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Thursday, June 10, 2010

वो ढलती शाम

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये 

फिर मैं उस भीढ़ भाड़ मे खड़ी तेरा इंतज़ार करु
फिर तू कहीं नज़र न आये
फिर से मै बेक़रार हो जाऊ 
और इंतज़ार मैं तेरे अपनी रुमाल के कोने घुमाऊ ,

फिर अचानक भीड़ में तेरा नज़र आना
हमारी नज़रों का मिलना
नज़रों ही नज़रों में एक दुसरे को पहचानना 
और शर्म से मेरी नज़रों का झुक जाना ,

फिर वो कॉफ़ी  और चने के साथ अनगिनत बातें करना
बातो के साथ नज़रे चुरा कर एक दुसरे को देखना ,
झील के किनारे होले होले ठंडी हवा के साथ बहना
चाँद का झांक कर हमे देखना
वक़्त का ठहर सा जाना ,

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये l 


रेवा


6 comments:

  1. Kaash! Bahut sundar rachana..har kisee ke dil ke kone me chhupi baat kah rahi hai..!

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  2. इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

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  3. बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना ...

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  4. aap sab ka bahut bahut dhanyavad........apki sarahna say mujhe aur likhne ki prerna milti hai

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