुबो देता
लगता जैसे चारों तरफ़ एक शुन्य
एक सूनापन बिखर गया
जैसे जीवन सूना, आधारहीन हो गया

विरह में  वेदना सहना आसान है
पर मिलन में कैसे सहा जाए विरह वेदना ??

रेवा 




Tuesday, July 10, 2018

अपनी अदालत




मैं रोज़ ख़ुद से 
अनेकों युद्ध लड़ती हूँ
खुद को फिर अदालत में
खड़ा कर सवाल करती हूं
सवालों का सही जवाब
न मिलने पर
सजा सुना देती हूं
और ये क्रम
अनवरत चलता रहता है
जाने कब मैं अपने सवालों के
सही जवाब दूँगी और
खुद को अपनी
अदालत में बा इज़्ज़त बरी
कर पाऊंगी !!!

रेवा

Monday, July 9, 2018

दरदी बंधु



एक शख्स है ऐसा
जो सब रिश्ते नातों से परे
सबसे ऊपर है

मेरी खुशी में 
अपनी खुशी मिलाकर 
उसे दोगुना करने वाला
दुख में उसे बांट
व्यथा को कम करने वाला 

मेरी आंखें पढ़ कर
दिल का हाल
जानने वाला 

वो शख्स जो
मेरी आँखों में
आंखें डाल
मेरे गलत को
गलत बोलने की हिम्मत
रखने वाला

मेरे साथ हमेशा 
मज़बूत स्तम्भ की तरह 
खड़ा रहने वाला
मेरा हाथ थाम
मुझे आगे ले जाने वाला
लाख रूठ जाऊं
मुझे मना लेने वाला

ये शख्स और कोई नहीं
ये है मेरा दरदी बंधु
मेरा कान्हा .....


रेवा

Sunday, July 8, 2018

बूढ़ा पीपल






बहुत खुश था
वो गांव के
चौराहे पर खड़ा
बूढ़ा पीपल,

बरसों से खड़ा था अटल
सबके दुःख सुख का साथी
लाखों मन्नत के
धागे खुद पर ओढ़े हुए ,
कभी पति की लम्बी उम्र
कभी धन की लालसा
कभी क़र्ज़ वापसी
तो कभी अच्छी फ़सल
बेटी का ब्याह
बेटे की चाह
और न जाने क्या क्या

पर पहली बार
किसी ने अपने लिए
एक नन्ही कली की
मन्नत मांगी ,
तो पीपल को लगा
उसका जन्म सफल
हो गया इस धरती पर ....

लेकिन आज वो ज़ार ज़ार रोया
जब उस नन्ही कली को
चिथड़ों और
वह्शाना निशानों के साथ
अपने पास बैठ बिलखते
हुए देखा ......


रेवा 

Saturday, July 7, 2018

गिरगिट



बचपन में 
देखा था बड़े
गौर से गिरगिट को
रंग बदलते हुए
अचरज तो हुआ था
पर बहुत खुश भी हुई थी
ऐसा कुछ देखते हुए 

अब बड़े गौर से
देखती हूँ
मनुष्यों को रंग
बदलते हुए
कितानी जल्दी
इतने तरह के
रंग बदल लेते हैं 
माशाल्लाह 

पर खुशी बिल्कुल
नहीं होती
एक बात बताओ ज़रा
इतने गिरगिटिया कैसे
हो लेते हो !!!


रेवा

Friday, July 6, 2018

काश पापा आज आप होते

काश मैंने आपके सामने
लिखना शुरू किया होता
काश मैं अपनी
पहली किताब
आपको भेंट कर पाती
काश आप अख़बार में  
अचानक  मेरी लिखी 
कविता पढ़ते और
सबको पकड़ पकड़
कर बताते
मेरी हर उपलब्धि पर 
मुझे फ़ोन कर बधाई देते
जानते हैं पापा 
वैसी ख़ुशी 
दुनिया में  किसी को
नहीं होती है
काश आपके चेहरे पर
मेरे लिए वो गर्व की
रेखाएं मैं देख पाती .....
काश पापा आज आप होते !!


