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Saturday, June 28, 2014

दोस्त


सालों तक जिस दोस्त को
ढूंढती रही निग़ाहें
उसका पता यूँ अचानक
चलेगा
ये सोचा न था ,
और पता भी कैसा
यहाँ तक की
मैंने उसकी तस्वीर
भी देखी
पर जाने क्यों
उसकी निगाहों मे
खुद को
तलाशने की कोशिश करने लगी ,
वो तड़प ढूंढने लगी
जिसे मैं महसूस करती थी
आखिर हमारी दोस्ती
थी ही ऐसी ,
पर वहाँ कुछ न पाकर
एक झटका लगा ,
एक टिस सी उठी दिल मे
पर चलो भर्म तो टुटा
क्या समय ,हालात
सच मे बदल देते हैं इंसान को ?

"दर्द इसका नहीं की
 बदल गया ज़माना ,
बस दुआ थी इतनी
मेरे दोस्त
कहीं तुम बदल न जाना "



रेवा


12 comments:

  1. कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी...

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  2. कोमल, सुंदर, भावपूर्ण प्रस्तुति ! बहुत बढ़िया !

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन हुनर की कीमत - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. वैसे तो वह आपकी दोस्त है तो आपके पास जरूर आयेगी। वरना वह दोस्त नही थी।

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  5. दोस्त से अपना कोई नहीं, बशर्ते वो बदले नहीं...

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  6. कभी कभी किसी रचना के भाव अपने भावों जैसे लगते हैं.... अपनी सी कविता...

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  7. बहुत सुन्दर ढंग से अपने मन के भावों को रचना में ढाल दिया है आपने ...............

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  8. मित्रता दिवस की शुभकामनायें!

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  9. भावमय करते शब्‍दों का संगम ...

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