Followers

Friday, March 2, 2012

यही मेरा नसीब

क्या कहूँ 
मन कैसा हो रहा है आज ,
सहनशक्ति के सारे बांध 
टूट रहे हैं  ,
नहीं सहा जाता अब 
रोज़ रोज़ आशा भरी 
नज़रों से तुम्हे 
टुकुर टुकुर देखना ,
लगता है आज तो
तुम कुछ मन की बात करोगे  ,
यही पूछ लो शायद 
की क्या "तुमने खाना खाया "
पर नहीं रोज़ की तरह 
आज भी ,
बस एक मौन पसरा है ,
वही तुम्हारा ऑफिस से आना 
खाना खा कर सो जाना ,
न एक नज़र देखना 
न ही बात करना ,
करवटों मे रात 
बीत जाती है ,
पर एक हाँथ के 
फासले पर सोये 
तुम्हे खबर भी नहीं होती ,
हर बार खून के आंसू 
पी कर रह जाती हूँ ,
लगता है कल नया दिन 
नयी शुरुआत ,
पर अब लगता है शायद 
यही मेरा नसीब है 
यही मेरी ज़िन्दगी .............


रेवा 

27 comments:

  1. जिन्दगी तो जिन्दगी ही है.......

    ReplyDelete
  2. ओह...दर्द भरी लिखनी ...जिंदगी का सच लिए हुए हैं ...हर औरत का सच ...तेरा मेरा सच ....

    ReplyDelete
  3. bahut khoob masha allah

    baraye meharbani mere blog pe b ta assurat pesh kejiyega

    www.hilalwzj.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. दर्द छलक पडे हैं शब्दों में, नारी जीवन की यही कहानी है ...

    ReplyDelete
  5. पर एक हाँथ के
    फासले पर सोये
    तुम्हे खबर भी नहीं होती ,
    हर बार खून के आंसू
    पी कर रह जाती हूँ ,
    bahut marmik prastuti..........sabd sabd me bhav bhare hue hai ........

    ReplyDelete
  6. aap sabka bahut bahut shukriya

    ReplyDelete
  7. Yashwant ji...apka comment mail may tho aya...yahan shayad kisi karanwash nahi dikh raha....chama chahungi....apka bahut bahut shukriya...padhne aur sarahne kay liye

    ReplyDelete
  8. यही मेरा नसीब है
    यही मेरी ज़िन्दगी ...
    नारी मन से निकले बहुत ही गहरे भाव और अभिव्यक्ति !!

    ReplyDelete
  9. Aaiso basant nahin bar bar
    phagan ke din char
    holi khel ke mana re
    seel santokh ke kesar gholi
    prem preet pichkaar re
    urat gulal lal bhiyo ambar
    barsat rang apaar re

    Phagun ke rangon se ranglo apni zindagi - Happy Holi

    ReplyDelete
  10. .


    आपकी कविताओं में दर्द की सघन अनुभूतियां हैं …
    दर्द ज़िंदगी का अहम हिस्सा है ।

    यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए आभार !



    शुभकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  11. pintu bhai....shukriya...same to u

    ReplyDelete
  12. Rajendraji bahut bahut dhanyavad apka

    ReplyDelete
  13. बहुत अच्छी रचना है
    आज कल के जीवन की और हर घर की कहानी को दर्शाती है,
    हमें कवेल रचना को पढ़कर कमेन्ट करना ही काफी नहीं
    हर पुरुष को एस बारे में सोचना चाहिए !

    ReplyDelete
  14. shukriya Vijay ji...bahut sahi kaha apne...

    ReplyDelete
  15. rewa karti raho
    karti rehna sahitya ki seva
    baht accha likhti ho
    itna kuch kahan se sikhti ho
    shabad bade kamal hain tumahre
    lagte hain hamko to bemisal sary
    jab likhe bina na ji pao
    tab likho or likhte hi jao
    aisa khalil jibran ne kaha tha
    maine kisi pustak se padha tha
    bas itna hi kahunga ki rukna mat
    mushkile kitni ayein wapas mudna mat

    ReplyDelete
  16. Jitender ji bahut bahut shukriya...apne mera hausala dugna kar diya

    ReplyDelete
  17. सुन्दर....
    भावनात्मक सहारा खोजते उम्र गुजर जाती है...

    फिर भी जीवन तो चलता रहता है.

    अनु

    ReplyDelete
  18. Anuji....shukriya....sahi kaha apne

    ReplyDelete
  19. wah dil ko chhu gai aap ki rachna........ bahut khub......

    ReplyDelete
  20. रेवा जी ,जीवन की सच्चाई से रु बरु कराती आपकी रचना ! सुन्दर शब्द विन्यास ,उत्तम कृति

    ReplyDelete
  21. rewa jee plz see the folowing link also

    http://abhivyakte.blogspot.in/

    ReplyDelete