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Thursday, October 9, 2014

मुट्ठी भर एहसास



मुट्ठी भर एहसास
जो हर बार
भर लेती हूँ ........
फिसल जाती है
रेत की तरह
उँगलियों के कोरों से .......
थाम लेती हूँ
सर्द आँहों को
हर रात ………
ताकि हर सुबह
फिर भर सकूँ
एहसासों को ……
जाने कब तक
चलेगा ये सिलसिला…...
अब तो आस  ने भी
हवा के साथ
रुख बदलना
शुरू कर दिया है

रेवा 

13 comments:

  1. भावपूर्ण अहसास -- बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

    शरद का चाँद -------

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  2. बहुत गहन भावों के साथ लेखनी बहुत प्यारी है

    my recent poem : सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.10.2014) को "उपासना में वासना" (चर्चा अंक-1762)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  4. जज्बात किस तरह बहार आये हैं ..और शब्दों का प्रयोग बेमिसाल है
    कविता ने मन को बाँध लिया .. क्या खूब लिखा है .. अंतिम पंक्तियों ने जादू कर दिया है

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  5. Bahut hi bhaawpurn rachna ... Mere blog par aapka swagat hai !!

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  6. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 13/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  7. गहन भाव लिए बहुत ही सुन्दर रचना....

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  8. शब्दों से भावनाओं को कैद कर लिया हो जैसे ...
    बहुत अर्थपूर्ण ...

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  9. मुट्ठीभर एहसास, जैसे पीड़ा का महाकाव्य... हवा के साथ रुख बदलना, असहनीय छल। पंक्तियां जैसे गागर में सागर

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