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Wednesday, May 28, 2014

तेरी आवाज़




मैं हर रोज़ नए - नए
मनसूबे बनाती हूँ
तुमसे बात न करने के ,
पर कामयाब हो ही नहीं पाती
कभी दिल कमज़ोर पड़ जाता है
कभी दर्द ज्यादा बढ़ जाता है ,
कभी मौसम मना लेता है
कभी तेरा प्यार याद आ जाता है
कभी तुम्हारी कही गयी बातें ,
कभी वो समझ जिससे हमेशा
मेरी बात मुझसे पहले ही
पहुंच जाती है तुम तक............
शायद
तेरी आवाज़
मेरी आदत
और आदत
ज़िन्दगी बन गयी है अब।


रेवा

12 comments:

  1. wah ji wah ....aap bulaye aur ham naa aaye ....!

    bahut sundar

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  2. wah wah kya baat hai..very romantic voice....

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  3. वाह जी वाह ..... एक ही बात सबके मन मे आ रही ना

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-05-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1627 में दिया गया है |
    आभार

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  5. बहुत ही सुन्दर..
    बहुत ही प्यारी रचना.....

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  6. 'और आदत जिंदगी बन गई अब " बहुत सुन्दर !
    new post ग्रीष्म ऋतू !

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  7. सुन्दर भाव...बहुत खूब...

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  8. वाह..बहुत भावपूर्ण रचना...

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  9. मेरी आदत,और आदत ज़िन्दगी गयी है अब।
    वाह ,सुन्दर भावपूर्ण रचना साभार

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  10. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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