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Friday, October 5, 2018

सदियों की रिहाई


हम भी मिले थे अचानक 
दूसरे प्रेमियों की तरह ही
प्यार तो नहीं था तब
दोस्ती भी नहीं थी
पर कुछ तो था... 

धीरे-धीरे समय के साथ 
एहसास हुआ की
ये पक्का दोस्ती तो नहीं
पर जो है उसे अपने
पास फटकने देने 
से भी गुरेज़ है ...

लेकिन अगर अपने ही बस में
हो हर एहसास तो फिर
ग़म ही न हो ....

तुम भी वहीं महसूस
कर रहे थे जो मैं कर रही थी
ये जानती थी
पर हम आँख मिचौली
खेलने लगे एक दुजे के साथ 

लेकिन आखिर धप्पा 
हो ही गया और तब
तुमने मुझे सदा प्यार करने की
पर दूर चले जाने की कसम
ले ली 

जैसे कह रहे हो
"सदियों का वादा तो किया है
और सदियों की रिहाई भी दे रहा हूँ  "


#रेवा 
#वादा 

8 comments:



  1. जैसे कह रहे हो
    "सदियों का वादा तो किया है
    और सदियों की रिहाई भी दे रहा हूँ "
    बबहु ही सुंदर रचना

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  2. बहुत पढें टंकण में गलती हुई

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  3. शुरुवात मोहब्बत की हो जाती है और फिर इंतजार के साथ बेकरारी आती ही है.. इस स्तिथि को अच्छे शब्द मिल गये
    नाफ़ प्याला याद आता है क्यों? (गजल 5)

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-10-2018) को "शरीफों की नजाकत है" (चर्चा अंक-3117) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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