Followers

Monday, May 7, 2018

नापाक रिश्ते

जब ब्याह हो जाता है
अपना दिल जान सब
न्यौछावर कर देती है स्त्री,
पर जब उसे वो मिलता नही
जो वो चाहती है
जो सबसे कीमती है उसकी नज़र में
तो उदास हो जाती है अंदर से ,
दिल में एक खाली कोना
बन जाता है
और उदास हँसी उसकी नीयती,
कभी तो बगावत कर देती है
कभी नसीब मान समझौता भी ,
पर जब कोई उसे ऐसा मिलता है
जो भीड़ में थाम लेता है उसे
बिन कहे सुने ही, सब समझ लेता है
उसकी बातें, उसकी ख्वाहिशें
तो अनायास ही वो
उसकी तरफ झुकने लगती है
उससे अपनी हर बात
साझा करने लगती है,
लेकिन जीवन में आदमी
का अर्थ है
बाप भाई पति या बेटा
फिर इस रिश्ते को
किस आसन पर बैठाये ??
इसलिए हर पल
इस अपराध बोध के साथ जीती है की
वो अपने पति और परिवार
के साथ न्याय नहीं कर रही,
जबकी वो अपने हर रिश्ते की
सारी सीमाओं से वाकिफ़ है ,
जरूरी है क्या की वो इसे कोई नाम दे?
क्या बिना नाम कोई बंधन या कोई
रिश्ता अपने मायने खो देता है,
और वो औरत है दूसरा मर्द
इसलिए क्या रिश्ता नापाक हो जाता है ?
ऐसे और भी कई सवाल हैं
क्या जवाब है हमारे पास ????
वैसे मेरा ये मानना है की 
रिश्ते कभी नापाक नहीं होते 
नापाक होती है सोच। 

रेवा 

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 08 मई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया बहना

      Delete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (08-05-2017) को "घर दिलों में बनाओ" " (चर्चा अंक-2964) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete
  4. जब एक स्त्री हर रिश्ते से वाकिफ़ है तो फिर रिस्ते नापाक नहीं हो सकते..
    25 वीं पंक्ति में आसान की जगह शायद आसन आये।
    एक अनछुए पहलू को छुअन दी है आपने।

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया ,ख़ास कर टाइपिंग की ग़लती की और ध्यान आकर्षित करने के लिए

      Delete
  5. बहुत ही मर्मस्पर्शी प्रश्न आदरणीय रेवा जी -- औरत भी एक इंसान है उसे भी अपने रूहानी साथी को चुनने का हक़ है | सचमुच रिश्ते नहीं बल्कि सोच में दोष होता है | एक परित्यक्त से विषय को सजाया है आपने रचना में बड़े ही स्पष्टता से | सादर --

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया रेनू जी

      Delete
  6. निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २१ मई २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय गोपेश मोहन जैसवाल जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    ReplyDelete