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Monday, February 8, 2016

लेखन कला




लिखती हूँ मिटाती हूँ
जाने क्यों
कविता नहीं बुन पाती हूँ 
कभी दोहे की तलाश मे
अटक जाती हूँ 
कभी शब्द टंग जातें है  दिल के 
तारों पर 
तो कभी एहसास 
दगा दे जातें हैं 
कभी लगता है छन्द मे बंध गए 
मेरे सवाल 
तो कभी
छंद मुक्त कविताओं  मे 
निकलता है
दिल का गुब्बार ,
तो कभी हो  जाता
मुझे क्षणिकाओं से प्यार ,
पर चाहे जो भी लेखन कला
ये शब्दों का जाल  
दिल मे जगाता रहता है
कलम और कागज़ से प्यार

रेवा