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Saturday, November 24, 2012

मेरा अस्तित्व

ख्यालों मे इतने उफान आ रहे हैं
पर लगता है शब्दों का समुद्र
सूख  गया है ,
बस चारो और धुंध  ही धुंध है
कुछ साफ नहीं दिख रहा ,
ज़िन्दगी मे आये इस पड़ाव
को पार करना बहुत मुश्किल
हो रहा है ,
लोग तो रूठ कर चले गए
पर अब मेरी कविता
भी मुझसे रूठी बैठी है ,
उसे कैसे बताऊ की
उसके बिना मेरा अस्तित्व
दाँव पर लगा है /


रेवा







13 comments:

  1. Aap to likhtee rahtee hain...astitv daanv pe nahee na laga!

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  2. रूठना मनाना तो जीवन का हिस्सा है रेवा.....
    कविता बेशक रूठे,मगर कहीं जायेगी नहीं...और भी स्नेह के साथ अवतरित होगी देखना...
    ढेर सा प्यार..
    अनु

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  3. कल 26/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. अनु जी से बिलकुल सहमत.

    कैफ़ी आज़मी के शब्दों में कहूं-

    लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
    उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

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  5. उसे कैसे बताऊँ उसके बिना मेरा अस्तित्व दाँव पर लगा है .....बहुत सुन्दर...

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  6. रूठना मनाना तो चलता है..
    कविता भी जल्दी ही मान जाएगी..
    सुन्दर भावपूर्ण रचना..

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  7. कभी कभी कविता नहीं विचार ही रूठ जाते हैं ..... सुंदर भावभिव्यक्ति

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  8. बहुत खूबसूरती से अपने भाव परकट किये हैं पर
    दीदी एसे समय पर अपने विचारो पर काबू रखना पड़ता है

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  9. भावों का रूठना मनाना तो चलता रहता है और यह कविता भी शीघ्र मान जाएगी... बहुत सुंदर प्रस्तुति...

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  10. अपने सुन्दर शब्दों के समुद्र को मत सूखने देना..
    धुँध तो क्षणिक होती है..उनके पार सुनहरा प्रकाश होता है !!

    आपका दर्द बयाँ करती हुई सार्थक पंक्तियाँ...

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  11. खूबसूरत भाव ......सादर

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  12. aap sabka bahut bahut shukriya

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