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Sunday, June 8, 2014

मिनी की पहचान




बाबुल का आँगन
फिर एक बार 
याद करा गया 
वो बचपन ,
हवाओं मे 
महकता दुलार 
लाड़ और प्यार ,
करा गया 
एहसास की 
मैं वहीँ सबकी लाड़ली 
छोटी अल्हड सी मिनी 
जो फुदकती ,कूदती 
अटखेलियां करती 
नाचती थी आँगन आँगन ,
पर जिम्मेदारियों की
ओढ़नी ऐसी पड़ी   ,
कि मिनी की पहचान ही
बदल दी ……

 "बाबुल के आँगन की नन्ही कली
खिल कर फुल बनी
समय कि धुप उसपर ऐसी पड़ी
कि भूल गयी ,वो भी थी            
कभी एक नन्ही कली "

रेवा 

14 comments:

  1. कुछ नहीं भूलता कभी
    बस समय की धूल पड़ी होती है
    तुम्हें खुश देख बहुत अच्छा लगता है
    God ब्लेस्स you

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सेर और सवा सेर - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. mann ko chhu lene wali kavita.....sach bachpan bahut yaad aata hai..nahi bhul pate wo sunahare din.

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-06-2014) को "यह किसका प्रेम है बोलो" (चर्चा मंच-1638) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. रचना और चित्र दोनो सुंदर।

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  6. समय की चाल्होती है ये ... बीत जाता है जल्दी ही बस यादें दे जाता है ...
    अच्छी रचना ...

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  7. सब कुछ बदल जाता है, केवल यादें रह जाती हैं...सुन्दर प्रस्तुति..

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  8. सच लिख दिया आपने वह भी खूबसूरती से।

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  9. This comment has been removed by the author.

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  10. बहुत खूबसूरत अहसास.... स्नेह में भीगी सुन्दर रचना

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