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Monday, January 11, 2016

औरत







औरत

नाम है ऐसे जीव का
जो हमेशा पिसती रहती है
दो पाटों मे
कभी ससुराल तो
कभी मायके के नाम पर
कभी पति तो कभी
बच्चों के नाम पर .....
उसके मन की बात कभी
कोई नहीं सुनता
क्योंकि वो खुद की
कहाँ सुनती है ??

एक घर जन्म का
एक घर कर्म का
पर न वो जन्म 
वालों की हो पाती है
न कर्म वालों की
ता उम्र दोनों के लिए
परायी बन
गुज़ार देती है


तमाम रिश्तों के बीच
परायी स्त्रियों को
सलाम मेरी इस
लेखनी द्वारा
और अंत में कहना चाहूँगी
"बेटी हूँ बहू हूँ
बीवी हूँ माँ हूँ
पर सबसे पहले
हाड़ मांस की इन्सान हूँ






रेवा

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 12 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सच कभी तो लगता है वह अपने लिए बनी ही नहीं है ..

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  3. बहुत सही, बहुत सुन्दर

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  4. ऊपर वाले ने सोच-समझकर ही इतनी सहनशक्ति वाला जो बनाया है औरत को कि वह हाल में जी लेती है ..
    बहुत सुन्दर
    आपको जन्मदिन की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  5. आज पांच लिंकों का आनंद अपना 200 अंकों का सफर पूरा कर चुका है.. इस विशेष प्रस्तुति पर अपनी एक दृष्टि अवश्य डाले....
    आपने लिखा...
    और हमने पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 02/02/2016 को...
    पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
    आप भी आयीेगा...

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  6. सटीक अभिव्यक्ति ... नारी इस श्रृष्टि की कल्पना है ... संरचना है ... श्रेष्ठ है ...

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