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Saturday, August 6, 2016

लेकिन ऐसा क्यों ????



हर बार औरत ही क्यों
मनुहार करे ....
क्यों वही प्यार से 
जीने की बात करे ....
क्यों वही बच्चो
के नाज़ नखरे उठाये ....
ससुराल में तारतम्य
बैठाये ....
जब दो इंसानो ने
जीवन में साथ रहने
के सात वचन लिए
तो हर वचन वही
क्यों निभाने की कोशिश करे ??
क्या उस दूसरे इंसान का
कोई फ़र्ज़ नहीं .....
क्या सिर्फ कमा कर लाना
ही उसकी एक मात्र जिम्मेदारी है.....
वो ये क्यों भूल जाता है
की ये तो हम औरतें भी कर
सकती हैं ....
पर उनके और बच्चों के
प्यार और देखभाल मे
त्याग देती हैं ....
लेकिन उनके त्याग को
उनकी कमज़ोरी समझ
हर नाते रिशतें सँभालने
का जिम्मा उनका हो जाता है .....
लेकिन ऐसा क्यों ????
रेवा

10 comments:

  1. गहराई तक चोट करते हुए प्रश्न!
    नारी मन की पीड़ा को बड़ी सुंदरता से चित्रित किया है आपने।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 7 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-08-2016) को "तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा" (चर्चा अंक-2428) पर भी होगी।
    --
    मित्रतादिवस और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. रेवा जी, हर नारी की वेदना को बखुबी अल्फाज दिए है आपने।

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  5. jyoti ji mere blog mey apka swagat hai.....shukriya apne samay nikal kar kavita ko padha aur tippani di

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  6. बहुत खूब ... नारी मन को खंगाला है आपने ...

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  7. दिल के भावों को व्यक्त करती सुन्दर रचना ।

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