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Tuesday, December 23, 2014

असमर्थ आँखें


तुझे सोचते सोचते
न जाने कब
ये आँखें बहने लगी ,
दुःख से नहीं
शायद तेरे प्यार को
सम्भाल पाने मे
असमर्थ थी ,
इसलिए तो मोती बन कर
इज़हार करने लगी ,
मन तो हुआ के
अभी आकर
तुझे बाँहों मे भर लूँ ,
जानती हूँ नहीं कर सकती ऐसा
पर ख्यालों मे तो तुम्हे
अपने आगोश मे भर कर
प्यार कर सकती हूँ न ,
और अपने मोतियों से
तेरा  दामन
भर सकती हूँ न ..........

"मौसम की तरह नहीं हूँ
 मैं बेईमान ,
 तुझसे प्यार किया है मैंने
 तू है मेरी जान "

रेवा




7 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. आँसू दुख में ही नहीं सुख में भी बहते हैं, सुंदर प्रस्तुति ॥

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