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Monday, November 15, 2010

ये आंखें

आज फिर आँखों ने
बह  कर अपनी 
कहानी कह दी ,


आज फिर शीशे ने 
इन बिलखती प्यार 
भरी आँखों  को 
देखने से इंकार कर दिया ,


आज फिर आँखों 
ने खुद को 
ज़ल के छीटों 
से शीतल किया ,


आज फिर इसने 
प्रशन नहीं किया की 
यह कब तक 
ऐसे बहती बहती 
अपनी कहानी कहेंगीं ,


शायद पत्थर बन 
कर यह अपनी 
जिंदगानी पूरी करेंगी ............


रेवा 



8 comments:

  1. आज फिर आँखों
    ने खुद को
    ज़ल के छीटों
    से शीतल किया

    सुन्दर बिम्ब

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  2. bahut hi sundar rachna... meri bhi aakhein nam ho aaayin hain... lajawab..

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  3. शायद पत्थर बन
    कर यह अपनी
    जिंदगानी पूरी करेंगी ............
    Ek kasak uth gayi dil me....!

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  4. Aaj phir in ankho ne beh kar kahani poori kardee. ek dard kaa ahsas diltati rachna ati sunder prayas

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  5. रेवाजी आपके लेखन की गहराई काबिले तारीफ़ है . बहुत सुंदर रचना है .. धन्यवाद् और आप से यही उमीद करते है की आप हमेसा ऐसा ही लिखते रहे

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  6. Kitni Khubsurat Haan Ye aakhein
    In mein Haan Puri Duniya Haan Samaii

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  7. शायद पत्थर बन
    कर यह अपनी
    जिंदगानी पूरी करेंगी ............
    खासकर इन पंक्तियों ने रचना को एक अलग ही ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया है शब्द नहीं हैं इनकी तारीफ के लिए मेरे पास...बहुत सुन्दर..

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  8. aap sabka bahut bahut shukriya

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