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Thursday, February 12, 2015

यादों की पैकिंग (लघु कथा )

काम कर रही थी सानु माँ के साथ.......कई महीनों से चल रही थी तैयारी सानु की शादी की ...अब तो वो दिन बिलकुल करीब आ गया था , सानु बहुत खुश थी ,क्युकी लड़का उसे बहुत पसंद था ,जैसे जीवन साथी की उसने कामना की थी संजय बिलकुल वैसा ही था।
माँ भी बहुत खुश थी , माँ का सबसे बड़ा अरमान होता है बेटी को दुल्हन के जोड़े में देखना , और वो सपना अब पूरा होने वाला था।
अब शादी को बस चार ही दिन बचे थे , माँ ने सानु को बोला " सानु नए सामानों के साथ तेरे पहले के सामान भी पैक कर ले" , पता नहीं कब क्या काम आ जाये , तेरे इतने गहने और कास्मेटिक हैं सब रख ले,और हाँ अपनी फवौरिटे परफ्यूम भी ,वार्ना फिर लड़ेगी शिखा से ,पर ये क्या  अचानक सानु की आँखों से आँसू बहने लगे…… माँ सकपका गयी और सानु को पुचकारते हुए पूछने लगी।
सानु ने कहा " माँ सारे सामान मैं पैक कर लुंगी ,"पर इस घर से जुड़ीं अपनी यादों को कैसे पैक करू" , कैसे पैक करू पापा का दुलार ,उनका डांटना और फिर सर पर हाँथ फेरते हुए मनाना  ,कैसे साथ ले जाऊँ आपका लाड़ ,भैया के  झगड़े ,शिखा की छेड़खानी ,अपने दोस्तों की ठिठोली , घर के हर कोने मे मेरा बचपन बसा है उसका क्या करूँ ,बताओ माँ ?
स्कूल कॉलेज मे बहुत कुछ पढ़ा और सीखा पर ये किसी ने बताया ही नहीं की "जिस घर मे बचपन बीता उसे छोड़ कर कैसे जाते है" ? इतना सुनना था की माँ सानु के गले लग कर रोने लगी।

ये त्याग सिर्फ लड़कियाँ ही कर सकती है ,फिर भी उन्हें ससुराल मे पूरा सम्मान नहीं मिलता ,सोचने वाली बात है।

रेवा 

9 comments:

  1. भावुक कर देने वाली प्रस्तुति ! बहुत सुन्दर !

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  2. स्पष्ट रूप से ! माहौल शायद बदलेगा

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  3. बहुत भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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  4. सार्थक प्रस्तुति...

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  5. इस सवाल का जवाब शायद ही कभी मिलें

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