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Wednesday, February 25, 2015

प्यार की खुशबू


ऐसी चली फागुन की पुरवाई
फिर तेरी याद हो आई ,
यादों के बंद बक्से से
प्यार की खुशबू ने
ली अंगड़ाई ,
बाँवरे मन ने की
कोशिश हज़ार
पर हो गया मदहोश
फिर एक बार ,
जाने ये कैसा इत्र है
जो महका गया
मेरा तन और मन
बन कर बरखा की बौछार ।

रेवा

9 comments:

  1. खुशबू हवाओं में तैर रही है। हुनरमंद ही इसे पहचानते हैं।

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  2. Waaaaaah is itra ki khushbu unhe hi aati hai jo muhbbat me bhig chuke hote hain.......

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  3. मन - भावन शब्द ,
    कुछ अधरों पर ठहरे हैं
    कुछ आखों में बिखरे हैं
    http://savanxxx.blogspot.in

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  4. दिल से लिखी गयी और दिल पर असर करने वाली रचना , बधाई तो लेनी ही होगी

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