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Friday, April 11, 2014

हाल

हँसी आती है अपने हाल पर
विरह से नाता टुटा
पर वेदना ही वेदना है
हर घड़ी हर चाल पर ,
दोष दूँ तक़दीर को या
रोऊँ समय की मार पर ,
या इंतज़ार करूँ की
कब करवट लेगा वो ऊपर वाला
मेरी गुहार पर ……।

रेवा

12 comments:

  1. हँसते हुए देखो उगते सूरज को......
    भीगी आँखें दृष्टि धूमिल कर देती हैं.......

    सस्नेह
    अनु

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  2. आपकी यह पोस्ट आज के (शुक्रवार, ११ अप्रैल, २०१४) ब्लॉग बुलेटिन - मसालेदार बुलेटिन पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  3. मर्मस्पर्शी !

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  4. वाह... बहुत उम्दा...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@भूली हुई यादों

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  5. कोई पल स्थायी नहीं होता ...... बस इतना याद रखना चाहिए
    हार्दिक शुभकामनायें

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  6. बहुत मर्मस्पर्शी...

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  7. ज़िन्दगी इंतज़ार का दूसरा नाम

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  8. usko bhio sudh aayegi ek din ....bharosa rakhiye

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  9. बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति.

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