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Tuesday, March 5, 2019

हूँ इन्सान


हाँ मैं हूँ एक माँ
खड़ी ढाल की तरह
अपने बच्चों के साथ 
उनके हर तकलीफ़ में
डट कर सामना करने को
उन्हें बचाने को तैयार
चाहे हालात कैसे भी हो
चाहे मुसीबत कैसी भी हो
पर फिर भी हूँ इन्सान
उस दिन उस शाम
कुछ मिनट पहले ही
देखा था अपनी दस साल की
बच्ची को खेलते हुए
और बाद के कुछ मिनटों ने
दुनिया बदल दी मेरी
नहीं बन पाई मैं अंतर्यामी
जो देख लेती होनी को
नहीं बचा पाई मैं अपनी
बच्ची को उस वहशी से
जिसने गंदे इरादे से
बच्ची को बंद कर लिया
अपने साथ
पर कामयाब न हो सका
लेकिन इस हादसे ने
डर दुख तकलीफ
भर दिया उस बच्ची
और माँ के अंदर
रोती रही ज़ार ज़ार
बच्ची को छाती से
लगाए यही सोचती रही
गलती मेरी है
नहीं रक्षा कर पाई
अपनी बच्ची की
नहीं बन पाई अंतर्यामी,
दुर्गा काली नहीं नहीं नहीं
बन पाई
नहीं बन पाई माँ
माँ का दर्जा बहुत ऊँचा है
सदा रहेगा पर
है वो इन्सान
है वो इन्सान

18 comments:

  1. मर्मस्पर्शी रचना

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (06-03-2019) को "आँगन को खुशबू से महकाया है" (चर्चा अंक-3266) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. मार्मिक रचना।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

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  4. मोटूरि सत्यनारायणआपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 24वीं पुण्यतिथि - मोटूरि सत्यनारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    Replies
    1. नमस्ते , शुक्रिया

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  6. भावमय करती अभिव्यक्ति

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  7. बहुत सुन्दर ,हृदयस्पर्शी रचना...

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  8. बेहद मार्मिक और यथार्थ ,हम मायें सोचती हैं और कोशिश भी करती है कि हम अपनी बेटियों को हर बुरी नजर से बचा लेगी लेकिन किस पल कौन सा राक्षस नजरे गड़ाए बैठा रहता है सीता हरण को ये जान ही नहीं पाते ,उस पल खुद को कितना असमर्थ पाते है ,बेहद संवेदनशील रचना ,सादर

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  9. सुन्दर प्रस्तुति

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