रेवा

Thursday, July 5, 2018

ग़रीब जो ठहरी


रोज़ सुबह उठकर
आंखों की रौशनी से
भगवान के आगे 
दीप जलाती है वो
ताकी ज़िन्दा रहे 
उसका इकलौता बच्चा
ग़रीब जो ठहरी

केवल पानी से करती है
पेट भर नाश्ता
और निकल पड़ती है
किसमत के पत्थर को
मजबूरी के हथौड़े से 
तोड़ने  
ग़रीब जो ठहरी 

बरसात में टपकती है 
जब उसकी झोपड़ी
हाथों के खुरदुरे बिस्तर पर  
मैली आँचल के छत्ते तले
सुलाती है बचाकर बूंदों से 
अपने मासूम बच्चे को
वो एक माँ भी है 
पर ग़रीब जो ठहरी 

न रगों में अब लहू है
न जिस्म में कुछ पानी
न आंखों में आंसू हैं 
न पुतलियों पर नमदारी 
वो तो बस 
गरीबी पहनती है 
गरीबी खाती है
गरीबी ओढ़ती है 
गरीबी बिछाती है 
और एक दिन
ग़रीब संग गरीबी मर जाती है 

रेवा 

Wednesday, July 4, 2018

झील के इस पार



याद है तुम्हें 
वो झील के
किनारे की पहली
मुलाकात
कितना हसीं था न
वो इत्तेफ़ाक

तुम किसी और शहर के
मैं कहीं और की
अपने अपने शहरों से दूर
मिले थे किसी और जगह पर
देखा नहीं कभी एक
दूजे को
पर बातों ही बातों में की थी
अनगिनत मुलाकात
एक ख़्वाहिश
जरूर थी दिल में
एक बार
तुम्हें इन नज़रों से
निहारूँ तो सही

उस दिन लगा
ऊपर वाले ने
सुन ली मेरे दिल की पुकार
तुम और मैं मिले थे फिर
झील के इस पार

भरी भीड़ में पहचान लिया था
तुमने मुझे
और फिर पी थी हमने
कॉफी बातों के साथ
कुछ देर में चले गए तुम
और मैं भी
पर वो शाम
वैसी की वैसी टंगी है
आज तक मेरे दिल की
दीवार पर
जब मन होता है
उतार कर जी लेती हूं
और एहसासों का इत्र लगा
टांग देती हूं फिर उसी जगह !!


रेवा

Tuesday, July 3, 2018

बाँसुरी



वो जो कन्हैया है न
जो बंसी बजाता है
उसे उसकी बाँसुरी
कितनी पसंद है
प्राणो से प्यारी है
यहाँ तक की राधा और
उनके बीच भी वो रहती है

पर वो बाँसुरी जब बनती है
उसे कितनी मुश्किलों
से गुजरना पड़ता है
उसे काटा जाता है
आकार दिया जाता है
फिर उसके तन पर छेद
किये जाते हैं
उसे चमकाया
जाता है
तब कहीं वो जा कर
कन्हैया के होठों
से लगती है

मेरे भी इम्तिहान का
समय चल रहा है
पर मैं भी चमक कर
एक दिन उस बाँसुरी वाले की
प्रिय बन ही जाउंगी ......

रेवा


Monday, July 2, 2018

मेरे हिस्से


मेरे हिस्से आता है 
सिर्फ़ देना
अपनी मीठी बोली
अपना प्यार
अपना समर्पण
अपना परिश्रम
अपना सारा समय
अपनी हंसी
पर मेरी भी कुछ
कमजोरियां हैं
मन के कुछ निग्रह हैं
क्या तुम उसे
नज़रंदाज़ नहीं कर सकते
जब इतना कुछ लेते हो
बदले में कुछ न दो
पर सम्मान तो
दे ही सकते हो न  !!!


रेवा 

Sunday, July 1, 2018

महीने का हिसाब



चाहती हूँ मैं भी
नज़्म लिखना
प्रेम में पगी
जीवन से भरपूर
एहसासों में डूबी
भावनाओं से परिपूर्ण
जो पढ़ते ही ले जाए
किसी और दुनिया में

पर जब जब लिखने
बैठती  हूँ
बेख़याली में
लिखने लगती हूँ
महीने का हिसाब

कितना किसको दिया
कितना बाकी है
बजट के अन्दर
सब सँभाल पा रही हूँ
या फिर इस महीने भी
महँगाई के डंडे
और ज़रूरतों से
ओवर बजट की मार
झेलनी पड़ेगी

डूब जाती हूँ फिर
इस सोच में
क्या इस बार भी
कहा सुनी हो जाएगी
खर्च को लेकर ?
या शांति से निपट जायेगा
इस महीने का हिसाब किताब
पर हर महीने
इसी सवाल में अटकी रहती हूँ

चाहती हूँ मैं भी
नज़्म लिखना
पर बेख़याली में
लिखने लगती हूँ
महीने का हिसाब !!!

रेवा