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Saturday, July 15, 2017

"सुघड़ गृहणी "




आँखों से अब
आँसू नहीं बहते
जज़्ब हो गए हैं
कोरों मे ........
दिल भी अब
दुखता नहीं
बांध दिया है
सिक्कड़ों से ........
एहसास अब
पहले से नहीं
उठते मन मे
उन्हें बाहर
का रास्ता दिखा
दिया है ........
उम्मीदें भी
नहीं जगती अब
उन्हें गहरी नींद
सुला दिया है .......
एक शून्य की
चादर ओढ़
उस पर
मुस्कान का
इत्र लगा दिया है ........
बोलो अब
दिखती हूँ न मैं
"सुघड़ गृहणी "

रेवा


25 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 16 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-07-2017) को "हिन्दुस्तानियत से जिन्दा है कश्मीरियत" (चर्चा अंक-2668) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. Replies
    1. शुक्रिया कमलेश ji

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  4. सार्थक रचना

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    1. शुक्रिया onkar जी

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  5. Replies
    1. शुक्रिया सुशील ji

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "सात साल पहले भारतीय मुद्रा को मिला था " ₹ " “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. समाज की स्त्री से की गई अपेक्षाओं पर गहरा कटाक्ष !

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    1. शुक्रिया मीना जी

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  8. समाज ने सुघड़ गृहिणी की यही व्याख्या की है और आपने इसे शब्दो के माध्यम से बहुत ही अच्छे से व्यक्त किया है।

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    1. शुक्रिया ज्योति जी

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  9. जितनी ज़िंदगानियाँ उतने फ़साने। अपना -अपना आसमान तलाशने की मुहिम जीवन को श्रेठत्तर होने के मार्ग बनाती है ,स्वतंत्रता के आयाम विकसित करती है। नारी जीवन को बंधनों में जकड़ने की सोच आज भले ही अचेत है किन्तु अपना असर कहीं न कहीं दिखाती ज़रूर है।
    उत्तम प्रस्तुति। ग्रहणी की मनोदशा को उभारती सुन्दर रचना। रचना में एक शब्द "बहार " असमंजस पैदा कर रहा है। आप स्पष्ट करेंगी तो अच्छा होगा।

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    1. बाहर लिखना था बहार लिखा गया ,शुक्रिया आपकी टिप्पणी के लिए

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  10. जितनी ज़िंदगानियाँ उतने फ़साने। अपना -अपना आसमान तलाशने की मुहिम जीवन को श्रेठत्तर होने के मार्ग बनाती है ,स्वतंत्रता के आयाम विकसित करती है। नारी जीवन को बंधनों में जकड़ने की सोच आज भले ही अचेत है किन्तु अपना असर कहीं न कहीं दिखाती ज़रूर है।
    उत्तम प्रस्तुति। ग्रहणी की मनोदशा को उभारती सुन्दर रचना। रचना में एक शब्द "बहार " असमंजस पैदा कर रहा है। आप स्पष्ट करेंगी तो अच्छा होगा।

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  11. सुघड़ स्त्री.....
    बहुत ही सुन्दर....
    भावनात्मकता और कोमलता त्याग सुघड़ स्त्री बनना समाज की जरूरत हो गयी....
    बहुत ही सुन्दरता से बयां करती नारी मन की बिवशता..
    लाजवाब प्रस्तुति..

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    1. शुक्रिया sudha जी

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  12. एक-एक शब्द भावपूर्ण ...
    संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता :)

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    1. शुक्रिया संजय जी

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  13. kya baathai ji aisi kavitaye to bachpan me bahut parha karta tha. Ab Bhi milne lagi bahut khush hu

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    1. स्थिति अभी भी पूरी तरह बदली नहीं है ....गाँवो मे तो इससे भी बुरी है .... जब तक ऐसी स्थिति बनी रहेगी आप पढ़ते रहेंगे .....शुक्रिया पोस्ट पर आने और टिप्पणी करने के लिए

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