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Thursday, May 24, 2018

मोहब्बत का सफ़र

आज तुम आये मेरे पास
और कहा की
जो तुमने लिखा है न
"तुझे मेरी आरज़ू तो है
पर मोहब्बत नहीं "

ऐसा नहीं है
मैंने कभी मोहब्बत के
बारे में सोचा ही नहीं
य कह लो समय नहीं मिला
तुम मेरी चाहत को ही
मोहब्बत समझ लो न 

असल में चाहत और
मोहब्बत में मैं अंतर
नहीं कर पाता हूँ
और अगर कर भी लूं
तो मुझे प्यार जताना
या  दिखाना नहीं आता
पर प्यार मैं तुमसे ही करता हूं
बस इतना कह सकता हूँ 

मैंने कहा, जानते हो 
तुमने आज बस इतनी सी
बात कह कर
ता उम्र अपना साथ
मेरे नाम कर दिया
यही तो चाहा था मैंने
कभी कुछ तो बोलो
इस बारे में मुझसे
चलो अब मुझे 
कोई शिकायत नहीं
तुमसे
तुम मैं और मोहब्बत
अब साथ साथ सफ़र करेंगे

रेवा 

#मोहब्बत 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-05-2018) को "अक्षर बड़े अनूप" (चर्चा अंक-2981) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. चाहतों के ही तो मेले हैं मोहब्बतों के बाज़ार में.
    बेहद लाजवाब रचना.

    हाथ पकडती है और कहती है ये बाब ना रख (गजल 4)

    .

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