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Wednesday, November 24, 2010

स्त्री की कहानी.

वैसे कहने को तो हम 
पूरी ज़िन्दगी जीते हैं ,
बचपन अपने माँ बाप 
के हिसाब से ,
शादी के बाद अपने 
पति, सास ससुर के 
हिसाब से ,
कभी घर के हालत 
की वजह से ,
कभी किसी और 
वजह से ,
कभी इसके  लिए   
कभी उसके लिए,
हर मोड़ पर ,हर जगह 
समझोता करते आयें हैं ,
कहने को हम कहते हैं 
यही ज़िन्दगी है 
खुश हो कर जीओ  ,
पर क्या इन सब के बीच 
हम एक पल एक घडी 
अपनी मर्ज़ी से 
अपनी ख़ुशी के लिए 
अपनी ज़िन्दगी जी पाते हैं ????




रेवा 


5 comments:

  1. यही तो त्रासदी है जिस दिन जीने लगोगे उसी दिन समाज से उपेक्षित हो जाओगे।

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  2. पर क्या इन सब के बीच
    हम एक पल एक घडी
    अपनी मर्ज़ी से अपनी
    ख़ुशी के लिए अपनी ज़िन्दगी जी पाते हैं ????

    Bada zabardast sawaal uthaya hai aapne! Shayad hee kabhi aisa hota hoga!

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  3. Duniya Mein Kitna Gam Haan Mera Gam Kitna Kam Haan..................
    Thanks Allah

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  4. @ आदरणीय रेवा जी..
    वंदना जी ने बिलकुल सही बयाँ किया है
    हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।
    ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.
    संजय भास्कर

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  5. aap sabka bahut bahut shukriya

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