अभी कुछ दिनों पहले मैं केरेला के एक टूरिस्ट प्लेस वायनाड गयी थी ,हम जब वहां पहुंचे तो वहां बरसात का मौसम शुरू हो चूका था। वो जगह इतनी सुन्दर है की उसे शब्दों मे वर्णन करना बहुत मुश्किल है। प्रकृति की छटा अपने पुरे यौवन मे ,हर तरफ बिखरी हुई थी ,बरसात मे ऐसा लग रहा था मानो कैनवास पर हरे रंग बिखेर दिए हों ,दिन मे भी वहां कुहासा हो गया था ...... चारो ओर बस शांति और हरियाली ....उस समय वो जगह जन्नत से कम नहीं लग रही थी। उस दिन हमने प्रकृति का आनंद उठाया , आराम किया और खूब तस्वीर खिंचे ,दूसरे दिन से हमने घूमना शुरू किया , वहां के लेक और डैम देख कर हम मन्त्र मुग्ध हो रहे थे ...... यहाँ बीच मे एक बात मैं और कहना चाहूंगी वहां के लोगों के बारे मे ,जो सीधे सरल ,धीरे बोलने वाले और बेहतरीन मेजबान हैं ।
तीसरे दिन हमे वापस जाना था। उस दिन हमने प्लान बनाया की जो लेक बचा है वो देखते हुए हम वापस चले जाएंगे।
हम पहुंचे vythiri के एक लेक मे ..... वहां पहुँचते ही ज़ोरों की बारिश शुरू हो गयी। हमे बोटिंग करना था पर वो बारिश की वजह से बंद हो गया था , लेकिन लेक प्राकृतिक था और इतना ख़ूबसूरत की क्या बताऊँ , हम बरसात मे भी रुक गए... जैसे ही हम वापस जाने लगे मेरी नज़र पड़ी एक माँ पर जो उस बरसात मे अपने छोटे बच्चे को खुद से चिपकाये उसे बचा रही थी..... बार बार उसके बालों पर हाथ फेर रही थी बारिश जितनी तेज़ हो रही थी बच्चा उतना ही माँ से चिपकते जा रहा था , ये माँ है तस्वीर वाली बंदरिया
माँ आखिर माँ होती है चाहे कोई भी रूप हो !!!!! ............................
रेवा