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Tuesday, December 21, 2010

मेरे ज़ख़्म

आज किसी ने पूछा मेरी ज़िन्दगी का सच
मेरी पूरी कहानी…… 
पता था 
अपने बारे मे बताना मतलब
फिर से उन ज़ख्मों को कुरेद कर हरा करना
फिर कुछ दिन उन घावों मे से लहू का रिसना 
पता है न 
पुराने ज़ख़्म भरते नहीं जल्दी
और जिसे बार-बार कुरेदा जाये 
वो नासूर बन जाते हैं ........
फिर भी बता दिया ,
खुद भी रोई उसे  भी रुला दिया 
पर फिर भी एक आन्तरिक ख़ुशी महसूस हुई 
शायद अपना दुःख बांटा और
एक सच्चा इंसान पाया ...........


रेवा .

3 comments:

  1. खुद भी रोई उसे भी रुला दिया
    पर फिर भी एक आन्तरिक ख़ुशी महसूस हुई
    शायद अपना दुःख बांटा और
    एक सच्चा इंसान पाया इसलिए .........
    Rewa ji is rachna ne man ko dravit ker diya .

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  2. आज की तुम्हारी यह कविता इतनी पसंद आई की बताना मुश्किल है . इतना अच्छा और सच्चा लिखा है की प्रसंशा को शब्द नहीं मिलते

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  3. main to kuch khaas keh nahi pa rah...main bhi aisa likhna chahta hoon ki padhne waale ko nihshabd kar de....
    bahut khu....
    हाँ मुसलमान हूँ मैं.. ..

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