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Friday, January 27, 2012

इंसानी फितरत

जब जब अकेली होती हूँ
जी भर कर रोती हूँ ,
कैसे बताऊ मन की व्यथा ?
रोज़ टूटती हूँ 
फिर उठ खुद को जोडती हूँ ,
उन्हें सहारा और ताक़त 
देने के लिए मजबूत 
बन जाती हूँ ,
पर उनके व्यव्हार से 
फिर टूट जाती हूँ ,
भगवान ने ऐसी फितरत 
ही बनायीं है इंसान की ,
जब वो  कमज़ोर होता है 
तो उसे प्यार नज़र आता है ,
पर वही जब ठीक  होता है 
तो सब भूल जाता है ,
ये सोचे  बिना की ,
जिसने अपना 
निरछल प्यार बरसाया 
वो तब भी वहीँ था 
और अब भी वहीँ है /


रेवा 


14 comments:

  1. सटीक अभिव्यक्ति ...

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  2. रेवा जी...
    बेहतरीन भावो का सुन्दर संगम ।

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  3. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  4. aap sabka bahut bahut shukriya

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  5. कल 14/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. जब वो कमज़ोर होता है
    तो उसे प्यार नज़र आता है ,
    पर वही जब ठीक होता है
    तो सब भूल जाता है ,
    ये सोचे बिना की ,
    जिसने अपना
    निरछल प्यार बरसाया
    वो तब भी वहीँ था
    और अब भी वहीँ है!

    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

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  7. Madhureshji bahut bahut shukriya

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  8. क्या बात कही है आपने...
    बहुत ही बेहतरीन रचना है....
    सुन्दर:-)

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  9. Reenaji Bahut Bhaut shukriya apka

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  10. नवरात्र के ४दिन की आपको बहुत बहुत सुभकामनाये माँ आपके सपनो को साकार करे
    आप ने अपना कीमती वकत निकल के मेरे ब्लॉग पे आये इस के लिए तहे दिल से मैं आपका शुकर गुजर हु आपका बहुत बहुत धन्यवाद्
    मेरी एक नई मेरा बचपन
    कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरा बचपन:
    http://vangaydinesh.blogspot.in/2012/03/blog-post_23.html
    दिनेश पारीक

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