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Saturday, July 15, 2017

"सुघड़ गृहणी "




आँखों से अब
आँसू नहीं बहते
जज़्ब हो गए हैं
कोरों मे ........
दिल भी अब
दुखता नहीं
बांध दिया है
सिक्कड़ों से ........
एहसास अब
पहले से नहीं
उठते मन मे
उन्हें बाहर
का रास्ता दिखा
दिया है ........
उम्मीदें भी
नहीं जगती अब
उन्हें गहरी नींद
सुला दिया है .......
एक शून्य की
चादर ओढ़
उस पर
मुस्कान का
इत्र लगा दिया है ........
बोलो अब
दिखती हूँ न मैं
"सुघड़ गृहणी "

रेवा


Monday, July 10, 2017

संस्मरण


अभी कुछ दिनों पहले मैं केरेला के एक टूरिस्ट प्लेस वायनाड गयी थी ,हम जब वहां पहुंचे तो वहां बरसात का मौसम शुरू हो चूका था। वो जगह इतनी सुन्दर है की उसे शब्दों मे वर्णन करना बहुत मुश्किल है। प्रकृति की छटा अपने पुरे यौवन मे ,हर तरफ बिखरी हुई थी ,बरसात मे ऐसा लग रहा था मानो कैनवास पर हरे रंग बिखेर दिए हों ,दिन मे भी वहां कुहासा हो गया था ...... चारो ओर बस शांति और हरियाली ....उस समय वो जगह जन्नत से कम नहीं लग रही  थी। उस दिन हमने  प्रकृति का आनंद उठाया , आराम किया और खूब तस्वीर खिंचे ,दूसरे दिन से हमने घूमना शुरू किया , वहां के लेक और डैम देख कर हम मन्त्र मुग्ध हो रहे थे ...... यहाँ बीच मे एक बात मैं और कहना चाहूंगी वहां के लोगों के बारे मे ,जो सीधे सरल ,धीरे बोलने वाले और बेहतरीन मेजबान हैं ।
तीसरे दिन हमे वापस जाना था। उस दिन हमने प्लान बनाया की जो लेक बचा है वो देखते हुए हम वापस चले जाएंगे।
हम पहुंचे vythiri के एक लेक मे ..... वहां पहुँचते ही ज़ोरों की बारिश शुरू हो गयी। हमे बोटिंग करना था पर वो बारिश की वजह से बंद हो गया था , लेकिन लेक प्राकृतिक था और इतना ख़ूबसूरत की क्या बताऊँ , हम बरसात मे भी रुक गए...  जैसे ही हम वापस जाने लगे मेरी नज़र पड़ी एक माँ पर जो उस बरसात मे अपने छोटे बच्चे को खुद से चिपकाये उसे बचा रही थी..... बार बार उसके बालों पर हाथ फेर रही थी बारिश जितनी तेज़ हो रही थी बच्चा उतना ही माँ से चिपकते जा रहा था , ये माँ है तस्वीर वाली बंदरिया

माँ आखिर माँ होती है चाहे कोई भी रूप हो !!!!! ............................

रेवा






Tuesday, July 4, 2017

कॉफ़ी और तुम






अलसाई सी शाम
कॉफ़ी की कप से
उठता धुआं  
उसकी ख़ुश्बू
मन को
संतुष्टि से भर
देती है .....
लगता है ऐसे लम्हे
मे वही एक कप
सबसे जरूरी है ......
पर जब मन ऐसा हो
तो अनायास ही
तुम्हारी याद आ जाती है
तुम्हारी बातें कॉफ़ी
कि तरह घुलती जाती है
धीरे धीरे मेरे ज़ेहन मे
उसकी ख़ुश्बू की तरह
भर लेती है मुझे अपने
आगोश में
कितने एक जैसे हो न
तुम दोनो ......


रेवा