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Friday, October 11, 2013

खोये एहसास




पहली बार ऐसा हुआ
१० दिन तक देखा तो नहीं तुझे
और आवाज़ भी नहीं सुनी ,
घर मे हर तरफ तेरी
मौजूदगी का एहसास
होता तो है ,
पर मौजूद होना
और बस एहसास होने मे
फरक है न ,

"आंखें हैं नम दिल है उदास
जाने क्यों खोये खोये से हैं हर एहसास ,
जीने को तो जी रहें हैं हम पर
मेरी जान नहीं मेरे पास "

रेवा


10 comments:

  1. समझ रही हूँ
    कहना बहुत आसान है
    सहना उतना ही मुश्किल होगा
    धैर्य की ही परीक्षा कर लो

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (12-10-2013) को "उठो नव निर्माण करो" (चर्चा मंचःअंक-1396) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुन्दरता से व्यक्त किया आपने ।

    मेरी नई रचना :- मेरी चाहत

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  4. प्रभावित करती भावपूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति...!
    नवरात्रि की शुभकामनाएँ ...!

    RECENT POST : अपनी राम कहानी में.

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  5. लम्हा-लम्हा जीना क्या और लम्हा-लम्हा मरना क्या
    साथ तुम्हारा, साथ हमारे अगर रहे तो कहना क्या
    बूंद-बूंद साँसे आती है, बूंद-बूंद एक राह बनी
    घुट-घुट कि बात में हमको, कहना क्या न कहना क्या...........

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  6. विरह भी प्रेम का एक रंग है... प्रेम की परीक्षा कहना ज़्यादा उचित होगा। देखिएगा विरह के बाद प्रेम और भी निखर जायेगा

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  7. भावो का सुन्दर समायोजन......

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