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Thursday, May 28, 2020

हमारे सच्चे दोस्त




ये पौधे हैं न 
कभी भेद भाव नहीं करते 
पानी नाराज़गी से 
डालो या प्यार से 
ये अपनी पत्तियों के हरेपन 
और फूलों की खिलखिलाहट से 
मन खुश कर ही देते हैं 

ये चाँद है जो हर रात 
नज़र आता है आसमान पर 
और कभी कभी 
दिख जाता है खिड़की से भी 
ये हमारे मिज़ाज़ को नज़रअंदाज़ कर देता है 
दिन चाहे जैसा भी बिता हो 
ये हर रोज़ अपनी चांदनी की ठंडक 
भेज थपकी दे के कर सुला देता है 

ये कागज़ और कलम हमेशा साथ देते हैं 
जब मन दुखी हो तो दुख बयां कर देते हैं 
जब खुश हो तो ये अक्षर 
हँस कर खुशी भी बयान कर देते हैं
ये अपेक्षाएं नहीं रखते 
जज तो बिल्कुल भी नहीं करते 
न कोई वाओ फैक्टर ढूढते हैं 
हम जैसे हैं हमें वैसे ही स्वीकार 
कर हमेशा मान देते हुए 
एक सच्चे दोस्त का फर्ज 
बाखुबी निभाते हैं 

आज इस कविता के जरिये मैं हमारे 
इन सच्चे दोस्तों को धन्यवाद देती हूँ 

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(३०-०५-२०२०) को 'आँचल की खुशबू' (चर्चा अंक-३७१७) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

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  3. यह रचना भी किसी के साथ भेद-भाव नहीं करती। सुंदर प्रस्तुति।

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