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Saturday, February 22, 2014

एक सजा



समझती हूँ
तेरी उदासी
पढ़ सकती हूँ
तेरी आँखों को ,
पर क्या करूँ
माँ हूँ फिर भी
कई बार तेरे सवालों का
तेरी उदासी का
समाधान नहीं कर पाती ,
समय ही
तुझे तेरे सवालों का
जवाब देगा ये जानती हूँ ,
पर तब तक
तुझे दुखी देखना
मेरे लिए एक सजा
से कम नहीं।


रेवा 

15 comments:

  1. शब्‍दों में इतनी सशक्‍तता बेहद खूबसूरत कविता है दी...

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  2. bahut bhavuk kavita...dil me tees pahuchane wali bhawanaye. thanks for posting such a nice poem Rewa.

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  3. maa ki mazburi ho jati hai kabhi -kabhi ....bahut sundar abhivykti

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  4. such beautiful lines but filled with pain...

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  5. एक माँ की दुविधा को मुखर अभिव्यक्ति देती सशक्त रचना ! बहुत सुंदर !

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  6. बहुत सुन्दर,सीधी,सच्ची बात.....

    सस्नेह
    अनु

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  7. हार्दिक शुभकामनायें

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  8. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन तीसरी पुण्यतिथि पर विशेष - अंकल पई 'अमर' है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

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