Followers

Sunday, September 6, 2009

धरती की प्यास


दिल रूपी धरती कर रही बार-बार गुहार
कब पड़े इस पर बारिश की फुहार ,
ऐसा न हो की धुप की तपिश सहते-सहते
इसमे पड़ जाए दरार ,
यह इतना सख्त हो जाए की
भूल जाए सुहाना प्यार 
भूल जाए अपनी हरी भरी दुनिया
चिड़ियों के साथ चहकना 
हवा के साथ बलखाना
बारिश की बूंदों के साथ लहलहाना ,


बस रह जाये एक बेजान पहचान !




रेवा

4 comments:

  1. अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी "में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है...

    ReplyDelete
  2. Rewa .. Tumhaarii Rachana bahut hii bhaavnaao se paripurn hoti hain ... usi Pankti mei yeh ek aur Kadi hai ... wastav ek Virhan ki bhaavnao ko shabd diye hai tumne .... Bahut Khoob .......... Maine bhi ek Blog ki shuruat ki hai www.unbeatableajay.blogspot.com kabhi padhaariyega

    ReplyDelete
  3. Philosophical touch in these words and other poems.

    ReplyDelete
  4. Bahut sundar Rewa ji apka lekha aur kavita ekdam dil ko chune wale hoti hain.. Sadhuwaad ji.

    ReplyDelete