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Tuesday, April 16, 2013

टुटा विश्वाश

मन टुटा
तन टुटा
टुटा है विश्वाश ,
न जाने फिर कब हो
जीने की आस ,
क्यों करते हैं लोग ऐसा
जाने क्या है बात ?
क्या उन्हें नहीं चाहिए
अपनों का साथ ?
नया ज़माना
नए लोग
नयी है उनकी सोच ,
टूटे काँच
कभी न जुड़ता
न जुड़ता विश्वाश /

रेवा








6 comments:

  1. चिन्तक परक बहुत सुंदर

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  2. मुश्किल होता है एक बार विश्वास टूट जाने पर फिर से जुड़ना ...बहुत सुन्दर लिखा आपने

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  3. खुबसूरत और सुन्दर अभिव्यक्ति...रेवा जी !

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  4. bahut....khoob...

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  5. अनुपम भाव ...

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